शान्ति पर्व
अध्याय
११
शकुनिरु उवाच
देववंशान्पितृवंशान्व्रह्मवंशांश्च शाश्वतान् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११
शकुनिरु उवाच
देववंशान्पितृवंशान्व्रह्मवंशांश्च शाश्वतान् |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३४
भीष्म उवाच
देववत्सततं साध्वी या भर्तारं प्रपश्यति ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
देववन्नरदेवानां नमते यज्जगन्नृप ||
१३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
देवव्रत निवोधेदं वचनं मम भाषतः |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
देवव्रतः कृती भीष्मः प्रेक्षितेनापि निर्दहेत् |
५१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६९
भीष्म उवाच
देवव्रतत्वं विख्याप्य पृथिव्यां सर्वराजसु |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
देवव्रतस्य समरे हेतुं मृत्योर्महात्मनः |
४२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१
धृतराष्ट्र उवाच
देवव्रते तु निहते कुरूणामृषभे तदा |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५४
जनमेजय़ उवाच
देवव्रते महाभागे शरतल्पगतेऽच्युते ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
देवव्रतो महावुद्धिः प्रय़यावनुचिन्तय़न् ||
६४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
देवव्रह्मनृपर्षीणां गणाः पाण्डवतोऽभवन् |
४१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
देवव्रह्मर्षिगन्धर्वान्सर्वान्मधुरय़ा गिरा ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४०
विदुर उवाच
देवव्राह्मणपूजार्थमतिथीनां च भारत ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
देवशत्रुक्षय़करीमजय़्यां विश्वरूपिणीम् ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
देवशर्मा च धौम्यश्च हस्तिकाश्यप एव च ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४३
भीष्म उवाच
देवशर्मा महातेजा यत्तच्छृणु नराधिप ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
देवशर्मा महाभागस्ततो भरतसत्तम ||
४० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
देवशुश्रूषय़ा राज्यं दिव्यं रूपं निय़च्छति ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
अग्निरु उवाच
देवश्रेष्ठस्य लोकादौ वारुणीं विभ्रतस्तनुम् ||
५३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७८
भीष्म उवाच
देवश्रेष्ठाय़ रुद्राय़ सौम्याय़ वहुरूपिणे ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७२
वसिष्ठ उवाच
देवश्रेष्ठोऽसि देवेन्द्र सुरारिविनिवर्हण |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
देवसत्रस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ||
६० ख
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
देवसत्रस्य यत्पुण्यं तदवाप्नोति मानवः ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय
२१३
मार्कण्डेय़ उवाच
देवसेनां दानवैर्यो भग्नां दृष्ट्वा महावलः |
५ क
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
देवसेनापतिस्त्वेवं देवसेनाभिरावृतः |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
देवस्त्रीणामधीवासे नृत्यगीतनिनादिते |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
देवस्थानश्च कण्वश्च तेषां शिष्याश्च सत्तमाः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
देवस्थानेन वात्स्येन तथाश्मकसुमन्तुना ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
देवस्थानेषु चैत्येषु नागानामालय़ेषु च ||
६५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
भीष्म उवाच
देवस्य तीर्थे जलमग्निकल्पा; विगाह्य ते भुक्तविसप्रसूनाः ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
८४
यय़ातिरु उवाच
देवस्य देवस्य निवेशने च; विजित्य लोकानवसं यथेष्टम् |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
वसिष्ठ उवाच
देवस्य महतस्तात वारुणीं विभ्रतस्तनुम् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७४
भीष्म उवाच
देवस्यानुचरास्तत्र तस्थिरे चानलोपमाः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७४
भीष्म उवाच
देवस्यानुमतेऽगच्छन्गङ्गाद्वारमिति श्रुतिः ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
देवह्रद उपस्पृश्य व्रह्मभूतो विराजते ||
४१ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१३०
भीष्म उवाच
देवा अपि विकर्मस्थं यातय़न्ति नराधमम् |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
श्रीभगवानु उवाच
देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६७
भीष्म उवाच
देवा इव सहस्राक्षं प्रजा राजानमन्तिके ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७७
सञ्जय़ उवाच
देवा देवर्षय़श्चैव गन्धर्वाश्च महोरगाः |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३११
भीष्म उवाच
देवा देवर्षय़श्चैव तथा व्रह्मर्षय़ोऽपि च ||
१६ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
देवा देवर्षय़श्चैव रथमारोप्य पाण्डवम् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
देवा देवर्षय़श्चैव सर्वे भागानकल्पय़न् ||
४९ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
वसिष्ठ उवाच
देवा देव्यास्तथा शापादनपत्यास्तदाभवन् ||
५१ ख
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
देवा न तस्य श्रेय़ांसो यस्यात्मापि न कारणम् ||
३२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४१
भीष्म उवाच
देवा नृपतिशार्दूल सहैव वलिभिस्तदा ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६
वृहस्पतिरु उवाच
देवा भीताः शक्रमकामय़न्त; त्वय़ा त्यक्तं महदैन्द्रं पदं तत् |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
देवा ऊचुः
देवा भृगुकुलश्रेष्ठ प्रीताः सत्यपराक्रमाः ||
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६
सूत उवाच
देवा मथितुमारव्धाः समुद्रं निधिमम्भसाम् |
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९९
भीष्म उवाच
देवा मनुष्या गन्धर्वाः पितरोरगराक्षसाः |
८ क