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उद्योग पर्व
अध्याय ९८
नारद उवाच
दैत्यानां दानवानां च माय़ाशतविचारिणाम् ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
दैत्यानां दानवानां च यक्षाणां च महौजसाम् ||
७६ ख
वन पर्व
अध्याय २१९
मार्कण्डेय़ उवाच
दैत्यानां या दितिर्माता तामाहुर्मुखमण्डिकाम् |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
शुक्र उवाच
दैत्यानां सल्लकीजश्च काङ्क्षितो यश्च तद्विधः ||
४० ख
आदि पर्व
अध्याय २१६
वैशम्पाय़न उवाच
दैत्यान्तकरणीं घोरां नाम्ना कौमोदकीं हरेः ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
दैत्याविव वलोन्मत्तौ रेजतुस्तौ नरोत्तमौ ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
दैत्याश्च कालखञ्जाश्च सर्वे ते नैरृतैः सह ||
५३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३०
श्रीवासुदेव उवाच
दैत्याश्च दानवाश्चैव राक्षसाः पार्थिवास्तथा |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
दैत्येन्द्रं तारकं नाम महावलपराक्रमम् |
६४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
दैत्येन्द्रसेनेव च कौरवाणां; देवेन्द्रसेनेव च पाण्डवानाम् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
दैत्येन्द्रा दानवेन्द्राश्च यांश्चान्याननुशुश्रुम ||
५४ ख
सभा पर्व
अध्याय ११
युधिष्ठिर उवाच
दैत्येन्द्राश्चैव भूय़िष्ठाः सरितः सागरास्तथा ||
४४ ख
आदि पर्व
अध्याय २०१
नारद उवाच
दैत्येन्द्रौ परमप्रीतौ तय़ोश्चैव सुहृज्जनः ||
२९ ख
सभा पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
दैन्यं यथावलवति तथा मोहो वलान्विते |
१३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४६
व्रह्मो उवाच
दैन्यभावाच्च भूतानां संविभज्य सदा वुधः ||
२२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५
व्यास उवाच
दैवं कर्माथ वा पित्र्यं कर्तासि मम चेत्प्रिय़म् ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
दैवं कृतास्त्रतां योगममर्षमपि चाहवे |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३३
वैशम्पाय़न उवाच
दैवं कृत्वा यथान्याय़ं पित्र्यं चक्रे ततः परम् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३७
व्यास उवाच
दैवं च दैवय़ुक्तं च प्राणश्च प्रलय़श्च ह ||
११ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १६
व्राह्मण उवाच
दैवं तत्तु विजानीमो यन्न शक्यं प्रवाधितुम् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७९
भीष्म उवाच
दैवं तात न पश्यामि नास्ति दैवस्य साधनम् |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७७
भगवानु उवाच
दैवं तु न मय़ा शक्यं कर्म कर्तुं कथञ्चन ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय १९२
वैशम्पाय़न उवाच
दैवं तु परमं मन्ये पौरुषं तु निरर्थकम् |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
दैवं तु यत्तत्स्ववशं प्रवृत्तं; तत्पाण्डवान्पाति हिनस्ति चास्मान् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय २३७
व्यास उवाच
दैवं त्रिधातुं त्रिवृतं सुपर्णं; ये विद्युरग्र्यं परमार्थतां च |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
दैवं दैत्यमथो राज्ञां वपुर्धारय़तेऽपि च |
३४ क
विराट पर्व
अध्याय ४५
अश्वत्थामो उवाच
दैवं दैवेन युध्येत मानुषेण च मानुषम् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२१
श्रीभगवानु उवाच
दैवं पित्र्यं च कर्तव्यमिति तस्यानुशासनम् ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२१
श्रीभगवानु उवाच
दैवं पित्र्यं च सततं तस्य विज्ञाय़ तत्त्वतः |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
जम्वुक उवाच
दैवं पुरुषकारश्च कृतान्तेनोपपद्यते ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२१
भीष्म उवाच
दैवं पुरुषकारश्च मोक्षामोक्षौ भय़ाभय़े |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
दैवं पुरुषकारश्च स्थितावन्योन्यसंश्रय़ात् |
७८ क
वन पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
दैवं पुरुषकारेण को निवर्तितुमर्हति |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
दैवं पुरुषकारेण को निवर्तितुमुत्सहेत् ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११७
कर्ण उवाच
दैवं पुरुषकारेण को निवर्तितुमुत्सहेत् ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
दैवं पुरुषकारेण न शक्यमतिवर्तितुम् ||
१८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १६
व्राह्मण उवाच
दैवं पुरुषकारेण न शक्यमतिवर्तितुम् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
दैवं पूर्वं विकुरुते मानुषे कालचोदिते |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
दैवं पूर्वाह्णिके कुर्यादपराह्णे तु पैतृकम् |
२ क
सभा पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
दैवं प्रज्ञां तु मुष्णाति तेजश्चक्षुरिवापतत् |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
दैवं प्रज्ञाविशेषेण को निवर्तितुमर्हति ||
१८६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२७
कर्ण उवाच
दैवं प्रमाणं सर्वस्य सुकृतस्येतरस्य वा |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७८
अर्जुन उवाच
दैवं यद्यस्य वर्मैतद्व्रह्मणा वा स्वय़ं कृतम् |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
दैवं वाप्यथ वा पित्र्यं योऽश्नीय़ाद्व्राह्मणादिषु |
४४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
दैवं वाप्यथ वा पैत्र्यं तं भागं रक्षसां विदुः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
दैवं व्रतं समास्थाय़ यथोक्तं फलमाप्स्यथ ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२१
भीष्म उवाच
दैवं हि परमो दण्डो रूपतोऽग्निरिवोच्छिखः ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
दैवं हि मानुषोपेतं भृशं सिध्यति पार्थिव |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
दैवकर्मकृतश्चैव युक्ताः कामेन कर्मसु ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१९
भीष्म उवाच
दैवतं कतमं ह्येतदुत्तमां गतिमास्थितम् |
१९ क