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वन पर्व
अध्याय ५५
वृहदश्व उवाच
देवानां मानुषं मध्ये यत्सा पतिमविन्दत |
६ क
वन पर्व
अध्याय १९२
मार्कण्डेय़ उवाच
देवानां मानुषाणां च सर्वभूतसुखावहः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय ५४
वृहदश्व उवाच
देवानां यानि लिङ्गानि स्थविरेभ्यः श्रुतानि मे |
१४ क
वन पर्व
अध्याय २१२
मार्कण्डेय़ उवाच
देवानां वह हव्यं त्वमहं वीर सुदुर्वलः |
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
अग्निरु उवाच
देवानां व्राह्मणानां च त्वं हि कर्ता पितामह ||
५० ख
आदि पर्व
अध्याय ११४
वैशम्पाय़न उवाच
देवानां व्राह्मणानां च सुहृदां चार्थसाधकम् |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६
भीष्म उवाच
देवानां शरणं पुण्यं सर्वं पुण्यैरवाप्यते |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६३
भीष्म उवाच
देवानां शासनात्तावदसङ्ख्येय़ं ददाम्यहम् ||
२१ ग
सभा पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
देवानां सङ्गमं तं तु विज्ञाय़ कुरुनन्दन |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय ९२
स्त्र्यु उवाच
देवानां समय़स्त्वेष वसूनां संश्रुतो मय़ा |
५३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४६
वासुदेव उवाच
देवानां सुमहान्यच्च यच्चास्य विषय़ो महान् |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
देवानां स्वप्रकाशत्वाद्दमाद्दामोदरं विदुः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२८
श्रीभगवानु उवाच
देवानामथ सर्वेषामृषीणां च महात्मनाम् ||
५१ ख
वन पर्व
अध्याय ५५
वृहदश्व उवाच
देवानामन्त्र्य तान्सर्वानुवाचेदं वचस्तदा ||
५ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
देवानामन्त्र्य धर्मात्मा स्वपक्षांश्चैव पार्थिवान् ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
देवानामपि जेतारं यं विदुः पार्थिवा रणे ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६४
भीष्म उवाच
देवानामपि देवं च त्वामाह भगवान्भृगुः |
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
व्राह्मण उवाच
देवानामपि देवत्वं युक्तः कारय़ते वशी |
२५ क
वन पर्व
अध्याय २४७
देवदूत उवाच
देवानामपि मौद्गल्य काङ्क्षिता सा गतिः परा |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६०
भीष्म उवाच
देवानामपि ये देवा यद्व्रूय़ुस्ते परं हि तत् |
४१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
देवानामपि ये देवाः कारणं कारणस्य च |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय २६
सूत उवाच
देवानामपि यो देवः सोऽप्यवर्षदसृक्तदा ||
३१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
देवानामपि यो देवो मुनीनामपि यो मुनिः |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६६
भीष्म उवाच
देवानाममृतं चान्नं नागानां च सुधा तथा |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१
वैशम्पाय़न उवाच
देवानामविहिंसाय़ां यद्भवेन्मानुषक्षमम् |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
देवानामसुराणां च अवध्यस्तनय़ोऽस्तु मे |
२८ क
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
देवानामसुराणां च महानासीत्समागमः |
३ क
सभा पर्व
अध्याय ४५
धृतराष्ट्र उवाच
देवानामिव ते सर्वं वाचि वद्धं न संशय़ः |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४५
सञ्जय़ उवाच
देवानामिव देवेन्द्रे जय़ाशा मे त्वय़ि स्थिता |
६३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
देवानामिव देवेशं पितामहमुपासताम् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२२
वसुहोम उवाच
देवानामीश्वरं चक्रे देवं दशशतेक्षणम् |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८०
भीष्म उवाच
देवानामुपरिष्टाच्च गावः प्रतिवसन्ति वै |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८२
भीष्म उवाच
देवानामुपरिष्टाद्यद्वसन्त्यरजसः सुखम् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय १२१
लोमश उवाच
देवानामेति कौन्तेय़ तथा राज्ञां सलोकताम् |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय २०२
नारद उवाच
देवानामेव भवनं जग्मतुर्युद्धदुर्मदौ ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६३
भीष्म उवाच
देवानामेव वचनात्कुण्डधारं महाद्युतिम् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६९
पुत्र उवाच
देवानामेष वै गोष्ठो यदरण्यमिति श्रुतिः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
नारद उवाच
देवानिष्ट्वा तपस्तप्त्वा कृपणैः पुत्रगृद्धिभिः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय २००
मार्कण्डेय़ उवाच
देवानिष्ट्वा तपस्तप्त्वा कृपणैः पुत्रगृद्धिभिः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
देवानुवाच संहृष्टः सर्वाञ्शक्रपुरोगमान् ||
७५ ख
वन पर्व
अध्याय १८१
मार्कण्डेय़ उवाच
देवानृषीन्प्रेतगणांश्च सर्वा; न्सन्तर्पय़ित्वा विधिना परेण ||
४० ख
भीष्म पर्व
अध्याय २९
श्रीभगवानु उवाच
देवान्देवय़जो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
देवान्न गणय़न्ते च तथा दत्तवरा हि ते ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
देवान्पितॄंश्च उद्दिश्य तस्य धर्मफलं महत् |
५६ ख
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
देवान्पितॄंश्च विधिवत्पुण्यलोके महीय़ते ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४
शङ्ख उवाच
देवान्पितॄनृषींश्चैव मा चाधर्मे मनः कृथाः ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
देवान्पितॄन्मनुष्यांश्च भिक्षूनतिथिपञ्चमान् ||
६३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३७
व्यास उवाच
देवान्पितॄन्मनुष्यांश्च मुनीन्गृह्याश्च देवताः |
२७ क
भीष्म पर्व
अध्याय २५
श्रीभगवानु उवाच
देवान्भावय़तानेन ते देवा भावय़न्तु वः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
देवान्मनुष्यान्गन्धर्वानत्यरिच्यन्त दक्षिणाः ||
२० ख