chevron_left  दूरमस्यन्गुरुंarrow_drop_down
द्रोण पर्व
अध्याय ३७
सञ्जय़ उवाच
दूरमस्यन्गुरुं भारं साधय़ंश्च पुनः पुनः |
१६ क
स्त्री पर्व
अध्याय २५
गान्धार्यु उवाच
दूरवन्धुरनाथेव अतीव मधुरस्वरा ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
दूरस्थान्साय़कैः कांश्चिदभिनत्स नरर्षभः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
गृध्र उवाच
दूराच्चाय़ं वनोद्देशो भय़मत्र भविष्यति |
९७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
दूराच्छूद्रेणोपचर्यो व्राह्मणोऽग्निरिव ज्वलन् |
३३ क
वन पर्व
अध्याय १२
विदुर उवाच
दूरात्परिहरन्ति स्म पुरुषादभय़ात्किल ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१५
भीष्म उवाच
दूरात्प्रतिहतो यस्मिन्नेकरश्मिर्दिवाकरः |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६३
भीष्म उवाच
दूरादपश्यद्विप्रः स दिव्ययुक्तेन चक्षुषा ||
४३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३९
व्रह्मो उवाच
दूरादपि हि दृश्यन्ते सहिताः सङ्घचारिणः |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३७
भीष्म उवाच
दूरादभ्यागतं चापि तत्पात्रं च विदुर्वुधाः ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३७
युधिष्ठिर उवाच
दूरादभ्यागतं वापि किं पात्रं स्यात्पितामह ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २३
भीष्म उवाच
दूरादानाय़येत्कृत्ये सर्वतश्चाभिपूजय़ेत् ||
४१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
दूरादालक्षितः क्षत्ता तत्राख्यातो महीपतेः |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
दूरादावसथान्मूत्रं दूरात्पादावसेचनम् |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५०
वैशम्पाय़न उवाच
दूरादेव तमालोक्य कृष्णो राजा च धर्मराट् |
८ क
विराट पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
दूरादेव तु तं प्रेक्ष्य राजपुत्रोऽभ्यभाषत |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
दूरादेव परीक्षेत व्राह्मणान्वेदपारगान् |
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४१
भीष्म उवाच
दूरे ग्रामनिवेशश्च तस्माद्देशादिति प्रभो |
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २४
श्रीभगवानु उवाच
दूरेण ह्यवरं कर्म वुद्धिय़ोगाद्धनञ्जय़ |
४९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८
धृतराष्ट्र उवाच
दूरेषुपातिनं दान्तमस्त्रय़ुद्धे च पारगम् ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६०
सञ्जय़ उवाच
दूर्द्यूतदेवी गान्धारिः प्रय़ात्वर्जुनमाहवे ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय २६१
मार्कण्डेय़ उवाच
दूषणं च खरं चैव निहत्य सुमहावलौ |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
दूषणं स्रोतसामत्र वर्णितं च स्थिराम्भसाम् ||
७३ ख
वन पर्व
अध्याय २७१
मार्कण्डेय़ उवाच
दूषणानुजय़ोः पार्थ लक्ष्मणस्य च धीमतः ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय २७०
मार्कण्डेय़ उवाच
दूषणावरजौ चैव वज्रवेगप्रमाथिनौ |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
दूषणेन च नागानामाशङ्काजननेन च |
५० क
अनुशासन पर्व
अध्याय २०
अष्टावक्र उवाच
दूषितं धर्मशास्त्रेषु परदाराभिमर्शनम् ||
६१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
दूषितं परदोषैर्हि गृह्णीते योऽन्यथा शुचिम् |
६६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २५
भीष्म उवाच
दूषय़त्यनभिज्ञाय़ तं विद्याद्व्रह्मघातिनम् ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय १७०
गन्धर्व उवाच
दूषय़न्ति तपस्तेजः क्रोधमुत्पतितं जहि ||
२१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
दूय़ते मे मनो नित्यं स्मरतः पुत्रगृद्धिनः ||
२६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
दूय़ते मे मनोऽभीक्ष्णं घातय़ित्वा महावलम् |
३१ क
विराट पर्व
अध्याय १८
द्रौपद्यु उवाच
दूय़ामि भरतश्रेष्ठ दृष्ट्वा ते भ्रातरं प्रिय़म् |
२६ क
विराट पर्व
अध्याय ४१
अर्जुन उवाच
दृढं च रश्मीन्संय़च्छ शङ्खं ध्मास्याम्यहं पुनः ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
दृढं त्वभिपरीतोऽहमर्जुनेन पुनः पुनः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
दृढं धनुरनाय़म्यं कारय़ामास भारत ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय २०४
मार्कण्डेय़ उवाच
दृढं प्रीतमना विप्रो धर्मव्याधमुवाच ह ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५
शल्य उवाच
दृढं मे रुचितं देवि त्वद्वशोऽस्मि वरानने ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय १०
व्यास उवाच
दृढं वेद्मि परं पुत्रं परं पुत्रान्न विद्यते ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय ७३
केशिन्यु उवाच
दृढं शुच्युपचारोऽसौ न मय़ा मानुषः क्वचित् |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०
ऋषय़ ऊचुः
दृढं सतां सङ्गतं चापि नित्यं; व्रूय़ाच्चार्थं ह्यर्थकृच्छ्रेषु धीरः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९०
भीष्म उवाच
दृढग्राही करोमीति जप्यं जपति जापकः |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
दृढज्यमजरं दिव्यं शरांश्चाशीविषोपमान् ||
११३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६८
भीष्म उवाच
दृढधन्वा महेष्वासः पाण्डवानां रथोत्तमः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
दृढपादप्रतिष्ठाने हुताशनसमत्विषि ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२५
भीष्म उवाच
दृढपूर्वश्रुतं मूर्खं कुपितं हृदय़प्रिय़म् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९
युधिष्ठिर उवाच
दृढपूर्वश्रुता मूढा नैतदस्तीति वादिनः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८७
भीष्म उवाच
दृढप्राकारपरिखं हस्त्यश्वरथसङ्कुलम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६८
भीष्म उवाच
दृढभक्तिं कृतप्रज्ञं धर्मज्ञं संय़तेन्द्रिय़म् |
५७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२३
वासुदेव उवाच
दृढभक्तिरनिन्द्यात्मा श्रुतवाननृशंसवान् |
१५ क