शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मश्च भगवान्देवः समाजग्मुर्हि सङ्गताः |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४३
सनत्सुजात उवाच
धर्मश्च सत्यं च दमस्तपश्च; अमात्सर्यं ह्रीस्तितिक्षानसूय़ा |
१२ क
स्त्री पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मश्च सुमहांस्तात तप्तं स्याच्च तपश्चिरात् ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मश्चाधर्मरूपोऽस्ति तच्च ज्ञेय़ं विपश्चिता ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
धर्मश्चार्थश्च कामश्च त्रितय़ं जीविते फलम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
धर्मश्चार्थश्च कामश्च धर्म एवोत्तरो भवेत् |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
धर्मश्चार्थश्च कामश्च मोक्षश्चात्रानुवर्णितः |
७२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
धर्मश्चार्थश्च कामश्च सेवितव्योऽथ कालतः |
६८ क
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मश्चार्थेन महता शक्यो राजन्निषेवितुम् ||
४७ ख
वन पर्व
अध्याय
२९७
युधिष्ठिर उवाच
धर्मश्चास्तं नय़ति च सत्ये च प्रतितिष्ठति ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मश्चेदस्ति वार्ष्णेय़ तथा सत्यं भविष्यति |
६७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३५
कुन्त्यु उवाच
धर्मश्चेदस्ति वार्ष्णेय़ तथा सत्यं भविष्यति |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मश्चैव मय़ा द्विष्टान्नोत्सहन्तेऽभिरक्षितुम् ||
१८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५३
वासुदेव उवाच
धर्मसंरक्षणार्थाय़ धर्मसंस्थापनाय़ च |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मसंवर्धनार्थाय़ प्रजज्ञेऽन्धकवृष्णिषु ||
८७ ख
वन पर्व
अध्याय
१८९
मार्कण्डेय़ उवाच
धर्मसंशय़मोक्षार्थं निवोध वचनं मम ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५६
वासुदेव उवाच
धर्मसंस्थापनार्थं हि प्रतिज्ञैषा ममाव्यया ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
धर्मसंस्थापनार्थाय़ दैतेय़ानां वधाय़ च |
६३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२६
श्रीभगवानु उवाच
धर्मसंस्थापनार्थाय़ सम्भवामि युगे युगे ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
धर्मसंस्थापने युक्तौ पुराणौ पुरुषोत्तमौ ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५७
भीष्म उवाच
धर्मसङ्कररक्षा हि राज्ञां धर्मः सनातनः ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८८
द्रुपद उवाच
धर्मसन्देहसन्दिग्धं प्रतिभाति हि मामिदम् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९
युधिष्ठिर उवाच
धर्मसूक्ष्मं तु यद्वाक्यं तत्र दुष्प्रतरं त्वय़ा |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मसेतुमतिक्रम्य रेमिरेऽधर्मनिश्चय़ाः ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मसेतुमतिक्रान्ताः सूक्ष्मस्थूलार्थकारणात् |
६८ क
वन पर्व
अध्याय
१९८
मार्कण्डेय़ उवाच
धर्मसेतुसमाकीर्णां यज्ञोत्सववतीं शुभाम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४
शङ्ख उवाच
धर्मस्तु ते व्यतिक्रान्तस्ततस्ते निष्कृतिः कृता ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
धर्मस्तु नित्यो मम धर्म एव; महावलः शत्रुनिवर्हणाय़ ||
४५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४६
भीष्म उवाच
धर्मस्तु भर्तृशुश्रूषा तय़ा स्वर्गं जय़त्युत ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
२९६
युधिष्ठिर उवाच
धर्मस्तु विभजत्यत्र उभय़ोः पुण्यपापय़ोः ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
धर्मस्ते सुमहान्भावी न मेऽत्रास्ति विचारणा ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मस्ते हीय़ते मूढ न चैनं समवेक्षसे ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८५
विदुर उवाच
धर्मस्त्वय़ि महान्राजन्निति व्यवसिताः प्रजाः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
धर्मस्त्वय़ि महावाहो दय़ा भूतेषु चानघ ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
धर्मस्य कुरुशार्दूल ततोऽहं धर्मजः स्मृतः ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२१
भीष्म उवाच
धर्मस्य कुलसन्तानो महानेभिर्विवर्धितः |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मस्य गतमानृण्यं न स्म वाच्या विवक्षताम् ||
४१ ग
वन पर्व
अध्याय
२००
व्याध उवाच
धर्मस्य च फलं लव्ध्वा न तृप्यति महाद्विज |
४७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३८
कुन्त्यु उवाच
धर्मस्य जननी भद्रे भवित्री त्वं वरानने |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११३
युधिष्ठिर उवाच
धर्मस्य तु गतिं श्रोतुमिच्छामि वदतां वर |
१ ख
वन पर्व
अध्याय
१५९
वैश्रवण उवाच
धर्मस्य त्वं यथा तात योगोत्पन्नो निजः सुतः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५१
भीष्म उवाच
धर्मस्य निष्ठा स्वाचारस्तमेवाश्रित्य भोत्स्यसे ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
धर्मस्य नृषु सम्भूतिरणीमाण्डव्यशापजा ||
८१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५४
युधिष्ठिर उवाच
धर्मस्य महतो राजन्वहुशाखस्य तत्त्वतः |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५६
वासुदेव उवाच
धर्मस्य लोप्ता पापात्मा तस्मादेष निपातितः |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०४
नारद उवाच
धर्मस्य वचनात्प्रीतो विश्वामित्रस्तदाभवत् ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
धर्मस्य वलहानिः स्यादधर्मश्च वली तथा ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२००
भीष्म उवाच
धर्मस्य वसवः पुत्रा रुद्राश्चामिततेजसः |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
धर्मस्य वाय़ोः शक्रस्य देवय़ोश्च तथाश्विनोः ||
६९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५४
भीष्म उवाच
धर्मस्य विधय़ो नैके ते ते प्रोक्ता महर्षिभिः |
६ क