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आदि पर्व
अध्याय १५४
व्राह्मण उवाच
ददर्शाप्सरसं तत्र घृताचीमाप्लुतामृषिः ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३८
भीष्म उवाच
ददर्शाप्सरसं व्राह्मीं पञ्चचूडामनिन्दिताम् ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय १२१
वैशम्पाय़न उवाच
ददर्शाप्सरसं साक्षाद्घृताचीमाप्लुतामृषिः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
ददर्शार्धासनगतं पाण्डवं वासवस्य ह ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय २६४
मार्कण्डेय़ उवाच
ददर्शावस्थितं राममारात्सौमित्रिणा सह ||
३७ ख
आदि पर्व
अध्याय १६०
गन्धर्व उवाच
ददर्शासदृशीं लोके कन्यामाय़तलोचनाम् ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय ६
वैशम्पाय़न उवाच
ददर्शासीनं धर्मराजं विविक्ते; सार्धं द्रौपद्या भ्रातृभिर्व्राह्मणैश्च ||
६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
ददर्शासीनमव्यग्रं गान्धारीसहितं तदा ||
१६ ख
मौसल पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
ददर्शासीनमेकान्ते मुनिं सत्यवतीसुतम् ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
ददर्शोत्फुल्लनय़नः समस्तं तेजसां निधिम् ||
६० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७६
भीष्म उवाच
ददर्शोद्गारसंवृत्तां सुरभिं मुखजां सुताम् ||
१७ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
ददर्शोष्णोदकैः पूर्णां नदीं चापि सुदुर्गमाम् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
व्यास उवाच
ददस्व चक्षुषी मह्यं प्रिय़ोऽहं ते प्रिय़ोऽसि मे ||
४२ ख
सभा पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
ददस्व मे वरं कृष्ण भय़ार्ताय़ा महाभुज ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
ददस्व वा शक्रपुरं ममैव; युध्यस्व वा भारतमुख्य वीर ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
व्राह्मण उवाच
ददस्वेति त्वय़ा चोक्तं ददामीति तथा मय़ा |
५५ क
वन पर्व
अध्याय २५३
वैशम्पाय़न उवाच
ददाति कस्मैचिदनर्हते तनुं; वराज्यपूर्णामिव भस्मनि स्रुचम् ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
अग्निरु उवाच
ददाति काञ्चनं यो वै दुःस्वप्नं प्रतिहन्ति सः ||
६० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
भीष्म उवाच
ददाति च नरश्रेष्ठ प्रतिगृह्णाति यच्च ह |
९९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
ददाति चान्नं विधिवच्च यश्च; स लोकमाप्नोति पुरन्दरस्य ||
३२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६५
भीष्म उवाच
ददाति तादृशानां वै नरो गाः पापकर्मणाम् |
५० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
ददाति दानं विप्रेभ्यो लोकविश्वासकारकम् ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
अग्निरु उवाच
ददाति पश्चिमां सन्ध्यां यः सुवर्णं धृतव्रतः |
६२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
ददाति यः समुद्रान्तां पृथिवीं शस्त्रनिर्जिताम् |
६३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
ददाति यः सहस्राक्ष स स्वर्गं याति मानवः ||
६० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
ददाति यजते चापि तपस्वी च भवत्यपि |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
महेश्वर उवाच
ददाति यजते यज्ञैः संस्कृतैराप्तदक्षिणैः |
३५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२१
नारद उवाच
ददाति यत्पार्थिव यत्करोति; यद्वा तपस्तप्यति यज्जुहोति |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३१
युधिष्ठिर उवाच
ददाति सर्वमीशानः पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरन् ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४५
भीष्म उवाच
ददाति हि स पिण्डं वै पितुर्मातामहस्य च |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
गण्डो उवाच
ददातु कन्यां शुल्केन विसस्तैन्यं करोति या ||
७२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
ददातु देवः स वरानिहेष्टा; नभिष्टुतो नः प्रभुरव्ययः सदा ||
५५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
ददातु राजा विप्रेभ्यो यथेष्टं क्रिय़तां व्ययः |
११ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
ददातु राजा सर्वेषां यावदस्य चिकीर्षितम् ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
ददात्यमित्रेष्वपि याचितः सं; स्तमात्मवन्तं प्रजहत्यनर्थाः ||
९९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
भीष्म उवाच
ददात्यव्यक्तमेवैतत्प्रतिगृह्णाति तच्च वै ||
९९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ८३
मुनिरु उवाच
ददात्यस्मद्विधोऽमात्यो वुद्धिसाहाय़्यमापदि ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
ददात्यहरहः पूर्वं को नु धर्मतरस्ततः ||
३५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
अग्निरु उवाच
ददात्युदितमात्रे यस्तस्य पाप्मा विधूय़ते |
६१ क
सभा पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
ददानि कं वरं किं वा करवाणि पितृष्वसः |
२० क
वन पर्व
अध्याय १०६
लोमश उवाच
ददानि तव भद्रं ते यद्यत्प्रार्थय़सेऽनघ ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय ४०
भगवानु उवाच
ददानि ते विशालाक्ष चक्षुः पूर्वऋषिर्भवान् |
५४ क
वन पर्व
अध्याय २८१
यम उवाच
ददानि ते सर्वमनिन्दिते वरं; यथा त्वय़ोक्तं भविता च तत्तथा |
२७ क
वन पर्व
अध्याय ४१
भगवानु उवाच
ददानि तेऽस्त्रं दय़ितमहं पाशुपतं महत् |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
भीष्म उवाच
ददानि वां वरं श्रेष्ठं तद्व्रूतामिति भारत ||
५१ ख
वन पर्व
अध्याय १९४
मार्कण्डेय़ उवाच
ददानि वां वरं श्रेष्ठं प्रीतिर्हि मम जाय़ते ||
१८ ग
आदि पर्व
अध्याय १६८
गन्धर्व उवाच
ददानीत्येव तं तत्र राजानं प्रत्युवाच ह |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
ददानीत्येव तं दाशो धर्मात्मा प्रत्यभाषत ||
८९ ख
वन पर्व
अध्याय १६३
अर्जुन उवाच
ददानीत्येव भगवानव्रवीत्त्र्यम्वकश्च माम् ||
४७ ग
वन पर्व
अध्याय २९८
वैशम्पाय़न उवाच
ददानीत्येव भगवानुत्तरं प्रत्यपद्यत |
१४ क