chevron_left  सामभिर्यंarrow_drop_down
अनुशासन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
सामभिर्यं च गाय़न्ति सामगाः शुद्धवुद्धय़ः |
४९ क
स्त्री पर्व
अध्याय २६
वैशम्पाय़न उवाच
सामभिश्चाप्यगाय़न्त तेऽन्वशोच्यन्त चापरैः ||
३९ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २३
गान्धार्यु उवाच
सामभिस्त्रिभिरन्तःस्थैरनुशंसन्ति चापरे |
४१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५५
वासुदेव उवाच
सामरानपि लोकांस्त्रीनेकः कर्णो जय़ेद्वली ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३२
भीम उवाच
सामरानपि लोकांस्त्रीन्नानाशस्त्रधरान्युधि |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५३
सञ्जय़ उवाच
सामरानपि लोकांस्त्रीन्निहन्यादिति मे मतिः ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९५
वैशम्पाय़न उवाच
सामरानपि लोकांस्त्रीन्सहस्थावरजङ्गमान् |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५९
वासुदेव उवाच
सामरेष्वपि लोकेषु सर्वेषु न तथाविधः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय १७१
और्व उवाच
सामरैर्हि यदा लोकैर्भृगूणां क्षत्रिय़ाधमैः |
६ क
वन पर्व
अध्याय २३८
वैशम्पाय़न उवाच
सामर्थ्यं किं त्वतः शोके शोचमानौ प्रपश्यथः |
३५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६६
सञ्जय़ उवाच
सामर्थ्यं पाण्डवेय़ानां यथाप्रत्यक्षदर्शनात् ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
सामर्थ्यं शोचतो नास्ति नाद्य शोचाम्यहं ततः ||
८७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३३
सञ्जय़ उवाच
सामर्थ्यमात्मनो ज्ञात्वा ततो गर्जन्ति पण्डिताः ||
२९ ख
सभा पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
सामर्थ्ययोगं सम्प्रेक्ष्य देशकालौ व्ययागमौ |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
सामर्थ्ययोगाज्जाय़न्ते मित्राणि रिपवस्तथा ||
१३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३८
भीष्म उवाच
सामर्थ्ययोगाज्जाय़न्ते मित्राणि रिपवस्तथा ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
सामर्थ्ययोगात्कार्याणां तद्गत्या हि सदा गतिः ||
१३ ख
सभा पर्व
अध्याय १३
श्रीकृष्ण उवाच
सामर्थ्यवन्तः सम्वन्धाद्भवन्तं समुपाश्रिताः ||
५३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
सामर्षं तं नरव्याघ्रं व्याघ्रं निपतितं यथा ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
सामवेदश्च वेदानां यजुषां शतरुद्रिय़म् |
१५९ क
आदि पर्व
अध्याय १६५
गन्धर्व उवाच
सामात्यः सवलश्चैव तुतोष स भृशं नृपः ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय २३७
दुर्योधन उवाच
सामात्यदारो ह्रिय़ते गन्धर्वैर्दिवमास्थितैः ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
सामात्यवन्धुः कर्णो वै तमाह्वय़त माचिरम् ||
३३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
सामात्यवान्धवो राजन्कर्णः प्रहरतां वरः ||
५४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
सामात्यस्य कुरुश्रेष्ठ तत्तुभ्यं तात रोचताम् ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
सामात्यो राजलिङ्गानि सोऽपनीय़ नराधिपः |
२९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १२
धृतराष्ट्र उवाच
सामादिभिरुपन्यस्य शमय़ेत्तान्नृपः सदा ||
११ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ११
धृतराष्ट्र उवाच
सामादिभिरुपाय़ैस्तं क्रमेण विनिवर्तय़ेत् ||
१७ ख
सभा पर्व
अध्याय ७१
विदुर उवाच
सामानि गाय़न्याम्यानि पुरतो याति भारत ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९९
इन्द्र उवाच
सामानि सामगास्तस्य गाय़न्ति यमसादने ||
२२ ख
सभा पर्व
अध्याय ११
नारद उवाच
सामानि स्तुतिशस्त्राणि गाथाश्च विविधास्तथा |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २११
भीष्म उवाच
सामान्यं कपिलो ज्ञात्वा धर्मज्ञानामनुत्तमम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८६
भीष्म उवाच
सामान्यं भोजनं भृत्यैः पुरुषस्य प्रशस्यते ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
भीष्म उवाच
सामान्यमृषिभिर्गत्वा व्रह्मलोकनिवासिभिः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१०
गुरुरु उवाच
सामान्यमेतदुभय़ोरेवं ह्यन्यद्विशेषणम् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६५
इन्द्र उवाच
सामान्यार्थे व्यवहारे प्रवृत्ते; प्रिय़ाप्रिय़े वर्जय़न्नेव यत्नात् |
५ क
वन पर्व
अध्याय २७८
मार्कण्डेय़ उवाच
सामीप्येन हृतं राज्यं छिद्रेऽस्मिन्पूर्ववैरिणा ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
सामुद्रकमुपस्पृश्य त्रिरात्रोपोषितो नरः |
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६३
भीष्म उवाच
सामुद्रकान्स वणिजस्ततोऽपश्यत्स्थितान्पथि |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३५
विदुर उवाच
सामुद्रिकं वणिजं चोरपूर्वं; शलाकधूर्तं च चिकित्सकं च |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
सामुद्रिको राजभृत्यस्तैलिकः कूटकारकः ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २०
वैशम्पाय़न उवाच
सामैव कुरुभिः सार्धमिच्छन्ति कुरुपुङ्गवाः ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२५
भीष्म उवाच
सामैवास्मिन्प्रय़ुय़ुजे न मुमोह न विव्यथे ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
साम्ना ते विनिगृह्यन्ते गजा इव करेणुभिः ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०४
भीष्म उवाच
साम्ना दानेन भेदेन दण्डेन च पुरन्दर ||
३५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३०
कुन्त्यु उवाच
साम्ना दानेन भेदेन दण्डेनाथ नय़ेन च ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४३
अतिथिरु उवाच
साम्ना दानेन भेदेन दण्डेनेति चतुर्विधम् |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
साम्ना दानेन भेदेन दण्डेनैव च पार्थिव ||
७३ ख
वन पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
साम्ना दानेन भेदेन दण्डेनोपेक्षणेन च |
४२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
साम्ना दानेन वा कृष्ण ये न शाम्यन्ति शत्रवः |
१३ क