उद्योग पर्व
अध्याय
५४
दुर्योधन उवाच
अस्मान्पुनरमी नाद्य समर्था जेतुमाहवे |
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
देवा ऊचुः
अस्मान्प्रवाधते वीर्याद्वधस्तस्य विधीय़ताम् ||
४८ ख
विराट पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
अस्मान्युधि विनिर्जित्य परिभूय़ सवान्धवान् |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
अस्मान्वरय़ राधेय़ यावद्भीष्मो न हन्यते ||
८५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९३
दुर्योधन उवाच
अस्मान्वलवतो ज्ञात्वा नशिष्यन्त्यवलीय़सः ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५७
सञ्जय़ उवाच
अस्मान्वा त्वं पराजित्य प्रशाधि पृथिवीमिमाम् |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
अस्मान्वा त्वं पराजित्य प्रशाधि पृथिवीमिमाम् |
३३ क
शल्य पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
अस्मान्वा त्वं पराजित्य प्रशाधि पृथिवीमिमाम् |
६३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
अस्मान्वा त्वं पराजित्य यशः प्राप्नुहि संय़ुगे |
१४ क
विराट पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
अस्मान्वाप्यतिसन्धाय़ कुर्युर्मत्स्येन सङ्गतम् ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
अस्मान्वेत्थ परान्वेत्थ वेत्थार्थं वेत्थ भाषितम् |
९२ क
आदि पर्व
अध्याय
१३६
वैशम्पाय़न उवाच
अस्मानय़ं सुविश्वस्तान्वेत्ति पापः पुरोचनः |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
अस्मानय़मतिक्रम्य तृणीकृत्य च सङ्गतान् |
२ क
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
अस्माभिः किल जातस्त्वमिति केनाप्युदाहृतम् |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
अस्माभिः खाण्डवप्रस्थे युष्मद्वासोऽनुचिन्तितः ||
२३ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
अस्माभिः परिपृष्टश्च यदाह भरतर्षभ |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
५५
वृहदश्व उवाच
अस्माभिः समनुज्ञातो दमय़न्त्या नलो वृतः ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
अस्माभिरभिगुप्तस्य तस्मादुत्तिष्ठ भारत ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
३६
भीमसेन उवाच
अस्माभिरुषिताः सम्यग्वने मासास्त्रय़ोदश |
३१ क
विराट पर्व
अध्याय
४४
कृप उवाच
अस्माभिरेष निकृतो वर्षाणीह त्रय़ोदश |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
४६
मन्त्रिण ऊचुः
अस्माभिर्निखिलं सर्वं कथितं ते सुदारुणम् ||
२४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
अस्माभिर्मङ्गलार्थाय़ वस्तव्यं शिविराद्वहिः ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय
२३१
वैशम्पाय़न उवाच
अस्माभिर्यदनुष्ठेय़ं गन्धर्वैस्तदनुष्ठितम् ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४१
इन्द्र उवाच
अस्माभिर्वर्जितावेतौ भवेतां सोमपौ कथम् |
१७ क
सभा पर्व
अध्याय
६७
शकुनिरु उवाच
अस्माभिर्वा जिता यूय़ं वने वर्षाणि द्वादश |
११ क
वन पर्व
अध्याय
१०५
लोमश उवाच
अस्माभिर्विचिता राजञ्शासनात्तव पार्थिव |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
अस्माभिर्हि न शक्यानि त्वदृते तानि कौरव ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८५
भरद्वाज उवाच
अस्माल्लोकात्परो लोकः श्रूय़ते नोपलभ्यते |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७५
युधिष्ठिर उवाच
अस्माल्लोकादमुं लोकं सर्वं शंसतु नो भवान् ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४०
विदुर उवाच
अस्माल्लोकादूर्ध्वममुष्य चाधो; महत्तमस्तिष्ठति ह्यन्धकारम् |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
अस्माल्लोकाद्देवलोकं पाकशासनशासनात् |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय
२९
दुर्योधन उवाच
अस्मासु च परा भक्तिर्न तु कालः पराक्रमे ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
दुर्योधन उवाच
अस्मासु च परा भक्तिस्तव गौतमिनन्दन ||
८१ ख
आदि पर्व
अध्याय
४१
पितर ऊचुः
अस्मासु पतितेष्वत्र सह पूर्वैः पितामहैः |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय
२२१
वैशम्पाय़न उवाच
अस्मासु हि विनष्टेषु भवितारः सुतास्तव |
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
४५
सूत उवाच
अस्मास्वासज्य सर्वाणि राजकार्याण्यशेषतः ||
२० ग
आदि पर्व
अध्याय
१३५
वैशम्पाय़न उवाच
अस्मास्विह हि दग्धेषु सकामः स्यात्सुय़ोधनः ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४३
सनत्सुजात उवाच
अस्मिँल्लोके तपस्तप्तं फलमन्यत्र दृश्यते |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
अस्मिँल्लोके निन्दितो मन्दचेताः; परे च लोके निरय़ं प्रय़ाति ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
अस्मिँल्लोके परे चैव ततश्चाजनने पुनः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५४
युधिष्ठिर उवाच
अस्मिँल्लोके परे चैव तन्मे व्रूहि पितामह ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
अस्मिँल्लोके परे चैव धर्मवित्सुखमेधते ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
अस्मिँल्लोके परे चैव राजा तत्प्राप्नुते फलम् ||
३७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३७
व्रह्मो उवाच
अस्मिँल्लोके प्रमोदन्ते जाय़मानाः पुनः पुनः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
अस्मिँल्लोके यशः प्राप्य ततः कालवशं गताः ||
१६५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४४
वासुदेव उवाच
अस्मिँल्लोके रौक्मिणेय़ तथामुष्मिंश्च पुत्रक |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३२
नारद उवाच
अस्मिँल्लोके सदा ह्येते परत्र च सुखप्रदाः |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
भीष्म उवाच
अस्मिँल्लोके हितं यत्स्यात्तेन मां योक्तुमर्हसि ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
अस्मिंश्च प्रलय़ं याति अय़मेकः सनातनः ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९५
वसिष्ठ उवाच
अस्मिंश्च शास्त्रे योगानां पुनर्दधि पुनः शरः ||
४४ ख