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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५०
व्रह्मो उवाच
देवा मनुष्या गन्धर्वाः पिशाचासुरराक्षसाः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१७
वलिरु उवाच
देवा मनुष्याः पितरो गन्धर्वोरगराक्षसाः |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७३
वाय़ुरु उवाच
देवा मनुष्याः पितरो गन्धर्वोरगराक्षसाः |
२१ क
वन पर्व
अध्याय १९५
मार्कण्डेय़ उवाच
देवा महर्षय़श्चैव स्वानि स्थानानि भेजिरे ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८६
भीष्म उवाच
देवा योनिर्मनुष्याणां देवानाममृतं दिवि |
३२ क
वन पर्व
अध्याय २१६
मार्कण्डेय़ उवाच
देवा वज्रधरं त्यक्त्वा ततः शान्तिमुपागताः ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६४
भीष्म उवाच
देवा वाक्सम्भवाश्चेति देवलस्त्वसितोऽव्रवीत् ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय ३५
सूत उवाच
देवा वासुकिना सार्धं पितामहमथाव्रुवन् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
देवा विश्वसृजो राज्ञो यज्ञमीय़ुर्महात्मनः ||
१६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ११
शकुनिरु उवाच
देवा वै दुष्करं कृत्वा विभूतिं परमां गताः |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
देवा वैकुण्ठ इत्याहुर्वेदा विष्णुरिति प्रभुम् ||
२१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
देवा व्रह्मर्षय़श्चैव शिरोभिर्धरणीं गताः ||
४२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
देवा हविर्भिः पुण्यैश्च रक्षणैः शरणागताः ||
१५ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
देवांश्च गर्हय़ामास धर्मं चैव युधिष्ठिरः ||
५० ख
आदि पर्व
अध्याय १३
सूत उवाच
देवांश्च तर्पय़ामास यज्ञैर्विविधदक्षिणैः |
४२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
देवांश्च प्रणमेत्स्नातो गुरूंश्चाप्यभिवादय़ेत् ||
१३४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
देवांस्तर्पय़ सोमेन स्वधय़ा च पितॄनपि ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९९
याज्ञवल्क्य उवाच
देवाः पितॄणां च सुता देवैर्लोकाः समावृताः |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय २४
देवा ऊचुः
देवाः प्रसादय़ामासुः सारथ्याय़ेति नः श्रुतम् ||
१०६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
शुक्र उवाच
देवाः प्रीणन्ति सततं मानिता मानय़न्ति च |
३६ क
वन पर्व
अध्याय ११४
लोमश उवाच
देवाः सङ्कल्पय़ामासुर्भय़ाद्रुद्रस्य शाश्वतम् ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६५
भीष्म उवाच
देवाः समेत्य व्रह्माणं भूमिभागं यिय़क्षवः |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
देवाः सर्वे नरव्याघ्र वृहस्पतिपुरोगमाः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३९
व्रह्मो उवाच
देवाः सर्वे मुनय़ः साधु दान्ता; स्तं प्राग्यज्ञैर्यज्ञभागं यजन्ते |
१९ क
वन पर्व
अध्याय २४७
देवदूत उवाच
देवाः साध्यास्तथा विश्वे मरुतश्च महर्षिभिः |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
देवाः सोमार्कसंस्थानि यथा सत्रादिभिर्मखैः |
५२ क
आदि पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
देवातिथिः खलु वैदेहीमुपय़ेमे मर्यादां नाम |
२२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
स्नुषो उवाच
देवातिदेवस्तस्मात्त्वं सक्तूनादत्स्व मे विभो ||
५० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
देवातिदेवो देवर्षिर्देवासुरवरप्रदः |
१४३ क
आदि पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
देवानतर्पय़द्यज्ञैः श्राद्धैस्तद्वत्पितृनपि |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८३
वसिष्ठ उवाच
देवानथाव्रवीत्तत्र स्त्रीभावात्परुषं वचः ||
४८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
देवानपि रणे जेतुं प्रार्थय़ामो न संशय़ः |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७७
सञ्जय़ उवाच
देवानपि रणे जेतुं समर्था इति मे मतिः ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६७
यम उवाच
देवानां च पितॄणां च चक्षुष्यास्ते मताः प्रभो ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
देवानां च पितॄणां च पिता ह्येकोऽहमादितः ||
५५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४२
भीष्म उवाच
देवानां च मुनीनां च पितॄणां च महात्मनाम् |
३९ क
आदि पर्व
अध्याय ७
सूत उवाच
देवानां चात्मनो भागं गृहाण त्वं मुखे हुतम् ||
२२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३२४
ऋषय़ ऊचुः
देवानां तु पशुः पक्षो मतो राजन्वदस्व नः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२४
भीष्म उवाच
देवानां तु मतं ज्ञात्वा वसुना पक्षसंश्रय़ात् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
देवानां तु सकाशाद्वै ततः श्रुत्वासितो द्विजः |
११० क
द्रोण पर्व
अध्याय १७३
व्यास उवाच
देवानां त्रिदशश्रेष्ठो दक्षय़ज्ञविनाशनः ||
६४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
देवानां दानवानां च त्रैलोक्यस्य क्षय़ावहः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
देवानां दानवानां च मांसशोणितकर्दमम् ||
४९ ख
आदि पर्व
अध्याय ६१
जनमेजय़ उवाच
देवानां दानवानां च यक्षाणामथ रक्षसाम् |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
धर्म उवाच
देवानां निरय़ान्साधो सर्वानुत्क्रम्य यास्यसि ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय ३४
सूत उवाच
देवानां पन्नगश्रेष्ठास्तीक्ष्णास्तीक्ष्णा इति प्रभो |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
देवानां प्रतिपत्तिश्च सत्या साधुमता सदा |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४१
व्रह्मो उवाच
देवानां प्रभवो देवो मनसश्च त्रिलोककृत् |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८२
भीष्म उवाच
देवानां भगवन्कस्माल्लोकेशानां पितामह |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५
कृष्ण उवाच
देवानां मातरः सर्वा देवपत्न्यः सकन्यकाः ||
२३ ख