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उद्योग पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मार्थौ सम्प्रधार्यैव यदि सत्यं व्रवीम्यहम् ||
५१ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १
कृष्ण उवाच
धर्मार्थय़ुक्तं च महीपतित्वं; ग्रामेऽपि कस्मिंश्चिदय़ं वुभूषेत् ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९१
भगवानु उवाच
धर्मार्थय़ुक्तं तथ्यं च यथा त्वय़्युपपद्यते |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मार्थय़ुक्तं वचनमाह त्वां तात केशवः |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मार्थय़ुक्ता लोकेऽस्मिन्प्रवृत्तिर्लक्ष्यते सताम् |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३१
युधिष्ठिर उवाच
धर्मार्थय़ोरलं चाहं मृदवे दारुणाय़ च ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
धर्मार्थय़ोर्ग्रथितय़ोर्विभर्ति; नान्यत्र दिष्टस्य वशादुपैति ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मार्थय़ोस्तिष्ठ राजन्पाण्डवैरभिरक्षितः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९७
भीष्म उवाच
धर्माल्लोकास्त्रय़स्तात प्रवृत्ताः सचराचराः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८६
पराशर उवाच
धर्मावमन्ता कामात्मा भवेत्स खलु वञ्च्यते ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
धर्माविरुद्धान्राजेन्द्रो यथार्हति स एव हि ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २९
श्रीभगवानु उवाच
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६४
भीष्म उवाच
धर्माश्रमव्यवसिनां व्राह्मणानां युधिष्ठिर |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८६
भीष्म उवाच
धर्मासने निय़ुक्तः सन्धर्ममूलं नरर्षभ ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२५
वैशम्पाय़न उवाच
धर्माय़ चैव प्रणमेद्व्राह्मणेभ्यश्च मद्विधः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०९
भीष्म उवाच
धर्माय़ यतमानानां विदुर्देवाः सहर्षिभिः ||
१८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
धर्माय़ येऽभ्यसूय़न्ति वुद्धिमोहान्विता नराः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ९१
उतथ्य उवाच
धर्माय़ राजा भवति न कामकरणाय़ तु |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७३
भीष्म उवाच
धर्माय़ोत्तिष्ठ विप्रर्षे नात्मानं त्यक्तुमर्हसि ||
३९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४८
भीष्म उवाच
धर्मिणः पर्युपासन्ते फलं पक्वमिवाशय़ः ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४८
भीष्म उवाच
धर्मिणः सुखमेधन्ते लोभद्वेषविवर्जिताः ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय ५
सूत उवाच
धर्मिष्ठः सत्यवादी च निय़तो निय़तेन्द्रिय़ः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय १९२
मार्कण्डेय़ उवाच
धर्मिष्ठमिदमाख्यानं धुन्धुमारस्य तच्छृणु ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
धर्मिष्ठाः परिहीय़न्ते पापीय़ान्वर्धते जनः |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०८
भीष्म उवाच
धर्मिष्ठान्व्यवहारांश्च स्थापय़न्तश्च शास्त्रतः |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मिष्ठाश्च प्रजाः सर्वा ईतय़श्च न सन्ति मे ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७२
युधिष्ठिर उवाच
धर्मिष्ठो विष्णुभक्तश्च तत्त्वज्ञश्च पदान्वय़े ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७६
भीष्म उवाच
धर्मी गृही वा राजा वा व्रह्मचार्यथ वा पुनः ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७२
युधिष्ठिर उवाच
धर्मे च नापराध्नोति तन्मे व्रूहि पितामह ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४३
भीष्म उवाच
धर्मे च वेदे च वले च सर्वं; चराचरं केशवं त्वं प्रतीहि ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
धर्मे च शिष्यवर्गे च समपृच्छमनामय़म् ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६३
भीष्म उवाच
धर्मे च श्रद्दधानस्य तपस्युग्रे च वर्ततः |
३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४१
भीष्म उवाच
धर्मे च स्थिरतां दृष्ट्वा साधु साध्वित्युवाच ह ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय १९७
विदुर उवाच
धर्मे चानवमौ राजन्सत्यताय़ां च भारत |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६३
भीष्म उवाच
धर्मे चापि महाराज रतिरस्याभ्यजाय़त ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय ५६
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ |
३३ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ५
सूत उवाच
धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५७
भीष्म उवाच
धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च सततं रतः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मे चार्थे च कामे च लोकवृत्तिः समाहिता |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
धर्मे चार्थे च कामे च समर्थं प्रददौ धनम् ||
१२३ ख
आदि पर्व
अध्याय १०१
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मे चार्थे च कुशलो लोभक्रोधविवर्जितः |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८४
पराशर उवाच
धर्मे तपसि दाने च विचिकित्सास्य जाय़ते |
३० क
वन पर्व
अध्याय १९४
मधुकैटभावू ऊचतुः
धर्मे तपसि दाने च शीलसत्त्वदमेषु च ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९१
उतथ्य उवाच
धर्मे तिष्ठन्ति भूतानि धर्मो राजनि तिष्ठति |
५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २३
कुन्त्यु उवाच
धर्मे ते धीय़तां वुद्धिर्मनस्ते महदस्तु च ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय २५६
भीमसेन उवाच
धर्मे ते वर्धतां वुद्धिर्मा चाधर्मे मनः कृथाः |
२३ क
वन पर्व
अध्याय १८९
मार्कण्डेय़ उवाच
धर्मे त्वय़ात्मा संय़ोज्यो नित्यं धर्मभृतां वर |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १६
कृष्ण उवाच
धर्मे दृढत्वं युधि शत्रुघातं; यशस्तथाग्र्यं परमं वलं च |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५३
भीष्म उवाच
धर्मे धृतमना नित्यं नाधर्मं स त्वरोचय़त् ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ||
४० ख