अनुशासन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मराजो हि शुद्धात्मा निदेशे स्थास्यते तव |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मराजोऽपि तत्सर्वं प्रतिजग्राह धर्मतः ||
१६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मराजोऽपि मेधावी श्रुत्वा व्यासस्य तद्वचः |
१९ क
शल्य पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
धर्मराजोऽपि सङ्क्रुद्धो मद्रराजं महाय़शाः |
५१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
धर्मराजोऽपि सम्प्रेक्ष्य धृष्टद्युम्नवृकोदरौ |
५९ क
वन पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मराज्ञे तदा धीमान्व्यासः सत्यवतीसुतः |
३५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मराड्भ्रातरं जिष्णुं समाचष्ट जगत्पतिः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५१
भीष्म उवाच
धर्मलक्षणमाख्यातमेतत्ते कुरुसत्तम |
२६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४३
व्रह्मो उवाच
धर्मलक्षणसंय़ुक्तमुक्तं वो विधिवन्मय़ा |
२६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
धर्मलव्धं तथाश्नीय़ान्न काममनुवर्तय़ेत् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९७
भीष्म उवाच
धर्मलव्धाद्धि विजय़ात्को लाभोऽभ्यधिको भवेत् ||
१० ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
महेश्वर उवाच
धर्मलव्धार्थभोक्तारस्ते नराः स्वर्गगामिनः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३४
भीष्म उवाच
धर्मलव्धैर्युतो दारैरग्नीनुत्पाद्य धर्मतः |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३५
व्यास उवाच
धर्मलव्धैर्युतो दारैरग्नीनुत्पाद्य सुव्रतः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मलेशप्रतिच्छन्नः प्रभवं धर्मकामय़ोः |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२०
व्यास उवाच
धर्मलोपाद्भय़ं ते स्यात्तस्माद्धर्मं चरोत्तमम् ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
४३
सूत उवाच
धर्मलोपो गरीय़ान्वै स्यादत्रेत्यकरोन्मनः ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
४३
सूत उवाच
धर्मलोपो न ते विप्र स्यादित्येतत्कृतं मय़ा ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय
४३
सूत उवाच
धर्मलोपो भवेदस्य सन्ध्यातिक्रमणे ध्रुवम् ||
१७ ख
सभा पर्व
अध्याय
३८
शिशुपाल उवाच
धर्मवाक्त्वमधर्मज्ञः सतां मार्गादवप्लुतः ||
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय
३८
शिशुपाल उवाच
धर्मवागन्यथावृत्तः पक्षिणः सोऽनुशास्ति ह ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४८
भीष्म उवाच
धर्मवाणिजका ह्येते ये धर्ममुपभुञ्जते ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११८
सात्यकिरु उवाच
धर्मवादैरधर्मिष्ठा धर्मकञ्चुकमास्थिताः ||
४२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३९
कर्ण उवाच
धर्मविद्धर्मशास्त्राणां श्रवणे सततं रतः ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
११३
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मविद्धर्मसंय़ुक्तमिदं वचनमुत्तमम् ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४७
भीष्म उवाच
धर्मविद्वेषिणो मन्दा इत्युक्तस्तेषु संशय़ः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
धर्मवृत्तं हि राजानं प्रेत्य चेह च भारत |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८४
पराशर उवाच
धर्मवृत्त्या च सततं कामार्थाभ्यां न हीय़ते ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८३
पराशर उवाच
धर्मवृद्धा गुणानेव सेवन्ते हि नरा भुवि ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५२
भीष्म उवाच
धर्मवैतंसिकाः क्षुद्रा मुष्णन्ति ध्वजिनो जगत् ||
१६ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मवैतंसिको यस्तु पापात्मा पुरुषस्तथा |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०
भीम उवाच
धर्मव्यतिक्रमं चेदं मन्यन्ते सूक्ष्मदर्शिनः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
१९८
मार्कण्डेय़ उवाच
धर्मव्याधमपृच्छच्च स चास्य कथितो द्विजैः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
२०४
मार्कण्डेय़ उवाच
धर्मव्याधस्तु तं विप्रमर्थवद्वाक्यमव्रवीत् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
२०४
मार्कण्डेय़ उवाच
धर्मव्याधस्तु तौ दृष्ट्वा पादेषु शिरसापतत् ||
७ ग
वन पर्व
अध्याय
२००
मार्कण्डेय़ उवाच
धर्मव्याधस्तु निपुणं पुनरेव युधिष्ठिर |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मव्युच्छित्तिमिच्छन्तो येऽधर्मस्य प्रवर्तकाः |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मव्रह्मोत्तरे राज्ये शन्तनुर्विनय़ात्मवान् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मशास्त्रं च सकलं नित्यं मनसि ते स्थितम् ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११८
भीष्म उवाच
धर्मशास्त्रसमाय़ुक्ताः पदातिजनसंय़ुताः ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८६
पराशर उवाच
धर्मशास्त्राणि वेदाश्च षडङ्गानि नराधिप |
४० क
उद्योग पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मशास्त्रातिगो मन्दो दुरात्मा प्रग्रहं गतः |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४९
भीष्म उवाच
धर्मशास्त्रेषु वर्णानां निश्चय़ोऽय़ं प्रदृश्यते |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५८
भीष्म उवाच
धर्मशीलं गुणोपेतं पाप इत्यवगच्छति |
८ क
वन पर्व
अध्याय
२९७
युधिष्ठिर उवाच
धर्मशीलः सदा राजा इति मां मानवा विदुः |
७२ क
आदि पर्व
अध्याय
५७
इन्द्र उवाच
धर्मशीला जनपदाः सुसन्तोषाश्च साधवः |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मशीला मय़ा ते हि वाध्यन्ते राज्यगृद्धिना ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८३
पराशर उवाच
धर्मशीलो नरो विद्वानीहकोऽनीहकोऽपि वा |
२९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मशीलो महातेजाः कुरूणां हितकृत्सदा |
१७ ख
विराट पर्व
अध्याय
१
युधिष्ठिर उवाच
धर्मशीलो वदान्यश्च वृद्धश्च सुमहाधनः ||
१३ ख