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अनुशासन पर्व
अध्याय ४
भीष्म उवाच
दृष्ट्वा गर्भमनुप्राप्तां भार्यां स च महानृषिः |
३५ क
वन पर्व
अध्याय १७०
अर्जुन उवाच
दृष्ट्वा गाण्डीवसंय़ोगमानीय़ भरतर्षभ ||
४० ख
आदि पर्व
अध्याय १७३
गन्धर्व उवाच
दृष्ट्वा गृहीतं भर्तारमथ व्राह्मण्यभाषत |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वा गोविन्दमाय़ान्तं कृपणं पर्यदेवय़त् ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४९
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा घटोत्कचं राजन्सूतपुत्ररथं प्रति |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
शक्र उवाच
दृष्ट्वा च किमिहागास्त्वं हित्वा दैतेय़दानवान् ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा च कुरुसौवीरसैन्धवानां वलक्षय़म् |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय ७१
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वा च तं पतितं व्रह्मराशि; मुत्थापय़ामास मृतं कचोऽपि |
५० क
आदि पर्व
अध्याय १८९
व्यास उवाच
दृष्ट्वा च तद्विस्मितास्ते वभूवु; स्तेषामिन्द्रस्तत्र शूरो जगाम |
१० क
आदि पर्व
अध्याय २०७
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वा च तां वरारोहां चकमे चैत्रवाहिनीम् |
१६ क
शल्य पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा च तां वेगवता प्रभग्नां; सर्वे त्वदीय़ा युधि योधमुख्याः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
दुर्योधन उवाच
दृष्ट्वा च तां सभां दिव्यां दिव्यपुष्पफलान्विताम् |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा च ते विक्रमं केशवस्य; वलं तथैवास्त्रमवारणीय़म् ||
७५ ख
आदि पर्व
अध्याय ८३
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वा च त्वां विष्ठितं देवमार्गे; शक्रार्कविष्णुप्रतिमप्रभावम् |
९ क
आदि पर्व
अध्याय ८३
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वा च त्वां सूर्यपथात्पतन्तं; वैश्वानरार्कद्युतिमप्रमेय़म् |
८ क
आदि पर्व
अध्याय १६३
गन्धर्व उवाच
दृष्ट्वा च देवकन्यां तां तपतीं चारुहासिनीम् |
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४२
व्राह्मण उवाच
दृष्ट्वा च धर्मध्वजकेतुमालां; प्रकीर्यमाणामुपरि प्रजानाम् ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा च निहताञ्शूरान्पृथङ्माण्डलिकान्नृपान् |
२९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११५
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा च पतितं भीष्मं पुत्रो दुःशासनस्तव |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७०
नाचिकेत उवाच
दृष्ट्वा च परमं हर्षमवापमहमच्युत ||
४१ ख
शल्य पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा च पाण्डवान्सर्वान्कुञ्जरैः परिवारितान् |
३५ क
आदि पर्व
अध्याय ४६
मन्त्रिण ऊचुः
दृष्ट्वा च पितरं तस्मै शापं तं प्रत्यवेदय़त् ||
११ ख
सभा पर्व
अध्याय ४५
दुर्योधन उवाच
दृष्ट्वा च मम तत्सर्वं ज्वररूपमिवाभवत् ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वा च मां धार्तराष्ट्राः प्राहसन्पापचेतसः ||
५५ ख
वन पर्व
अध्याय १६५
अर्जुन उवाच
दृष्ट्वा च मामपृच्छन्त किं करिष्यसि फल्गुन ||
१६ ग
आदि पर्व
अध्याय २०८
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वा च वर्ज्यमानानि मुनिभिर्धर्मवुद्धिभिः ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३६
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा च वान्धवानन्ये पितॄनन्ये पितामहान् ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय २०७
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वा च विधिवत्तानि धनं चापि ददौ ततः ||
९ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा च विमुखान्योधान्धृष्टद्युम्नं च पीडितम् |
४५ क
आदि पर्व
अध्याय २०३
नारद उवाच
दृष्ट्वा च विश्वकर्माणं व्यादिदेश पितामहः |
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा च विहतां माय़ां कर्णेन भरतर्षभ |
६६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३६
शम्वर उवाच
दृष्ट्वा च व्राह्मणानां तु महिमानं महात्मनाम् |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वा च स ततः क्रुद्धः स्कन्दस्तेजोवलान्वितः |
६० क
वन पर्व
अध्याय १३५
लोमश उवाच
दृष्ट्वा च सत्कृतं विप्रै रैभ्यं पुत्रैः सहानघ ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४७
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा च समरे द्रोणं निघ्नन्तं पाण्डवीं चमूम् |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा च सहसाय़ान्तं पाञ्चाल्यो गुरुमात्मनः |
६० क
शान्ति पर्व
अध्याय २०२
भीष्म उवाच
दृष्ट्वा च सहिताः सर्वे दैत्याः सत्त्वममानुषम् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
दृष्ट्वा च सोऽनशत्सिंहो वन्यो भीसन्नवाग्वलः |
३१ क
भीष्म पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा चमूमुखे भीष्मं समकम्पन्त पाण्डवाः |
४२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३९
व्रह्मो उवाच
दृष्ट्वा चादित्यमुद्यन्तं कुचोराणां भय़ं भवेत् |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा चान्यान्वहून्योधान्पातितान्धरणीतले |
४७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११३
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा चारणसिद्धानां विस्मय़ः समपद्यत ||
२४ ख
शल्य पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वा चासीनमनघं समन्तात्परिवारितम् |
२२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६६
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वा चुक्रोश दुःखार्ता वचनं चेदमव्रवीत् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय ५३
वृहदश्व उवाच
दृष्ट्वा चैनं ततोऽपृच्छन्वृत्तान्तं सर्वमेव तत् ||
१३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वा चैनं महात्मानं श्रिय़ा परमय़ा युतम् |
४१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा चैनं महाराज गदय़ाभिनिपीडितम् |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
व्यास उवाच
दृष्ट्वा चैनं वाङ्मनोवुद्धिदेहैः; संहृष्टात्मा मुमुदे देवदेवम् ||
६२ ग
आदि पर्व
अध्याय ३६
सूत उवाच
दृष्ट्वा जगाम नगरमृषिस्त्वास्ते तथैव सः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३
युधिष्ठिर उवाच
दृष्ट्वा ज्ञातिवधं घोरं हतांश्च शतशः परान् |
६ क