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वन पर्व
अध्याय १९७
मार्कण्डेय़ उवाच
दैवतं च पतिं मेने भर्तुश्चित्तानुसारिणी ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३३
नारद उवाच
दैवतं च परो यज्ञः परमात्मा सनातनः ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय २८१
मार्कण्डेय़ उवाच
दैवतं त्वाभिजानामि वपुरेतद्ध्यमानुषम् |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
दैवतं देवतानां च भूतानां योऽव्ययः पिता ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६०
भीष्म उवाच
दैवतं परमं विप्राः स्वेन स्वेन परस्परम् |
४० क
उद्योग पर्व
अध्याय ९९
नारद उवाच
दैवतं विष्णुरेतेषां विष्णुरेव पराय़णम् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६०
भीष्म उवाच
दैवतं हि महच्छ्रद्धा पवित्रं यजतां च यत् ||
३९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
महेश्वर उवाच
दैवतद्विजसत्कर्ता सर्वातिथ्यकृतव्रतः |
२८ क
वन पर्व
अध्याय २०५
व्याध उवाच
दैवतप्रतिमो हि त्वं यस्त्वं धर्ममनुव्रतः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय २७८
मार्कण्डेय़ उवाच
दैवतस्येव वचनं प्रतिगृह्येदमव्रवीत् ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११०
गालव उवाच
दैवतानां हि सांनिध्यमत्र कीर्तितवानसि ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
दैवतानि च सर्वाणि पूज्यन्तां भूरिदक्षिणैः |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय २१२
वैशम्पाय़न उवाच
दैवतानि च सर्वाणि व्राह्मणान्स्वस्ति वाच्य च ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय ३१
द्रौपद्यु उवाच
दैवतानि पितॄंश्चैव सततं पार्थ सेवसे ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८४
भीष्म उवाच
दैवतानि प्रसन्नानि दर्शय़न्तु निशां मम ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
दैवतानि प्रसादं हि भक्त्या कुर्वन्ति भारत ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
दैवतानि हि मान्यानि पुरुषेण विशेषतः ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०२
भीष्म उवाच
दैवतान्यर्चय़ंश्चापि विधिवत्स सुरेश्वरः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
दैवतान्यर्चय़ां चक्रुः सर्व एव विशां पते ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५६
भीष्म उवाच
दैवतान्यर्चय़ित्वा हि व्राह्मणांश्च कुरूद्वह |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०५
याज्ञवल्क्य उवाच
दैवतान्यवजानाति व्राह्मणैश्च विरुध्यते |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
विश्वावसुरु उवाच
दैवतेभ्यः पितृभ्यश्च दैत्येभ्यश्च ततस्ततः |
६१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय २
कृप उवाच
दैवतेभ्यो नमस्कृत्य यस्त्वर्थान्सम्यगीहते |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय ३८
विदुर उवाच
दैवतेषु च यत्नेन राजसु व्राह्मणेषु च |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
पशुसख उवाच
दैवतेष्वनमस्कारो विसस्तैन्यं करोति यः ||
७४ ख
वन पर्व
अध्याय १९७
स्त्र्यु उवाच
दैवतेष्वपि सर्वेषु भर्ता मे दैवतं परम् |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२०
भीष्म उवाच
दैवतैरपि विप्रर्षे तं त्वं किमनुशोचसि ||
३५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
दैवतैरपि सम्भग्ना जितकाशिभिराहवे ||
२७ ख
विराट पर्व
अध्याय ४४
कृप उवाच
दैवतैरप्यवध्यास्ते एकेन युधि पातिताः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय ४३
अर्जुन उवाच
दैवतैर्वा समारोढुं दानवैर्वा रथोत्तमम् ||
१६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
दैवदण्डमिमं घोरं स हि मे नाशय़िष्यति ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय १११
तापसा ऊचुः
दैवदिष्टं नरव्याघ्र कर्मणेहोपपादय़ |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२७
कर्ण उवाच
दैवदृष्टोऽन्यथाभावो न मन्ये विद्यते क्वचित् ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७५
भगवानु उवाच
दैवमप्यकृतं कर्म पौरुषेण विहन्यते |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३३
सञ्जय़ उवाच
दैवमस्य ध्रुवं तत्र साहाय़्याय़ोपपद्यते ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३३
मातो उवाच
दैवमानुषय़ुक्तेन सद्भिराचरितेन च ||
८ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ६
भीष्म उवाच
दैवमानुषय़ोः किं स्वित्कर्मणोः श्रेष्ठमित्युत |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२४
भीष्म उवाच
दैवमित्यपरे विप्राः स्वभावं भूतचिन्तकाः ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३०
व्यास उवाच
दैवमेके प्रशंसन्ति स्वभावं चापरे जनाः ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
दैवमेव परं मन्ये धिक्पौरुषमनर्थकम् |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११०
धृतराष्ट्र उवाच
दैवमेव परं मन्ये धिक्पौरुषमनर्थकम् |
१ क
वन पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
दैवमेव परं मन्ये पुरुषार्थो निरर्थकः ||
२७ ख
सभा पर्व
अध्याय ४३
दुर्योधन उवाच
दैवमेव परं मन्ये पौरुषं तु निरर्थकम् |
३२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५८
धृतराष्ट्र उवाच
दैवमेव परं मन्ये पौरुषादपि सञ्जय़ |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
दैवमेव परं मन्ये यत्कर्णो हस्तसंस्थय़ा |
७ क
सभा पर्व
अध्याय ४५
धृतराष्ट्र उवाच
दैवमेव परं मन्ये येनैतदुपपद्यते ||
५७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २६
श्रीभगवानु उवाच
दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय ३४
सूत उवाच
दैवमेवाश्रय़ामोऽत्र शृणुध्वं च वचो मम ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
भीष्म उवाच
दैवरातिर्नरपतिरासीनस्तत्र मोक्षवित् ||
९२ ख
विराट पर्व
अध्याय १९
द्रौपद्यु उवाच
दैवस्य चागमे यत्नस्तेन कार्यो विजानता ||
८ ख