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शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्धर्मे स्थिता देवाः सहाचार्यपुरोहिताः |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८३
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्धृतिश्च वीर्यं च प्रज्ञा चौजश्च माधवे ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्नः समय़े तिष्ठ स्थितानां भरतर्षभ |
४३ क
वन पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्नगेन्द्रे वसतां तु तेषां; महात्मनां सद्व्रतमास्थितानाम् |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्नग्नौ तदा चक्रुः प्रतिज्ञां दृढनिश्चय़ाः ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११३
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्नतिमहाभीमे राजन्वीरवरक्षय़े |
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १११
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्नतिमहाभीमे सेनय़ोर्वै पराक्रमे |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७३
धृतराष्ट्र उवाच
तस्मिन्नतिरथे द्रोणे निहते तत्र सञ्जय़ |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७३
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्नतिरथे द्रोणे निहते पार्षतेन वै |
२ क
आदि पर्व
अध्याय ४
तमृषय़ ऊचुः
तस्मिन्नध्यासति गुरावासनं परमार्चितम् |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्ननिच्छति द्रष्टुं सङ्ग्रामं श्रोतुमिच्छति |
८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १२
वासुदेव उवाच
तस्मिन्ननिर्जिते युद्धे कामवस्थां गमिष्यसि |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्ननिर्जिते युद्धे प्राणान्यदि ह मोक्ष्यसे |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्ननीकप्रमुखे विषक्ता; दोधूय़मानाश्च महापताकाः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
धृतराष्ट्र उवाच
तस्मिन्ननुगते धर्मं पुरुषे पुरुषोऽपरः |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२२
वसुहोम उवाच
तस्मिन्नन्तर्हिते चाथ प्रजानां सङ्करोऽभवत् |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
वासुदेव उवाच
तस्मिन्नन्तर्हिते चाहमुपांशुव्रतमादिशम् |
४५ क
वन पर्व
अध्याय ६४
वृहदश्व उवाच
तस्मिन्नन्तर्हिते नागे प्रय़यौ नैषधो नलः |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
युधिष्ठिर उवाच
तस्मिन्नन्तर्हिते विप्रे राजा किमकरोत्तदा |
१ क
स्त्री पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्नपरिहार्येऽर्थे व्यतीते च विशेषतः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २००
भीष्म उवाच
तस्मिन्नपि महावाहो प्रादुर्भूते महात्मनि |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २४८
भीष्म उवाच
तस्मिन्नभिगते स्थाणौ प्रजानां हितकाम्यया |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्नभिहिते वाक्ये केशवेन महात्मना |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
व्यास उवाच
तस्मिन्नभ्यधिकां प्रीतिं करोति वृषभध्वजः ||
९० ख
सभा पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्नभ्यर्चिते कृष्णे सुनीथः शत्रुकर्षणः |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६६
भीष्म उवाच
तस्मिन्नभ्यागते काले प्रतप्ते लोमहर्षणे |
२ क
वन पर्व
अध्याय २१२
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्मिन्नष्टे जगद्भीतमथर्वाणमथाश्रितम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८०
भृगुरु उवाच
तस्मिन्नष्टे शरीराग्नौ शरीरं तदचेतनम् |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५
दुर्योधन उवाच
तस्मिन्नसुकरं कर्म कृतवत्यास्थिते दिवम् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्नस्तमिते भीष्मे कौरवाणां धुरन्धरे |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४८
वासुदेव उवाच
तस्मिन्नस्त्राणि दिव्यानि राक्षसान्यासुराणि च |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
धृतराष्ट्र उवाच
तस्मिन्नस्त्रे प्रतिहते द्रोणे चोपधिना हते |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३८
वाय़ुरु उवाच
तस्मिन्नहं च क्रुद्धे वै जगत्त्यक्त्वा ततो गतः |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
गौतम उवाच
तस्मिन्नहं दुर्लभे त्वाप्रधृष्ये; गवां लोके हस्तिनं यातय़िष्ये ||
४२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्नहनि निर्वृत्ते घोरे प्राणभृतां क्षय़े |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२३
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्नाकुलसङ्ग्रामे वर्तमाने महाभय़े |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६६
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्नाकुलसङ्ग्रामे वर्तमाने महाभय़े |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
तस्मिन्नाकुशलं व्रूय़ान्न शुक्तामीरय़ेद्गिरम् ||
१८ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १६९
धृतराष्ट्र उवाच
तस्मिन्नाक्रुश्यति द्रोणे महर्षितनय़े तदा |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६९
धृतराष्ट्र उवाच
तस्मिन्नाक्रुश्यति द्रोणे समक्षं पापकर्मिणः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्नाचार्यवृत्तिं च परमामास्थितस्तदा |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय २४
व्रह्मो उवाच
तस्मिन्नारोहति क्षिप्रं स्यन्दनं लोकपूजिते |
१०९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
व्राह्मण उवाच
तस्मिन्नावसथे धार्यं सवाह्याभ्यन्तरं मनः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७९
भीष्म उवाच
तस्मिन्नाश्रमिणः सन्तः स्वकर्माणीह कुर्वते ||
७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ८७
भीष्म उवाच
तस्मिन्निधीनादधीत प्रज्ञां पर्याददीत च |
२९ क
वन पर्व
अध्याय २०
वासुदेव उवाच
तस्मिन्निपतिते क्षुद्रे शाल्वे वाणप्रपीडिते |
१९ क
वन पर्व
अध्याय २१४
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्मिन्निपतिते त्वन्ये नेदुः शैला भृशं भय़ात् ||
३२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७३
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्निपतिते दिव्ये महाधनुषि पार्थिव |
२४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७५
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्निपतिते नागे वज्रदत्तस्य पाण्डवः |
२० क
आदि पर्व
अध्याय १६१
गन्धर्व उवाच
तस्मिन्निपतिते भूमावथ सा चारुहासिनी |
२ क