आदि पर्व
अध्याय
१
महाभारत कथा
अपृच्छत्स तपोवृद्धिं सद्भिश्चैवाभिनन्दितः ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३४
उमो उवाच
अपृच्छद्देवमहिषी स्त्रीधर्मं धर्मवत्सला |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
३६
सूत उवाच
अपृच्छद्धनुरुद्यम्य तं मुनिं क्षुच्छ्रमान्वितः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
२६३
मार्कण्डेय़ उवाच
अपृच्छद्राघवो गृध्रं रावणः कां दिशं गतः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२२
भीष्म उवाच
अपृच्छद्वसुहोमस्तं राजन्किं करवाणि ते ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
अपृच्छद्वाष्पसंरुद्धो निस्वनां वाचमीरय़न् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९
युधिष्ठिर उवाच
अपृच्छन्कस्यचिन्मार्गं व्रजन्येनैव केनचित् |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
अपृच्छन्क्षत्रिय़ांस्तत्र क्व नु दुर्योधनो गतः ||
३६ ग
सभा पर्व
अध्याय
१६
कृष्ण उवाच
अपृच्छन्नवहेमाभां राक्षसीं तामराक्षसीम् ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२४
भीष्म उवाच
अपृच्छन्सहसाभ्येत्य वसुं राजानमन्तिकात् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३०
व्यास उवाच
अपृथग्दर्शिनः सर्वे ऋक्सामसु यजुःषु च |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
अपृथग्धर्मिणो मर्त्या ऋक्सामानि यजूंषि च |
६३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
अपृष्टस्तस्य तद्व्रूय़ाद्यस्य नेच्छेत्पराभवम् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
भीष्म उवाच
अपृष्टो नोत्सहे वक्तुं धर्ममेनं युधिष्ठिर ||
५ ख
सभा पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
अपृष्ट्वा विदुरं ह्यस्य नासीत्कश्चिद्विनिश्चय़ः |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३५
व्यास उवाच
अपेतं व्राह्मणं वृत्ताद्यो हन्यादातताय़िनम् |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
अपेतकर्णाः पुत्रास्ते राजानश्चैव तावकाः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६२
कपिल उवाच
अपेतकामक्रोधानां प्रकृत्या संशितात्मनाम् |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९४
नरनाराय़णावू ऊचतुः
अपेतक्रोधलोभोऽय़माश्रमो राजसत्तम |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६३
भीष्म उवाच
अपेतगृहधर्मोऽपि चरेज्जीवितकाम्यया ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
२९६
वैशम्पाय़न उवाच
अपेतजननिर्घोषं प्रविवेश महावनम् |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८८
हंस उवाच
अपेतदोषानिति तान्विदित्वा; दूराद्देवाः सम्परिवर्जय़न्ति ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
अपेतधर्मव्यवहारवृत्तं; सहेत तत्पाण्डव कस्त्वदन्यः ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
७१
वैशम्पाय़न उवाच
अपेतधर्मो व्रह्महा चैव स स्या; दस्मिँल्लोके गर्हितः स्यात्परे च ||
५४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३७
व्यास उवाच
अपेतनिन्दास्तुतिरप्रिय़ाप्रिय़; श्चरन्नुदासीनवदेष भिक्षुकः ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
अपेतमुपपन्नार्थमष्टादशगुणान्वितम् ||
७८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
अपेतविध्वस्तमहार्हभूषणं; निपातितं शक्रसमं महारथम् |
५३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२६
व्राह्मण उवाच
अपेतव्रतकर्मा तु केवलं व्रह्मणि श्रितः |
१६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
अपेतशस्त्रसंनाहान्संरव्धान्पाण्डुसृञ्जय़ान् |
७४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
अपेतशिशिरे काले समिद्धमिव पावकः |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
१७९
वैशम्पाय़न उवाच
अपेतार्कप्रभाजालाः सविद्युद्विमलप्रभाः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
अपेत्य राष्ट्राद्वसतां तु तेषा; मृषिः पुराणोऽतिथिराजगाम |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९५
वसिष्ठ उवाच
अपेत्याहमिमां हित्वा संश्रय़िष्ये निरामय़म् ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय
१९७
स्त्र्यु उवाच
अपेय़ः सागरः क्रोधात्कृतो हि लवणोदकः ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
अपेय़ः सागरो येषामभिशापान्महात्मनाम् |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
अपेय़ात्किल भाः सूर्याल्लक्ष्मीश्चन्द्रमसस्तथा |
७१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९५
वैशम्पाय़न उवाच
अपैतु ते मनस्तापो यथासत्यं व्रवीम्यहम् |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
महेश्वर उवाच
अपैशुन्यरताः सन्तस्ते नराः स्वर्गगामिनः ||
२१ ख
सभा पर्व
अध्याय
४३
दुर्योधन उवाच
अपो वापि प्रवेक्ष्यामि न हि शक्ष्यामि जीवितुम् ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८१
पराशर उवाच
अपो हि प्रय़तः शीतास्तापिता ज्वलनेन वा |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
अपोवाह कृपः शल्यं तूर्णमाय़ोधनादपि ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
६६
शकुन्तलो उवाच
अपोवाह च वासोऽस्या मारुतः शशिसंनिभम् ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
अपोवाह च सम्भ्रान्तो धृष्टद्युम्नस्य पश्यतः ||
३८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
अपोवाह तदाभ्राणि राधेय़स्य प्रपश्यतः ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
अपोवाह भृशं त्रस्तो वध्यमानं शितैः शरैः ||
४५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
अपोवाह महावाहुस्तूर्णमाय़ोधनादपि ||
२९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
अपोवाह रणात्तं तु सारथी रथिनां वरम् |
७५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
अपोवाह रणात्तूर्णं कृतवर्मा महारथः ||
३२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
अपोवाह रणात्सूतो रक्षमाणो धनञ्जय़ात् ||
१२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
अपोवाह रणाद्यन्ता त्वरमाणो महारथम् ||
४४ ख