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सभा पर्व
अध्याय ४४
शकुनिरु उवाच
देवने कुशलश्चाहं न मेऽस्ति सदृशो भुवि |
१९ क
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
देवने कुशलैर्जिह्मैर्जितो राज्यं वसूनि च ||
७८ ग
वन पर्व
अध्याय ७७
वृहदश्व उवाच
देवने च मम प्रीतिर्न भवत्यसुहृद्गणैः ||
१४ ख
विराट पर्व
अध्याय ६३
कङ्क उवाच
देवने वहवो दोषास्तस्मात्तत्परिवर्जय़ेत् ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय ७८
वृहदश्व उवाच
देवनेन नरश्रेष्ठ सभार्यो भरतर्षभ ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
अग्निरु उवाच
देवपक्षधराः सौम्याः प्राजापत्या महर्षय़ः |
४९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
वसिष्ठ उवाच
देवपत्न्यश्च कन्याश्च देवानां चैव मातरः |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
देवपत्न्यो देवकन्या देवमातर एव च ||
२१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
देवपुत्रमहं मन्ये क्षत्रिय़ाणां कुलोद्भवम् ||
१५९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९९
सञ्जय़ उवाच
देवपुत्रसमा रूपे शौर्ये शक्रसमा युधि |
२२ क
वन पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
देवपुत्रौ महाभागौ देवराजसमद्युती |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २३
भीष्म उवाच
देवप्रसादादिज्यन्ते यजमाना न संशय़ः ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
देवप्रसादाद्देवेश पुरा प्राह महात्मने ||
७५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३१
जनमेजय़ उवाच
देवप्रसादानुगतं व्यक्तं तत्तस्य दर्शनम् |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
देवभ्राट्तनय़स्तस्य तस्मात्सुभ्राडिति स्मृतः ||
४१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
देवमानुषकाय़ानां कामं भूमिः पराय़णम् |
७१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
देवमानुषलोकौ द्वौ मानसेनैव चक्षुषा |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
देवमानुषय़ोः शक्त्या तेजसा चैव पाण्डवान् |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४१
सञ्जय़ उवाच
देवमाराधय़च्छर्वं गृणन्व्रह्म सनातनम् ||
१२ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ४४
भीष्म उवाच
देवरं प्रविशेत्कन्या तप्येद्वापि महत्तपः |
५० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५६
सौदास उवाच
देवराक्षसनागानामप्रमत्तेन धार्यते ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२
शल्य उवाच
देवराज जहि क्रोधं त्वय़ि क्रुद्धे जगद्विभो |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९९
भीष्म उवाच
देवराज सुदेवोऽय़ं मम सेनापतिः पुरा |
१० क
आदि पर्व
अध्याय २१९
वैशम्पाय़न उवाच
देवराजं तदा यान्तं सह देवैरुदीक्ष्य तु |
२१ क
वन पर्व
अध्याय १६४
अर्जुन उवाच
देवराजं सहस्राक्षमुपातिष्ठं कृताञ्जलिः ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
भीष्म उवाच
देवराजः श्रिय़ं राजन्वाक्यं चेदमुवाच ह ||
१७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९४
जनमेजय़ उवाच
देवराजः सहस्राक्षः क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३
शल्य उवाच
देवराजमथोवाच नहुषं घोरदर्शनम् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय २९४
वैशम्पाय़न उवाच
देवराजमनुप्राप्तं व्राह्मणच्छद्मना वृषः |
१ क
वन पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
देवराजमपि स्थानात्प्रच्यावय़ितुमोजसा ||
३३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७
मरुत्त उवाच
देवराजमुपाश्रित्य तद्विद्धि मुनिपुङ्गव ||
१६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २६
युधिष्ठिर उवाच
देवराजसमाँल्लोकान्गतास्ते सत्यविक्रमाः ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय ८१
जनमेजय़ उवाच
देवराजसमो ह्यासीद्ययातिः पृथिवीपतिः |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
देवराजस्य च क्रीडां नित्यकालमवेक्षते ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय १६९
अर्जुन उवाच
देवराजस्य दय़ितं वज्रमस्त्रं नराधिप ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११
शल्य उवाच
देवराजस्य दय़ितामत्यन्तसुखभागिनीम् ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
देवराजस्य धर्मात्मा प्रिय़ो वहुमतः सखा ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय १७०
अर्जुन उवाच
देवराजस्य भवनं कृतकर्माणमाहवात् ||
६० ख
वन पर्व
अध्याय ५१
वृहदश्व उवाच
देवराजस्य भवनं विविशाते सुपूजितौ ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६
व्यास उवाच
देवराजस्य समय़ं कृतमाङ्गिरसेन ह |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१
पर्वत उवाच
देवराजाभिभूत्यर्थं सङ्कल्पो ह्येष ते हृदि ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय २१९
वैशम्पाय़न उवाच
देवराजे गते राजन्प्रहृष्टौ कृष्णपाण्डवौ |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३५३
भीष्म उवाच
देवराजेन च पुरा कथैषा कथिता शुभा |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
देवराजोपमः श्रीमाञ्श्वेतच्छत्राभिसंवृतः |
१७ ख
वन पर्व
अध्याय १७१
अर्जुन उवाच
देवराजोऽनुगृह्येदं काले वचनमव्रवीत् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय १६४
अर्जुन उवाच
देवराजोऽपि हि मय़ा नित्यमत्रोपलक्षितः |
३८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२
शल्य उवाच
देवराजोऽसि भद्रं ते प्रजा धर्मेण पालय़ ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९४
जनमेजय़ उवाच
देवराज्यं महातेजाः प्राप्तवानखिलं विभुः ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६
वृहस्पतिरु उवाच
देवराज्यमनुप्राप्तः सर्वान्नो वाधते भृशम् ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०२
भीष्म उवाच
देवराज्यमनुप्राप्तः सुकृतेनेह कर्मणा ||
४ ख