शान्ति पर्व
अध्याय
१५२
भीष्म उवाच
दैवात्सर्वे गुणवन्तो भवन्ति; शुभाशुभा वाक्प्रलापा यथैव ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय
८७
यय़ातिरु उवाच
दैवादेशादापदं प्राप्य विद्वां; श्चरेन्नृशंसं न हि जातु राजा ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
दैवाद्वा पुरुषव्याघ्र तव चापनय़ान्नृप ||
४७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५३
वासुदेव उवाच
दैवानि चैव कर्माणि विद्धि सर्वं मदात्मकम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
दैवानि स व्यूहशतानि सप्त; रक्तो हरिद्रोऽथ तथैव शुक्लः |
४५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
सञ्जय़ उवाच
दैवाय़त्तमहं मन्ये जय़ं सुवलिनामपि |
५८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३८
श्रीभगवानु उवाच
दैवी सम्पद्विमोक्षाय़ निवन्धाय़ासुरी मता |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२९
श्रीभगवानु उवाच
दैवी ह्येषा गुणमय़ी मम माय़ा दुरत्यया |
१४ क
विराट पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
दैवीं माय़ां रथे युक्त्वा विहितां विश्वकर्मणा |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
दैवीं माय़ामिमां कृत्वा सलिलान्तर्गतो ह्ययम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
दैवीं सिद्धिं मानुषीं दण्डनीतिं; योगन्याय़ैः पालय़ित्वा महीं च |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
दैवे कर्मणि पित्र्ये तु न्याय़्यमाहुः परीक्षणम् ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७७
भगवानु उवाच
दैवे च मानुषे चैव संय़ुक्तं लोककारणम् ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
दैवे पित्र्ये च सततं तं भागं रक्षसां विदुः ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६
युधिष्ठिर उवाच
दैवे पुरुषकारे च किं स्विच्छ्रेष्ठतरं भवेत् ||
१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
२
कृप उवाच
दैवे पुरुषकारे च परं ताभ्यां न विद्यते ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
दैवे पुरुषकारे च लोकोऽय़ं हि प्रतिष्ठितः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०५
मुनिरु उवाच
दैवे प्रतिनिविष्टे च किं श्रेय़ो मन्यते भवान् ||
५३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
दैवे रात्र्यहनी वर्षं प्रविभागस्तय़ोः पुनः |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
दैवे वाप्यथ वा पित्र्ये राजन्नार्हन्ति केतनम् ||
१३ ख
विराट पर्व
अध्याय
१९
द्रौपद्यु उवाच
दैवेन किल यस्यार्थः सुनीतोऽपि विपद्यते |
८ क
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
दैवेन विधिना पार्थ तद्दैवमिति निश्चितम् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
६९
वृहदश्व उवाच
दैवेन विधिना युक्ताः शास्त्रोक्तैश्च विरूपणैः ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
धृतराष्ट्र उवाच
दैवेनैव हता यूय़ं स्ववुद्ध्या केशवस्य च |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
दैवेनोपहतः पार्थो विपरीतश्च मानद |
१६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
२
कृप उवाच
दैवेनोपहतास्ते तु नात्र कार्या विचारणा ||
३३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
दैवेनोपहते राजा कर्मकाले महाद्युते |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
३४
सूत उवाच
दैवेनोपहतो राजन्यो भवेदिह पूरुषः |
३ क
सभा पर्व
अध्याय
६३
विदुर उवाच
दैवेरितो नूनमय़ं पुरस्ता; त्परोऽनय़ो भरतेषूदपादि ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
दैवेष्वपेक्षका ह्येते शश्वद्भावेषु भारत ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३८
श्रीभगवानु उवाच
दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२७
कर्ण उवाच
दैवोपसृष्टः पुरुषो यत्कर्म कुरुते क्वचित् |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०२
भृगुरु उवाच
दैवोपहतचित्तत्वादात्मनाशाय़ मन्दधीः ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
दैवोपहतचित्तेन यन्मय़ापकृतं पुरा |
५८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
दैवोपहतवुद्धित्वान्न तां कर्णो विमुक्तवान् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४१
भीष्म उवाच
दैवय़ोगविमूढस्य नान्या वृत्तिररोचत ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
दैवय़ोगात्तु ते वाणा नातरन्मर्मभेदिनः |
५३ क
स्त्री पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
दैवय़ोगात्समुत्पन्ना भ्रातरश्चास्य तादृशाः ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
दैशिकाश्चारकाश्चैव तदष्टाङ्गं वलं स्मृतम् ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७२
भीष्म उवाच
दोग्धि धान्यं हिरण्यं च प्रजा राज्ञि सुरक्षिता |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
दोग्ध्री वासांसि रत्नानि पशून्व्रीहिय़वांस्तथा |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६३
नारद उवाच
दोग्ध्रीं दत्त्वा सवत्सां तु नक्षत्रे सोमदैवते |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०६
भगीरथ उवाच
दोग्ध्रीणां वै गवां चैव प्रय़ुतानि दशैव ह |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३६
व्यास उवाच
दोग्ध्रीणां स च पापेभ्यः सर्वेभ्यो विप्रमुच्यते ||
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
दोग्ध्रीश्च धेनूश्च सहस्रशो वै; सुवाससः काञ्चनवद्धशृङ्गीः |
३० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७४
वैशम्पाय़न उवाच
दोधूय़ता चामरेण श्वेतेन च महारथः ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
दोधूय़मानः शुशुभे विद्युद्भिरिव तोय़दः ||
२६ ख
विराट पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
दोधूय़मानस्य भृशं गाण्डीवस्य च निस्वनम् ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
दोधूय़माना रथिनां शोभय़न्ति महारथान् ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
दोर्भ्यां विस्फारय़न्भासि महाजलदवद्भृशम् ||
१४ ख