शल्य पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनो भीमसेनश्च मोहय़ां चक्रतुः परान् ||
३६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनो भीमसेनश्च वाय़्वग्निसमतेजसौ |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०५
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनो भीमसेनश्च सात्यकिश्चापराजितः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनो भृशसङ्क्रुद्धः सोऽम्वष्ठं प्रति भारत ||
६० ख
वन पर्व
अध्याय
२४५
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनो यमजौ चोभौ द्रौपदी च यशस्विनी |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनो रथिनां श्रेष्ठो धृष्टद्युम्नमुवाच ह ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनो वार्यमाणस्तु वहुशस्तनय़ेन ते |
५३ क
आदि पर्व
अध्याय
२१४
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनो वासुदेवश्च तूर्णमुत्पत्य तस्थतुः ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७१
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनो वासुदेवश्च त्वरमाणौ महाद्युती |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनो वासुदेवश्च दध्मतुर्वारिजोत्तमौ ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२५
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनो वासुदेवश्च दानवश्च मय़स्तथा ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनो वासुदेवश्च धन्विनौ परमार्चितौ |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनो वासुदेवश्च सैन्धवाय़ैव जग्मतुः ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनो व्यधमच्छिष्टानहितान्निशितैः शरैः ||
७६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनो व्यधमत्काले दिवीवाभ्राणि मारुतः ||
६२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनो व्यधमत्काले दिवीवाभ्राणि मारुतः ||
३४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनो व्यधमत्सैन्यं महावातो घनानिव ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनोत्सङ्गगौ पादौ केशवस्योपलक्षय़े |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७७
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनोऽथ भृशं क्रुद्धो वार्ष्णेय़मिदमव्रवीत् |
३३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनोऽथ सुशर्मादीन्राज्ञस्तान्सपदानुगान् |
४५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनोऽपि धनुर्गृह्य गाण्डीवं लोकविश्रुतम् |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनोऽपि महाराज द्रौणिं विव्याध पत्रिभिः |
४९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२१
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनोऽपि रणे योधांस्तावकान्रथसत्तमान् |
४८ क
विराट पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनोऽपि शरांश्चित्रान्भीष्माय़ निशितान्वहून् |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनोऽपि शरैस्तीक्ष्णैर्वध्यमानो हि संय़ुगे |
७० क
वन पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनोऽप्यथ तत्रैव तस्थौ योगसमन्वितः ||
४५ ख
मौसल पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनोऽस्मीति नामास्मै निवेद्याभ्यवदत्ततः ||
२ ख
विराट पर्व
अध्याय
६६
अर्जुन उवाच
अर्जुनोऽहं महाराज व्यक्तं ते श्रोत्रमागतः |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
अर्जय़ित्वा धनं पूर्वं दारुणैः कृषिकर्मभिः |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
१९५
मार्कण्डेय़ उवाच
अर्णवं खानय़ामास कुवलाश्वो महीपतिः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
अर्थ इत्येव सर्वेषां कर्मणामव्यतिक्रमः |
११ क
वन पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
अर्थ एव हि केषाञ्चिदनर्थो भविता नृणाम् |
४० क
आदि पर्व
अध्याय
११०
वैशम्पाय़न उवाच
अर्थं कामं सुखं चैव रतिं च परमात्मिकाम् |
३८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
अर्थं महान्तमासाद्य विद्यामैश्वर्यमेव वा |
३९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११२
नारद उवाच
अर्थं याचात्र राजानं कञ्चिद्राजर्षिवंशजम् |
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
अर्थकामः शिखां राजा कुर्याद्धर्मध्वजोपमाम् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७५
समङ्ग उवाच
अर्थकामौ परित्यज्य विशोको विगतज्वरः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
अर्थकाले प्रदानं च व्यसनेष्वप्रसङ्गिता ||
५४ ख
आदि पर्व
अध्याय
७७
यय़ातिरु उवाच
अर्थकृच्छ्रमपि प्राप्य न मिथ्या कर्तुमुत्सहे ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
६४
वृहदश्व उवाच
अर्थकृच्छ्रेषु चैवाहं प्रष्टव्यो नैपुणेषु च |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
अर्थकृच्छ्रेषु दुर्गेषु व्यापत्सु स्वजनस्य च |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
अर्थचिन्तापरा यस्य स राज्यफलमश्नुते ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
अर्थजानि विदुः प्राज्ञा दुःखान्येतानि देहिनाम् ||
४१ ख
विराट पर्व
अध्याय
१५
विराट उवाच
अर्थतत्त्वमविज्ञाय़ किं नु स्यात्कुशलं मम ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
१५८
वैशम्पाय़न उवाच
अर्थतत्त्वविभागज्ञः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः |
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
१५९
वैश्रवण उवाच
अर्थतत्त्वविभागज्ञः सर्वधर्मविशेषवित् |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
अर्थतस्ते मम मृतास्तेषां चाहं जनार्दन ||
७१ ख
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
अर्थत्यागो हि कार्यः स्यादर्थं श्रेय़ांसमिच्छता |
६३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
अर्थधर्मातिगो मूढः संरम्भी च जनार्दन |
२ क
वन पर्व
अध्याय
१५८
वैशम्पाय़न उवाच
अर्थधर्मावनादृत्य यः पापे कुरुते मनः |
१२ क