वन पर्व
अध्याय
२३०
वैशम्पाय़न उवाच
ताननादृत्य गन्धर्वांस्तद्वनं विविशुर्महत् ||
६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३१७
नारद उवाच
ताननाद्रिय़माणस्य स्नेहवन्धः प्रमुच्यते ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
तानन्तरिक्षे विशिखैस्त्रिधैकैकमशातय़त् |
४१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
तानन्नदाः प्रपद्यन्ते तस्मादन्नप्रदो भव ||
५० ग
शल्य पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
तानन्ये रथमारोप्य समाश्वास्य मुहूर्तकम् |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
तानन्वय़ुस्तदा वैश्याः शूद्राश्चैव पितामह |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
तानपाक्रमतोऽद्राक्षं तस्माद्देशादरिन्दमान् |
४८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
तानपास्य गताः केचित्पुनरेव युय़ुत्सवः |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
तानपास्य महावाहुः शरजालेन संय़ुगे |
३३ क
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
तानपास्य शरान्मुक्ताञ्शरसङ्घैः प्रतापवान् |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय
२२०
वैशम्पाय़न उवाच
तानपास्य स तत्रैव जगाम लपितां प्रति |
१७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
तानपृच्छत्ततो राजा क्वासौ कौरववंशभृत् |
५ क
विराट पर्व
अध्याय
२
भीम उवाच
तानप्यभिभविष्यामि प्रीतिं सञ्जनय़न्नहम् ||
२ ग
वन पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
तानप्यसौ मातलिरभ्यनन्द; त्पितेव पुत्राननुशिष्य चैनान् |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
२७१
मार्कण्डेय़ उवाच
तानप्यस्य भुजान्सर्वान्प्रगृहीतशिलाय़ुधान् |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५२
सञ्जय़ उवाच
तानप्यस्याकरोन्मोघान्राक्षसो निशितैः शरैः ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
२१४
मार्कण्डेय़ उवाच
तानप्याहुः पारिषदान्व्राह्मणाः सुमहावलान् ||
२९ ख
विराट पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
तानप्राप्ताञ्शितैर्वाणैर्नाराचान्रक्तभोजनान् |
४ क
वन पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
तानप्राप्ताञ्शितैर्वाणैश्चिच्छेद परवीरहा |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
तानप्राप्तान्महावाहुः खगतानेव पाण्डवः |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
तानभिद्रवतः शूरांस्तावका दृढकार्मुकाः |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
तानभिद्रवतः सर्वान्समीक्ष्य शिनिपुङ्गवः |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
तानभिद्रवतो दृष्ट्वा पाण्डवांस्तावकं वलम् |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५७
धृतराष्ट्र उवाच
तानभिप्रेक्ष्य सङ्ग्रामे विशीर्णानिव पर्वतान् |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
तानभ्यनुज्ञाय़ तदातिदुःखा; द्गदं तथैवातिवलं च रामम् ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
तानभ्यापततः प्रेक्ष्य तव पुत्रा महारथाः |
५१ क
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
तानभ्यापततः शीघ्रं हतशेषान्महारणे |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४३
युधिष्ठिर उवाच
तानर्चसि महावाहो सर्वमेतद्वदस्व मे ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
तानर्जुनः प्रत्यगृह्णात्सहदेवजय़े धृतः |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
तानर्जुनः शरैस्तूर्णं निहत्य भरतर्षभ |
३१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
तानर्दितान्रणे तेन राक्षसेन दुरात्मना |
४८ क
वन पर्व
अध्याय
९२
लोमश उवाच
तानलक्ष्मीसमाविष्टान्दर्पोपहतचेतसः |
१० क
वन पर्व
अध्याय
९२
लोमश उवाच
तानलक्ष्मीसमाविष्टान्दानवान्कलिना तथा |
११ क
वन पर्व
अध्याय
९२
लोमश उवाच
तानलज्जान्गतह्रीकान्हीनवृत्तान्वृथाव्रतान् |
९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
तानवस्कन्द्य शिविरे प्रेतभूतान्विचेतसः |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
तानविध्यन्महाराज सर्वानेव त्रिभिस्त्रिभिः ||
३२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
तानविव्रुवतः किञ्चिद्दुःखशोकपराय़णान् |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
२४५
वैशम्पाय़न उवाच
तानवेक्ष्य कृशान्पौत्रान्वने वन्येन जीवतः |
११ क
विराट पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
तानवेक्ष्य हतोत्साहानुत्पातानपि चाद्भुतान् |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
तानव्रवीच्छान्तनवो नाहं गन्ता कथञ्चन |
९६ क
सभा पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
तानव्रवीज्जरासन्धस्तदा यादवपाण्डवान् |
३५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
तानव्रवीत्ततः कर्णः क्रुद्धः सर्प इव श्वसन् |
७ क
वन पर्व
अध्याय
१८२
वैशम्पाय़न उवाच
तानव्रवीत्तत्र मुनिस्तार्क्ष्यः परपुरञ्जय़ः |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
तानव्रवीत्तदा देवो लोकानां प्रभुरीश्वरः |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
देवा ऊचुः
तानव्रवीत्पुनर्देवो मत्तः श्रेष्ठतरो हि यः |
९६ क
आदि पर्व
अध्याय
१३
सूत उवाच
तानव्रवीत्स दृष्ट्वैव जरत्कारुः पितामहान् |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२४४
वैशम्पाय़न उवाच
तानव्रवीत्स राजेन्द्रो वेपमानान्कृताञ्जलीन् |
३ क
वन पर्व
अध्याय
१८२
वैशम्पाय़न उवाच
तानव्रवीत्स विप्रर्षिः कथं वो व्राह्मणो हतः |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
तानव्रवीद्वको वृद्धो विभजध्वं पशूनिति |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६
वृहस्पतिरु उवाच
तानव्रवीन्नहुषो नास्मि शक्त; आप्याय़ध्वं तपसा तेजसा च ||
२४ ख