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शान्ति पर्व
अध्याय ५४
भीष्म उवाच
देशजातिकुलानां च धर्मज्ञोऽस्मि जनार्दन ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
देशजातिकुलानां च धर्माः समनुवर्णिताः ||
७१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७७
सञ्जय़ उवाच
देशजाश्च हय़ा राजन्स्वारूढा हय़सादिभिः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६६
भीष्म उवाच
देशधर्मांश्च कौन्तेय़ कुलधर्मांस्तथैव च |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६३
भीष्म उवाच
देशभागे समे चित्रे स्वर्गोद्देशसमप्रभे ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
देशमिष्टं नय़त्याशु धन्विनं पुरुषर्षभ ||
३६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
देशांश्च विविधांश्चित्रान्पूर्ववृत्तांश्च पार्थिवान् |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
देशांस्तत्र प्रवक्ष्यामि तन्मे निगदतः शृणु |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
देशाचारान्समय़ाञ्जातिधर्मा; न्वुभूषते यस्तु परावरज्ञः |
९५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
देशानां च परीमाणं नगराणां च सञ्जय़ |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
देशानां नगराणां च ते नराः स्वर्गगामिनः ||
८८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १०
धृतराष्ट्र उवाच
देशान्तरस्थाश्च नरा विक्रान्ताः सर्वकर्मसु |
१५ क
वन पर्व
अध्याय १४५
वैशम्पाय़न उवाच
देशान्म्लेच्छगणाकीर्णान्नानारत्नाकराय़ुतान् |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३९
श्रीभगवानु उवाच
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ||
२० ख
विराट पर्व
अध्याय ४४
कृप उवाच
देशे काले च विक्रान्तं कल्याणाय़ विधीय़ते ||
३ ग
मौसल पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
देशे गोपशुधान्याढ्ये निवासमकरोत्प्रभुः ||
४३ ख
विराट पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
देशे तस्मिन्भविष्यन्ति तात पाण्डवसंय़ुते ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय ११३
लोमश उवाच
देशे तु देशे तु स पूज्यमान; स्तांश्चैव शृण्वन्मधुरान्प्रलापान् |
१८ क
विराट पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
देशे देशे मनुष्याश्च कीचकं दुष्प्रधर्षणम् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५०
वैशम्पाय़न उवाच
देशे परमधर्मिष्ठे नदीमोघवतीमनु ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय २२९
वैशम्पाय़न उवाच
देशे सर्वगुणोपेते चक्रुरावसथं नराः ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३०
उमो उवाच
देशेषु च विचित्रेषु फलवत्सु समाहिताः |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३०
उमो उवाच
देशेषु रमणीय़ेषु गिरीणां निर्झरेषु च |
१ क
वन पर्व
अध्याय १२९
लोमश उवाच
देशो नाहुषय़ज्ञानामय़ं पुण्यतमो नृप |
३ क
वन पर्व
अध्याय १४०
युधिष्ठिर उवाच
देशो ह्ययं दुर्गतमो मतोऽस्य; तस्मात्परं शौचमिहाचरध्वम् ||
१५ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
देशोऽय़ं कश्च देवानामेतदिच्छामि वेदितुम् ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१०
गुरुरु उवाच
देहं तु परमं विद्याद्विमुक्तमपरिग्रहम् |
२७ क
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
देहं त्यक्त्वा दिवं यातस्तस्य तीर्थस्य तेजसा |
६४ क
शल्य पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
देहं त्यक्त्वा महाभागे त्रिदिवे मय़ि वत्स्यसि ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय ११९
वैशम्पाय़न उवाच
देहं त्यक्त्वा महाराज गतिमिष्टां यय़ुस्तदा ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय ६५
सुदेव उवाच
देहं धारय़तीं दीनां भर्तृदर्शनकाङ्क्षय़ा ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३०
महेश्वर उवाच
देहं वानशने त्यक्त्वा स स्वर्गं समुपाश्नुते ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६७
असित उवाच
देहं विशति कालेन ततोऽय़ं कर्मसम्भवम् ||
३२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ९
युधिष्ठिर उवाच
देहं संस्थापय़िष्यामि निर्भय़ं मार्गमास्थितः ||
३७ ख
आदि पर्व
अध्याय ११०
पाण्डुरु उवाच
देहं सन्धारय़िष्यामि निर्भय़ं मार्गमास्थितः ||
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
स्नुषो उवाच
देहः प्राणश्च धर्मश्च शुश्रूषार्थमिदं गुरोः |
५१ क
वन पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
देहकर्ता प्रशान्तात्मा विश्वात्मा विश्वतोमुखः |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०७
गुरुरु उवाच
देहकर्म नुदन्प्राणानन्तकाले विमुच्यते ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
देहकृद्देहभृद्देही देहभुग्देहिनां गतिः ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
देहदोषांस्तथा ज्ञात्वा तेषां दुःखं च तत्त्वतः |
५० क
आदि पर्व
अध्याय १११
पाण्डुरु उवाच
देहनाशे ध्रुवो नाशः पितृणामेष निश्चय़ः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
देहन्यासः कृतो यत्र क्षत्रिय़ैस्तैर्महात्मभिः ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
देहन्यासे कृतमना विचिन्त्य वहुधा वहु ||
२४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
देहन्यासे मनश्चक्रे तमूचुः प्रणताः प्रजाः |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४३
भीष्म उवाच
देहन्यासो नातिचिरान्मतो मे; न चातितूर्णं सविताद्य याति ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
देहमन्यं गताय़ास्ते यथोक्तं तद्भविष्यति ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय १८९
व्यास उवाच
देहमन्यं गताय़ास्ते यथोक्तं तद्भविष्यति ||
४६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २०३
गुरुरु उवाच
देहमुत्सृज्य वै याति तथैवात्रोपलभ्यते ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
वैशम्पाय़न उवाच
देहवन्धेषु पुरुषः श्रेष्ठः कुरुकुलोद्वह |
६४ क
आदि पर्व
अध्याय २१९
वैशम्पाय़न उवाच
देहवान्वै जटी भूत्वा नदंश्च जलदो यथा |
३६ ख