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मौसल पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्टं मय़ेदं निधनं यदूनां; राज्ञां च पूर्वं कुरुपुङ्गवानाम् |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४७
भीष्म उवाच
दृष्टं श्रुतमनन्तं हि यत्र संशय़दर्शनम् ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
दृष्टं हि सहदेवेन दिशो विजय़ता तदा ||
३२ ख
सभा पर्व
अध्याय ५१
धृतराष्ट्र उवाच
दृष्टं ह्येतद्विदुरेणैवमेव; सर्वं पूर्वं वुद्धिविद्यानुगेन |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८३
मुनिरु उवाच
दृष्टं ह्येतन्मय़ा राजंस्तपोदीर्घेण चक्षुषा ||
३७ ख
सभा पर्व
अध्याय ११
युधिष्ठिर उवाच
दृष्टः पाण्डुर्महाभागः कथं चासि समागतः ||
५० ख
शल्य पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्टः प्रभावं तपसो जैगीषव्यस्य योगजम् ||
२२ ख
सभा पर्व
अध्याय ३९
शिशुपाल उवाच
दृष्टः प्रभावः कृष्णेन जरासन्धस्य धीमतः ||
३ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ४
कृप उवाच
दृष्टद्युम्नमहत्वाजौ नाहं जीवितुमुत्सहे |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
दृष्टपूर्वं महाराज श्रुतपूर्वमथापि वा ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय ७३
केशिन्यु उवाच
दृष्टपूर्वः श्रुतो वापि दमय़न्ति तथाविधः ||
८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २६
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्टपूर्वः स वहुशो राजन्सम्पतता मय़ा |
९ क
वन पर्व
अध्याय ७४
वृहदश्व उवाच
दृष्टपूर्वस्त्वय़ा कश्चिद्धर्मज्ञो नाम वाहुक |
९ क
सभा पर्व
अध्याय ९
नारद उवाच
दृष्टपूर्वा सभा रम्या कुवेरस्य सभां शृणु ||
२५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
व्राह्मण उवाच
दृष्टपूर्वां दिशं चिन्त्य यस्मिन्संनिवसेत्पुरे |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्टपूर्वामपि सतीं नाभ्यजानात्स शन्तनुः ||
३० ख
विराट पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्टपूर्वो मय़ा वीर चरन्त्या पाण्डवान्प्रति ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय २०५
व्याध उवाच
दृष्टमेतत्तय़ा सम्यगेकपत्न्या न संशय़ः ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय ११६
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्टवत्यसि यद्वक्त्रं प्रहृष्टस्य महीपतेः ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्टवत्यस्मि राजेन्द्र सा त्वां पश्यामि चीरिणम् ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय २०६
उलूप्यु उवाच
दृष्टवत्येव कौन्तेय़ कन्दर्पेणास्मि मूर्च्छिता ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय २०९
वर्गो उवाच
दृष्टवत्यो महाभागं देवर्षिमुत नारदम् ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
दृष्टवन्तः स्म तत्रैव भवनं दिव्यमन्तरा ||
३९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
दृष्टवन्तः स्म समरे शरौघैरभिसंवृतम् ||
५२ ख
आदि पर्व
अध्याय १११
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्टवन्तो गिरेरस्य दुर्गान्देशान्वहून्वय़म् |
६ क
वन पर्व
अध्याय ५०
वृहदश्व उवाच
दृष्टवन्तो न चास्माभिर्दृष्टपूर्वस्तथाविधः ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय १४७
हनूमानु उवाच
दृष्टवाञ्शैलशिखरे सुग्रीवं वानरर्षभम् ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
दृष्टवानखिलाँल्लोकान्समस्ताञ्जठरे तव ||
१२३ ख
विराट पर्व
अध्याय ५५
अर्जुन उवाच
दृष्टवानसि तस्याद्य फलमाप्नुहि केवलम् ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
दृष्टवानस्मि गोविन्द तदस्त्रं रुद्रसंनिधौ ||
१३६ ग
द्रोण पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
दृष्टवानस्मि भद्रं ते केशवस्य प्रसादजम् ||
५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्टवानस्मि राजर्षे तत्र पाण्डुं नराधिपम् ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्टवानस्मि राजेन्द्र कुन्तीपुत्रान्महारथान् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय २९३
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्टवान्देवगर्भोऽय़ं मन्येऽस्मान्समुपागतः ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय २०७
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्टवान्पर्वतश्रेष्ठं पुण्यान्याय़तनानि च ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय १५८
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्टश्चापि सुरैः पूर्वं विनाशो यक्षरक्षसाम् ||
४३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३६
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्टश्चेत्त्वं पाण्डवेन व्यपनीतशरासनः |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७
कृष्ण उवाच
दृष्टस्तु प्रथमं राजन्मय़ा पार्थो धनञ्जय़ः ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९६
नारद उवाच
दृष्टस्ते वरुणस्तात पुत्रपौत्रसमावृतः |
१० क
वन पर्व
अध्याय २४१
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्टस्ते विक्रमश्चैव पाण्डवानां महात्मनाम् |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७०
भीष्म उवाच
दृष्टस्तेऽहं प्रतिगच्छस्व तात; शोचत्यसौ तव देहस्य कर्ता |
१८ क
वन पर्व
अध्याय १६४
अर्जुन उवाच
दृष्टस्त्वय़ा महादेवो यथा नान्येन केनचित् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६४
इन्द्र उवाच
दृष्टा धर्माः शतधा शाश्वतेन; क्षात्रेण धर्मेण पुनः प्रवृत्ताः |
२५ क
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
दृष्टा पारे समुद्रस्य त्रिकूटगिरिकन्दरे |
५५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
दृष्टा वः पुरुषाः श्वेताः सर्वेन्द्रिय़विवर्जिताः |
४७ क
वन पर्व
अध्याय १३४
वन्द्यु उवाच
दृष्टा वेदे पञ्चचूडाश्च पञ्च; लोके ख्यातं पञ्चनदं च पुण्यम् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय १४७
हनूमानु उवाच
दृष्टा सा च मय़ा देवी रावणस्य निवेशने |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
दृष्टा हि पुनरावृत्तिर्जीवतामिति नः श्रुतम् ||
१७२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
दृष्टा हि वहवः शूराः शक्रतुल्यपराक्रमाः |
५० क
आदि पर्व
अध्याय १४०
हिडिम्वो उवाच
दृष्टापदानस्तु मय़ा मानुषेष्वेव राक्षसः ||
११ ख