chevron_left  धर्मचर्याarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय ३८
युधिष्ठिर उवाच
धर्मचर्या च राज्यं च नित्यमेव विरुध्यते |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२९
महेश्वर उवाच
धर्मचर्याकृतो मार्गो वालखिल्यगणे शृणु ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०
भीम उवाच
धर्मच्छद्म समास्थाय़ आसितुं न तु जीवितुम् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
धर्मच्छद्मा ह्ययं पापो वृथाचारपरिग्रहः |
५३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
धर्मच्छलमपि श्रुत्वा केशवात्स विशां पते |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय ७८
देवय़ान्यु उवाच
धर्मज्ञ इति विख्यात एष राजा भृगूद्वह |
२९ क
वन पर्व
अध्याय २२८
शकुनिरु उवाच
धर्मज्ञः पाण्डवो ज्येष्ठः प्रतिज्ञातं च संसदि |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८८
भीष्म उवाच
धर्मज्ञः सचिवः कश्चित्तत्प्रपश्येदतन्द्रितः ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
धर्मज्ञः सत्यवादी च तथेति प्रत्यभाषत |
२५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३०
पितर ऊचुः
धर्मज्ञः सत्यसन्धश्च महात्मा सुमहाव्रतः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय ७८
शुक्र उवाच
धर्मज्ञः सन्महाराज योऽधर्ममकृथाः प्रिय़म् |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय १३३
भीष्म उवाच
धर्मज्ञः सर्वभूतानाममोघेषुर्दृढाय़ुधः ||
५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
धर्मज्ञमानिनौ यौ त्वां वध्यमानमुपेक्षताम् ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय १९
वासुदेव उवाच
धर्मज्ञश्चासि वृष्णीनामाहवेष्वपि दारुके ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९६
वालखिल्या ऊचुः
धर्मज्ञस्त्यक्तधर्मोऽस्तु यस्ते हरति पुष्करम् ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय ११७
राम उवाच
धर्मज्ञस्य कथं तात वर्तमानस्य सत्पथे |
२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मज्ञस्य सुतः संस्त्वमधर्ममववुध्यसे |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४५
भीष्म उवाच
धर्मज्ञा धर्मशास्त्रेषु निवद्धा धर्मसेतुषु ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३३
सञ्जय़ उवाच
धर्मज्ञा युद्धकुशला हन्युर्युद्धे सुरानपि ||
५६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२
वृहस्पतिरु उवाच
धर्मज्ञां धर्मशीलां च न त्यजे त्वामनिन्दिते ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय ५१
वृहदश्व उवाच
धर्मज्ञाः पृथिवीपालास्त्यक्तजीवितय़ोधिनः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२९
व्यास उवाच
धर्मज्ञानप्रतिष्ठं हि तं देवा व्राह्मणं विदुः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
धर्मज्ञानां धृतिमतां सङ्ग्रामेष्वपलाय़िनाम् |
१६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मज्ञानां पुराणानां वदतां विविधाः कथाः ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय २२०
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मज्ञानां मुख्यतमस्तपस्वी संशितव्रतः |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३३
भीष्म उवाच
धर्मज्ञानां सतां तेषां नित्यमेवानुकीर्तय़ेत् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२९
व्यास उवाच
धर्मज्ञानि द्वय़ान्याहुर्वेदज्ञानीतराणि च |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२९
व्यास उवाच
धर्मज्ञानि विशिष्टानि कार्याकार्योपधारणात् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मज्ञानेन चैतेन सुप्रय़ुक्तेन कर्मणा |
५२ क
आदि पर्व
अध्याय १४६
व्राह्मण्यु उवाच
धर्मज्ञान्राक्षसानाहुर्न हन्यात्स च मामपि ||
२९ ख
विराट पर्व
अध्याय २६
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मज्ञाश्च कृतज्ञाश्च धर्मराजमनुव्रताः ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७८
नकुल उवाच
धर्मज्ञेन वदान्येन धर्मय़ुक्तं च तत्त्वतः ||
१ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २३
गान्धार्यु उवाच
धर्मज्ञेन सता तात धर्मराजेन संय़ुगे ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६७
अर्जुन उवाच
धर्मज्ञेन सता नाम सोऽधर्मः सुमहान्कृतः ||
३३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २३
गान्धार्यु उवाच
धर्मज्ञेनाहवे मृत्युराख्यातः सत्यवादिना ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मज्ञेषु सभासत्सु नेह युक्तमसाम्प्रतम् ||
४७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
महेश्वर उवाच
धर्मज्ञो धर्मनिरतः स धर्मफलमश्नुते ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मज्ञो धृतिमान्प्राज्ञः सर्वभूतेषु केशवः |
३५ क
वन पर्व
अध्याय १४५
युधिष्ठिर उवाच
धर्मज्ञो वलवाञ्शूरः सद्यो राक्षसपुङ्गवः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
धर्मज्ञोऽस्मि गुणज्ञोऽस्मि कृतज्ञोऽस्मि विशेषतः |
१७९ क
सभा पर्व
अध्याय ७१
विदुर उवाच
धर्मतः पाण्डुपुत्रा वै वनं गच्छन्ति निर्जिताः |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७३
ऐल उवाच
धर्मतः सह वित्तेन सम्यग्वाय़ो प्रचक्ष्व मे ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१९
नमुचिरु उवाच
धर्मतत्त्वमवगाह्य वुद्धिमा; न्योऽभ्युपैति स पुमान्धुरन्धरः ||
१८ ख
विराट पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मतश्चैव गुप्तास्ते स्ववीर्येण च पाण्डवाः |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मतस्तु महीं कृत्स्नां प्रदद्याच्छत्रवेऽपि च ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
धर्मतीर्थं समासाद्य पुण्यं व्रह्मर्षिसेवितम् |
१४१ क
आदि पर्व
अध्याय ४५
सूत उवाच
धर्मतो धर्मविद्राजा धर्मो विग्रहवानिव ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
धर्मतो नीतितश्चैव वलेन च जितो मय़ा ||
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मतो न्याय़तश्चैव स्नेहतश्च परन्तप ||
४७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४४
भीष्म उवाच
धर्मतो यां प्रय़च्छन्ति यां च क्रीणन्ति भारत ||
२३ ख