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शल्य पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
दोर्भ्यां शव्दं ततश्चक्रे त्रासय़ानो महाद्विपान् ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय २७१
मार्कण्डेय़ उवाच
दोर्भ्यामादाय़ सुग्रीवं कुम्भकर्णोऽहरद्वलात् ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४९
सञ्जय़ उवाच
दोर्भ्यामिन्द्रध्वजाभाभ्यां निष्पिपेष महीतले ||
२२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
दोर्भ्यामुत्क्षिप्य वेगेन वक्षस्येनमताडय़त् ||
५३ ख
वन पर्व
अध्याय ५९
वृहदश्व उवाच
दोलेव मुहुराय़ाति याति चैव सभां मुहुः ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४२
वैशम्पाय़न उवाच
दोषं परिहरन्ती च पितुश्चारित्ररक्षिणी ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २२
धृतराष्ट्र उवाच
दोषं ह्येषां नाधिगच्छे परिक्ष; न्नित्यं कञ्चिद्येन गर्हेय़ पार्थान् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
जनमेजय़ उवाच
दोषः कालपरीमाणे महानेष क्रिय़ावताम् ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय १०१
वैशम्पाय़न उवाच
दोषतः कं गमिष्यामि न हि मेऽन्योऽपराध्यति ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
दोषदर्शी तु गार्हस्थ्ये यो व्रजत्याश्रमान्तरम् |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१७
नारद उवाच
दोषदर्शी भवेत्तत्र यत्र रागः प्रवर्तते |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३३
सञ्जय़ उवाच
दोषमत्र न पश्यामि शूराणां रणमूर्धनि |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६४
भीष्म उवाच
दोषस्त्वस्य महानेको येनैष भरतर्षभ |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३४८
नाग उवाच
दोषस्य हि वशं गत्वा दशग्रीवः प्रतापवान् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय १९९
मार्कण्डेय़ उवाच
दोषस्यैतस्य वै व्रह्मन्विघाते यत्नवानहम् ||
२ ग
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
दोषांश्च मन्त्रभेदेषु व्रूय़ास्त्वं मन्त्रिमण्डले |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २०
स्त्र्यु उवाच
दोषांश्च मन्दान्मन्दासु प्रजापतिरभाषत ||
६७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
दोषांश्च लोभमोहादीनर्थेषु युवतिष्वथ |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११५
भीष्म उवाच
दोषांस्तु भक्षणे राजन्मांसस्येह निवोध मे |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
दोषाणां च गुणानां च प्रमाणं प्रविभागशः |
८२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०५
गुरुरु उवाच
दोषाणामेवमादीनां परीक्ष्य गुरुलाघवम् |
२४ क
वन पर्व
अध्याय २७८
अश्वपतिरु उवाच
दोषानप्यस्य मे व्रूहि यदि सन्तीह केचन ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२०
भीष्म उवाच
दोषान्विवृणुय़ाच्छत्रोः परपक्षान्विधूनय़ेत् |
११ क
वन पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
दोषान्स्वान्नार्हसेऽन्यस्मै वक्तुं स्ववलदर्पितः |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२३
वासुदेव उवाच
दोषाश्चास्य समुच्छिन्नास्तस्मात्सर्वत्र पूजितः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
दोषेषु समतां नेतुमैच्छन्नशुभवुद्धय़ः ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७६
नारद उवाच
दोषैरन्यान्गुणवतः क्षिपन्त्यात्मगुणक्षय़ात् ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः |
४३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४३
सनत्सुजात उवाच
दोषैरेतैर्विमुक्तं तु गुणैरेतैः समन्वितम् |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०५
गुरुरु उवाच
दोषैर्मूलादवच्छिन्नैर्विशुद्धात्मा विमुच्यते |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
दोषैर्विय़ुक्ताः प्रथितैस्ते ग्राह्याः पार्थिवेन ह ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १
सर्प उवाच
दोषो नैव परीक्ष्यो मे न ह्यत्राधिकृता वय़म् ||
५२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
युधिष्ठिर उवाच
दोषो भक्षय़तः कः स्यात्कश्चाभक्षय़तो गुणः ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
दौःशासनिं च विक्रान्तं लक्ष्मणं चात्मजावुभौ ||
३३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २६
वैशम्पाय़न उवाच
दौःशासनिं लक्ष्मणं च धृष्टकेतुं च पार्थिवम् ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
दौःशासनिरथं साश्वं गदय़ा समपोथय़त् ||
८ ग
द्रोण पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
दौःशासनिरथोत्थाय़ कुरूणां कीर्तिवर्धनः |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
दौःशासनिर्महाराज सौभद्रं हतवान्रणे ||
६४ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
दौःषन्तिर्यत्र भरतस्तत्र त्वं विहरिष्यसि ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
दौःषन्तो वंश उच्छिद्यते इति ||
५६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
दौरात्म्यं चापि कर्णस्य विदित्वा तमुवाच ह ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९१
भगवानु उवाच
दौरात्म्यं धार्तराष्ट्रस्य क्षत्रिय़ाणां च वैरिताम् |
४ क
वन पर्व
अध्याय २४५
वैशम्पाय़न उवाच
दौरात्म्यमनुपश्यंस्तत्काले द्यूतोद्भवस्य हि ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२१
भीष्म उवाच
दौर्भाग्यं भागधेय़ं च पुण्यापुण्ये गुणागुणौ ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७४
अम्वो उवाच
दौर्भाग्यं व्राह्मणश्रेष्ठास्तस्मात्तप्स्याम्यहं तपः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५४
सञ्जय़ उवाच
दौर्योधनं तद्वलमार्तरूप; मावर्तमानं ददृशे भ्रमन्तम् ||
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
दौर्योधनिस्तु सङ्क्रुद्धः सौभद्रं नवभिः शरैः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
दौर्वल्यात्सज्जते वाङ्मे स कथं वक्तुमुत्सहे |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३२
विदुरो उवाच
दौर्वल्यादासते मूढा व्यसनौघप्रतीक्षिणः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१७
वलिरु उवाच
दौष्कुलेय़स्तथा मूढो दुर्जातः शक्र दृश्यते |
३३ क