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शान्ति पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मं विनश्यमानं हि यो न रक्षेत्स धर्महा ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८१
पराशर उवाच
धर्मं वै शाश्वतं लोके न जह्याद्धनकाङ्क्षय़ा ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२८
भीष्म उवाच
धर्मं शंसन्ति ते राज्ञामापदर्थमितोऽन्यथा ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मं संरक्षते दण्डस्तथैवार्थं नराधिप |
३ क
वन पर्व
अध्याय १०६
लोमश उवाच
धर्मं संरक्षमाणेन पौराणां हितमिच्छता ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मं संहरते तस्य धनं हरति यस्य यः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मं समाचरेत्पूर्वं तथार्थं धर्मसंय़ुतम् |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
धर्मं स्थाप्य यशः प्राप्य योगं प्राप्स्यसि तत्त्वतः ||
६८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मं स्वरूपिणं पार्थ सर्वलोकांश्च शाश्वतान् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
धर्मं हि यो वर्धय़ते स पण्डितो; य एव धर्माच्च्यवते स मुह्यति ||
७७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०८
भीष्म उवाच
धर्मं हि श्रेय़ इत्याहुरिति धर्मविदो विदुः ||
१३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय १८४
भरद्वाज उवाच
धर्मः कतिविधो वापि तद्भवान्वक्तुमर्हति ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मः कामश्च स्वर्गश्च हर्षः क्रोधः श्रुतं दमः |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
उमो उवाच
धर्मः किंलक्षणः प्रोक्तः कथं वाचरितुं नरैः |
२३ क
वन पर्व
अध्याय १८०
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मः परः पाण्डव राज्यलाभा; त्तस्यार्थमाहुस्तप एव राजन् |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४२
धृतराष्ट्र उवाच
धर्मः पापेन प्रतिहन्यते स्म; उताहो धर्मः प्रतिहन्ति पापम् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४०
भीष्म उवाच
धर्मः प्रतिविधातव्यो वुद्ध्या राज्ञा ततस्ततः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मः प्रमाणं लोकस्य नित्यं धर्मानुवर्तनम् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२३
भीष्म उवाच
धर्मः शरीरसङ्गुप्तिर्धर्मार्थं चार्थ इष्यते |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९६
इन्द्र उवाच
धर्मः श्रुतिसमुत्कर्षो धर्मसेतुरनामय़ः |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९१
उतथ्य उवाच
धर्मः श्रेय़स्करतमो राज्ञां भरतसत्तम ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९७
भीष्म उवाच
धर्मः सतां हितः पुंसां धर्मश्चैवाश्रय़ः सताम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
श्रीरु उवाच
धर्मः सत्यं तथा वृत्तं वलं चैव तथा ह्यहम् |
६० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
धर्मः सत्यं तपो दीक्षा व्यवसाय़ः पितामहः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५०
नारद उवाच
धर्मः सनातनश्च त्वामिहैवानुप्रवेक्ष्यते |
२८ क
शल्य पर्व
अध्याय ५९
राम उवाच
धर्मः सुचरितः सद्भिः सह द्वाभ्यां निय़च्छति |
१७ क
वन पर्व
अध्याय १९६
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मः सुदुर्लभो विप्र नृशंसेन दुरात्मना ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५४
युधिष्ठिर उवाच
धर्मकामस्य धर्मात्मन्किं नु श्रेय़ इहोच्यते ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
धर्मकामाः स्थिता धर्मे सुकृतैर्धर्मसेतवः |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३८
विदुर उवाच
धर्मकामार्थकार्याणि तथा मन्त्रो न भिद्यते ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७२
भीष्म उवाच
धर्मकामार्थकार्येषु कूटस्थ इव लक्ष्यसे ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय १४८
भीम उवाच
धर्मकामार्थभावांश्च वर्ष्म वीर्यं भवाभवौ ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मकामार्थरहितो रोगार्त इव दुर्गतः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मकामार्थशास्त्राणां सोऽर्थान्व्रूय़ात्तवाग्रतः ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
धर्मकामार्थशास्त्राणि शास्त्राणि विविधानि च |
४७ क
सभा पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मकामार्थसंय़ुक्तं पप्रच्छेदं युधिष्ठिरम् ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४४
युधिष्ठिर उवाच
धर्मकामार्थसम्पन्नो वाच्यमत्रानृतं न वा ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मकामार्थसम्वन्धं न स्मरामि त्वय़ा सह |
१९ क
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मकामार्थहीनानां किं नो वस्तुं तपोवने ||
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४३
व्रह्मो उवाच
धर्मकामाश्च राजानो व्राह्मणा धर्मलक्षणाः |
१६ क
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मकामे प्रतीतस्य प्रतिपन्नाः स्म भारत ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९१
भगवानु उवाच
धर्मकार्यं यतञ्शक्त्या न चेच्छक्नोति मानवः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७२
भीष्म उवाच
धर्मकार्याणि निर्वर्त्य मङ्गलानि प्रय़ुज्य च |
५ क
आदि पर्व
अध्याय ६९
शकुन्तलो उवाच
धर्मकीर्त्यावहा नृणां मनसः प्रीतिवर्धनाः |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
धर्मकृद्भिः कृतो धर्मः क्षत्रिय़ाणां रणे क्षय़ः ||
६७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८४
पराशर उवाच
धर्मक्रिय़ाविय़ुक्तानामशक्त्या संवृतात्मनाम् ||
३६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
नकुल उवाच
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे धर्मज्ञैर्वहुभिर्वृते |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय २३
धृतराष्ट्र उवाच
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युय़ुत्सवः |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
धर्मगुव्धर्मकृद्धर्मी सदसत्क्षरमक्षरम् |
६४ क
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मघातिषु सज्जन्ते वुद्धिमन्तो भवद्विधाः ||
७६ ग