chevron_left  दृष्ट्वाय़ान्तौarrow_drop_down
कर्ण पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वाय़ान्तौ महावीर्यावुभौ कृष्णधनञ्जय़ौ |
४४ क
स्त्री पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वाय़ोधनमत्युग्रं धर्मज्ञा सुवलात्मजा ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३३
अर्जुन उवाच
दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन |
५१ क
वन पर्व
अध्याय १८७
मार्कण्डेय़ उवाच
दृष्ट्वेमं वृष्णिशार्दूलं स्मृतिर्मामिय़मागता |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०८
गुरुरु उवाच
दृष्ट्वेमं सन्ततं लोकं घटेन्मोक्षाय़ वुद्धिमान् ||
२ ख
सभा पर्व
अध्याय ४३
दुर्योधन उवाच
दृष्ट्वेमां पृथिवीं कृत्स्नां युधिष्ठिरवशानुगाम् |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६१
धृतराष्ट्र उवाच
दृष्ट्वेमां फलनिर्वृत्तिं मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ||
४५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वेमान्स्वजनान्कृष्ण युय़ुत्सून्समवस्थितान् ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वैकं समरे शूरं सौभद्रमपराजितम् ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३४
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वैतां निर्जितां सेनां रणे कर्णेन धीमता |
३१ क
वन पर्व
अध्याय १९०
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वैव च तां तस्या एव तीरे सहैव तय़ा देव्या व्यतिष्ठत् ||
२६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वैव च पपातोर्व्यां सोऽपि दुःखेन मूर्छितः ||
५ ख
शल्य पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वैव च पुरो राजञ्जनः सर्वः स सञ्जय़म् |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वैव च स तां धीमांश्चकमे चारुदर्शनाम् |
५७ ख
वन पर्व
अध्याय १९२
मार्कण्डेय़ उवाच
दृष्ट्वैव चर्षिः प्रह्वस्तं तुष्टाव विविधैः स्तवैः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय ७६
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वैव चागतं शुक्रं यय़ातिः पृथिवीपतिः |
२८ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय २
युधिष्ठिर उवाच
दृष्ट्वैव तं नानुगतः कर्णं परवलार्दनम् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६३
भीष्म उवाच
दृष्ट्वैव तं महात्मानं तस्य भक्तिरजाय़त |
७ क
आदि पर्व
अध्याय २०४
नारद उवाच
दृष्ट्वैव तां वरारोहां व्यथितौ सम्वभूवतुः ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय २११
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वैव तामर्जुनस्य कन्दर्पः समजाय़त |
१५ क
वन पर्व
अध्याय ११३
लोमश उवाच
दृष्ट्वैव तामृश्यशृङ्गः प्रहृष्टः; सम्भ्रान्तरूपोऽभ्यपतत्तदानीम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
दृष्ट्वैव ते परं रूपं द्युतिं च परमामिह |
६८ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वैव नरशार्दूलस्तावग्निसमतेजसौ |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३८
पञ्चचूडो उवाच
दृष्ट्वैव पुरुषं हृद्यं योनिः प्रक्लिद्यते स्त्रिय़ः ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय १३९
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वैव भीमसेनं सा शालस्कन्धमिवोद्गतम् |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७०
भीष्म उवाच
दृष्ट्वैव मामभिमुखमापतन्तं; गृहं निवेद्यासनमादिदेश |
१५ क
विराट पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वैव वाणेन हतं तु नागं; योधांश्च सर्वान्द्रवतो निशम्य |
१४ क
वन पर्व
अध्याय २७०
मार्कण्डेय़ उवाच
दृष्ट्वैव सहसा दीर्णा रणे वानरपुङ्गवाः ||
६ ख
विराट पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वैव हि कुरूनेतान्व्यूढानीकान्प्रहारिणः |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वैव हि परानाजावात्मा प्रव्यथतीव मे ||
१० ग
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
अर्जुन उवाच
दृष्ट्वैव हि सदा भीष्मः पाञ्चाल्यं विनिवर्तते ||
९७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वैवाभिपतन्तं तं शूरः परपुरञ्जय़ः |
८ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वोपविष्टां राजर्षिः पाण्डवो महिषीं प्रिय़ाम् |
१७ क
वन पर्व
अध्याय ५२
वृहदश्व उवाच
देदीप्यमानां वपुषा श्रिय़ा च वरवर्णिनीम् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय २४९
कोटिकाश्य उवाच
देदीप्यमानाग्निशिखेव नक्तं; दोधूय़माना पवनेन सुभ्रूः ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २४
देवा ऊचुः
देव त्वय़ेदं कथितं त्रिदशारिनिवर्हणम् |
९८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६२
भीष्म उवाच
देवं चराचरात्मानं श्रीवत्साङ्कं सुवर्चसम् |
२१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २५
व्राह्मण उवाच
देवं नाराय़णं भीरु सर्वात्मानं निवोध मे ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
वैशम्पाय़न उवाच
देवं परमकं व्रह्म श्वेतं चन्द्राभमच्युतम् |
६१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०
वासुदेव उवाच
देवं मुनिं वा यक्षं वा पतित्वे पतिवत्सला ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
देवं मोक्षे च संसक्तं मोक्षं सक्तं तु न क्वचित् ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
देवः साक्षात्स्वय़ं वज्री समुपाय़ान्महीपतिम् ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
देवकन्या महाभागा दिव्याश्चाप्सरसां गणाः ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
देवकन्याधिरूढैस्तु भ्राजमानैः स्वलङ्कृतैः ||
७८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
देवकन्यानिवासे च तस्मिन्वसति मानवः |
६३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
देवकन्याभिराकीर्णं दिव्याभरणभूषितम् |
५७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
देवकन्यासमारूढै राजतैर्विमलैः शुभैः |
१०१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६३
भीष्म उवाच
देवकन्यासुतः श्रीमान्विद्वान्देवपतिप्रभः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
देवकार्यं हि सुमहत्त्वय़ा कार्यमरिन्दम |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
देवकार्यपरो नित्यं जुह्वानो जातवेदसम् ||
३३ ख