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शान्ति पर्व
अध्याय ९१
उतथ्य उवाच
धर्मस्य व्राह्मणा योनिस्तस्मात्तान्पूजय़ेत्सदा |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
युधिष्ठिर उवाच
धर्मस्य शीलमेवादौ ततो मे संशय़ो महान् ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५३
वासुदेव उवाच
धर्मस्य सेतुं वध्नामि चलिते चलिते युगे |
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४७
भीष्म उवाच
धर्मस्य ह्रिय़माणस्य वलवद्भिर्दुरात्मभिः |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४७
भीष्म उवाच
धर्मस्य ह्रिय़माणस्य वलवद्भिर्दुरात्मभिः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५२
युधिष्ठिर उवाच
धर्मस्य ह्रिय़माणस्य वलवद्भिर्दुरात्मभिः |
११ क
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मस्यांशं तु राजानं विद्धि राजन्युधिष्ठिरम् |
८४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९१
भीष्म उवाच
धर्मस्यांशः प्रसूतोऽसि धर्मिष्ठोऽसि स्वभावतः |
२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३९
व्यास उवाच
धर्मस्यांशोऽभवत्क्षत्ता राजा चाय़ं युधिष्ठिरः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२१
भीष्म उवाच
धर्मस्याख्या महाराज व्यवहार इतीष्यते |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३१
कुन्त्यु उवाच
धर्मस्यानृण्यमाप्नोति न चात्मानं विगर्हते ||
१४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मस्यापचय़ं चक्रुः क्रोधलोभसमन्विताः ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९९
भीष्म उवाच
धर्मस्यार्थस्य कामस्य फलमाहुर्मनीषिणः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५२
भीष्म उवाच
धर्मस्याह्रिय़माणस्य लोभग्रस्तैर्दुरात्मभिः |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
धर्मस्याय़तनं श्रेष्ठं स्वर्गस्य च सुखस्य च ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मांश्च स्थापय़ामासुर्युद्धानां भरतर्षभ ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४०
युधिष्ठिर उवाच
धर्माः पितामहेनोक्ता मोक्षधर्माश्रिताः शुभाः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६८
युधिष्ठिर उवाच
धर्माः पितामहेनोक्ता राजधर्माश्रिताः शुभाः |
१ क
आदि पर्व
अध्याय ५३
आस्तीक उवाच
धर्माख्यानं ये वदेय़ुर्ममेदं; तेषां युष्मद्भ्यो नैव किञ्चिद्भय़ं स्यात् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३८
व्यास उवाच
धर्माख्यानेषु सर्वेषु सत्याख्यानेषु यद्वसु |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय ८६
यय़ातिरु उवाच
धर्मागतं प्राप्य धनं यजेत; दद्यात्सदैवातिथीन्भोजय़ेच्च |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९५
जनमेजय़ उवाच
धर्मागतेन त्यागेन भगवन्सर्वमस्ति चेत् |
१ क
वन पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
धर्माचाराः प्रहीय़न्ते न च सिध्यन्ति मानवाः ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२२
वसुहोम उवाच
धर्माच्च व्रह्मणः पुत्रो व्यवसाय़ः सनातनः |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६३
भीष्म उवाच
धर्माच्छक्त्या तथा योगाद्या चैव परमा गतिः ||
५३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५४
वासुदेव उवाच
धर्माञ्शुश्रूषमाणेभ्यः पृष्टेन च सता पुनः ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३७
श्रीभगवानु उवाच
धर्माणां विविधानां च कर्ता ज्ञानकरस्तथा |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२०
भीष्म उवाच
धर्माणामविरोधेन सर्वेषां प्रिय़माचरेत् |
२३ क
वन पर्व
अध्याय ३२
युधिष्ठिर उवाच
धर्मातिशङ्की नान्यस्मिन्प्रमाणमधिगच्छति |
१५ क
वन पर्व
अध्याय ३२
युधिष्ठिर उवाच
धर्मातिशङ्की पुरुषस्तिर्यग्गतिपराय़णः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय ३१
द्रौपद्यु उवाच
धर्मात्प्रिय़तरं किञ्चिदपि चेज्जीवितादिह ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७९
भीष्म उवाच
धर्मात्मकः कर्मविधिर्देहिनां नृपसत्तम |
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२१
भीष्म उवाच
धर्मात्मजः सम्वभूव पितैवं मेऽभ्यभाषत ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
धर्मात्मनां क्वचिल्लोके नान्यास्ति गतिरीदृशी ||
१२ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
धृतराष्ट्र उवाच
धर्मात्मनामुद्वहतां गतिं तां; परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५४
जनमेजय़ उवाच
धर्मात्मनि महासत्त्वे सत्यसन्धे जितात्मनि |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
धर्मात्मा कोशवांश्चापि देवराज इवापरः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मात्मा च महात्मा च दुःषन्तः पुरुषोत्तमः |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय ४५
सूत उवाच
धर्मात्मा च महात्मा च प्रजापालः पिता तव |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
धर्मात्मा चानृशंसश्च विक्रान्तोऽथाविकत्थनः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६५
भीष्म उवाच
धर्मात्मा चैव भवति मोक्षं च लभते परम् ||
२१ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २३
गान्धार्यु उवाच
धर्मात्मा तात धर्मज्ञः पारम्पर्येण निर्णय़े |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
धर्मात्मा तेन चाख्यातं यथैतत्कपटं कृतम् ||
६७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७४
भीष्म उवाच
धर्मात्मा धर्मविद्येषां राज्ञां राजन्पुरोहितः |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मात्मा नागधन्वानं तीर्थमागमदच्युतः ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८१
भीष्म उवाच
धर्मात्मा पञ्चमं मित्रं स तु नैकस्य न द्वय़ोः |
४ क
वन पर्व
अध्याय २००
व्याध उवाच
धर्मात्मा भवति ह्येवं चित्तं चास्य प्रसीदति |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६५
भीष्म उवाच
धर्मात्मा भवति ह्येवं मित्रं च लभते शुभम् |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय १००
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मात्मा भविता लोके सर्ववुद्धिमतां वरः ||
२६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ९२
उतथ्य उवाच
धर्मात्मा यः स कर्ता स्यादधर्मात्मा विनाशकः ||
८ ख