उद्योग पर्व
अध्याय
९७
नारद उवाच
धक्ष्यते मातले सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
धक्ष्यन्ति क्षत्रिय़ान्सर्वान्प्रय़ुक्तानि पुनः पुनः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
वासुदेव उवाच
धक्ष्यन्ति वाग्वलाः पापं ततो नाशं गमिष्यति ||
४६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७२
भीमसेन उवाच
धक्ष्यन्ते शिशिरापाय़े वनानीव हुताशनैः ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
धक्ष्यमाणौ शरव्रातैर्नोदीक्षितुमशक्नुताम् ||
२६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३८
कुन्त्यु उवाच
धक्ष्यामि त्वां च विप्रं च येन दत्तो वरस्तव ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७६
भीष्म उवाच
धक्ष्याम्येनं रणे भद्रे सामात्यं शस्त्रतेजसा ||
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११२
नारद उवाच
धत्ते धारय़ते चेदमेतस्मात्कारणाद्धनम् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
गृध्र उवाच
धनं गाश्च सुवर्णं च मणिरत्नमथापि च |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
११०
लोमश उवाच
धनं च प्रददौ भूरि रत्नानि विविधानि च ||
३५ ख
सभा पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
धनं च वहु वार्ष्णेय़ त्वत्प्रसादादुपार्जितम् ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
धनं च विविधं तुभ्यमित्युक्त्वान्तरधीय़त ||
३ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
धनं चास्मै ददुर्भूरि प्रीय़माणा महारथाः ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
धनं चैषामाहरत्सव्यसाची; सेनानुगान्वलिदांश्चैव चक्रे ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
१९७
स्त्र्यु उवाच
धनं तु व्राह्मणस्याहुः स्वाध्याय़ं दममार्जवम् |
३८ क
वन पर्व
अध्याय
२६१
राजो उवाच
धनं ददानि कस्याद्य ह्रिय़तां कस्य वा पुनः |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०८
धृतराष्ट्र उवाच
धनं धनेश्वरस्येव हृत्वा पार्थस्य मे सुतः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१
देवस्थान उवाच
धनं धर्मप्रधानेष्टं मनुः स्वाय़म्भुवोऽव्रवीत् |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११८
कीट उवाच
धनं धान्यं प्रिय़ान्दारान्यानं वासस्तथाद्भुतम् |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
धनं प्राप्नोति तपसा मौनं ज्ञानं प्रय़च्छति |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
धनं भोज्यं पुत्रदारं समृद्धिं; सर्वो लुव्धः प्रार्थय़ते परेषाम् |
४६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
धनं यदक्षय़ं ध्रुवं समर्जय़स्व तत्स्वय़म् ||
४७ ख
विराट पर्व
अध्याय
४५
अश्वत्थामो उवाच
धनं यैरधिगन्तव्यं यच्च कुर्वन्न दुष्यति ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७
भीष्म उवाच
धनं लभेत दानेन मौनेनाज्ञां विशां पते |
१४ क
सभा पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
धनं वहुविधं दत्त्वा तेभ्य एव च वीर्यवान् ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०५
मुनिरु उवाच
धनं वा पुरुषं राजन्पुरुषो वा पुनर्धनम् |
४५ क
विराट पर्व
अध्याय
४६
द्रोण उवाच
धनं वालभमानोऽत्र नाद्य नः क्षन्तुमर्हति ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
धनं विश्वासतो न्यस्तं मिथो भूय़िष्ठशो नराः |
५० क
शान्ति पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
धनं सुवर्णं रजतं वासांसि विविधानि च ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३४
भीष्म उवाच
धनं हि क्षत्रिय़स्येह द्वितीय़स्य न विद्यते ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
धनज्येष्ठाः स्मृता वैश्याः शूद्रास्तु वय़साधिकाः ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
धनञ्जय़ कथं शक्यमस्माभिर्योद्धुमाहवे |
३ क
सभा पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
धनञ्जय़ कथं स्वित्स्यादपत्यमभिमृष्टजम् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
धनञ्जय़ कृतं पापं कल्याणेनोपहन्यते |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६७
सञ्जय़ उवाच
धनञ्जय़ गुरुं श्रुत्वा तत्र नादं सुभीषणम् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९
युधिष्ठिर उवाच
धनञ्जय़ न मे वुद्धिमभिशङ्कितुमर्हसि ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७३
गन्धर्व उवाच
धनञ्जय़ निवोधेदं यन्मां त्वं परिपृच्छसि |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
धनञ्जय़ महावाहो मानितोऽस्मि दृढं त्वय़ा |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
धनञ्जय़ महावाहो शिरसो मेऽस्य लम्वतः |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२१
सञ्जय़ उवाच
धनञ्जय़ शिरश्छिन्धि सैन्धवस्य दुरात्मनः |
१६ क
विराट पर्व
अध्याय
५
युधिष्ठिर उवाच
धनञ्जय़ समुद्यम्य पाञ्चालीं वह भारत |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
धनञ्जय़ं च गोविन्द यमौ तं च वृकोदरम् ||
७० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२३
धृतराष्ट्र उवाच
धनञ्जय़ं च मे शंस यद्यच्चक्रे रथर्षभः |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
धनञ्जय़ं च सम्प्रेक्ष्य धर्मराजस्य पश्यतः |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
धनञ्जय़ं दीर्घवाहुं सर्वलोकमहारथम् ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
धनञ्जय़ं द्वादशभिराजघान शिलीमुखैः ||
७८ ग
वन पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
धनञ्जय़ं धर्मराजो रहसीदमुवाच ह ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
धनञ्जय़ं न पश्यामि का शान्तिर्हृदय़स्य मे ||
६९ ख
विराट पर्व
अध्याय
६६
वैशम्पाय़न उवाच
धनञ्जय़ं पुरस्कृत्य दिष्ट्या दिष्ट्येति चाव्रवीत् ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
धनञ्जय़ं भूतगणाः साधु साध्वित्यपूजय़न् ||
२७ ख