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वन पर्व
अध्याय ३१
द्रौपद्यु उवाच
धातुरेवं वशं यान्ति सर्वभूतानि भारत ||
२८ ख
सभा पर्व
अध्याय ६७
युधिष्ठिर उवाच
धातुर्निय़ोगाद्भूतानि प्राप्नुवन्ति शुभाशुभम् |
३ क
वन पर्व
अध्याय २४९
कोटिकाश्य उवाच
धातुर्विधातुः सवितुर्विभोर्वा; शक्रस्य वा त्वं सदनात्प्रपन्ना |
४ क
सभा पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
धातुश्च वशमन्वेति पाशैरिव नरः सितः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय २०३
व्याध उवाच
धातुष्वग्निस्तु विततः स तु वाय़ुसमीरितः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७८
भृगुरु उवाच
धातुष्वग्निस्तु विततः समानेन समीरितः |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
धातुस्त्वष्टुश्च सवितुर्दिव्यान्यस्त्राणि सर्वशः ||
३८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २३०
व्यास उवाच
धातेदं प्रभवस्थानं भूतानां संय़मो यमः |
२० क
वन पर्व
अध्याय ३१
द्रौपद्यु उवाच
धातैव खलु भूतानां सुखदुःखे प्रिय़ाप्रिय़े |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
धृतराष्ट्र उवाच
धात्रा तु दिष्टस्य वशे किलाय़ं; तस्माद्वद त्वं श्रवणे धृतोऽहम् ||
१ ख
सभा पर्व
अध्याय ५२
युधिष्ठिर उवाच
धात्रा तु दिष्टस्य वशे किलेदं; नादेवनं कितवैरद्य तैर्मे ||
१४ ख
सभा पर्व
अध्याय ५१
धृतराष्ट्र उवाच
धात्रा तु दिष्टस्य वशे किलेदं; सर्वं जगच्चेष्टति न स्वतन्त्रम् ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
धात्रा तु विहितं पूर्वं कर्म स्वं पालय़ाम्यहम् |
२० क
वन पर्व
अध्याय २८४
कर्ण उवाच
धात्रा लोकेश्वर यथा कीर्तिराय़ुर्नरस्य वै ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय २६
मार्कण्डेय़ उवाच
धात्रा विधिर्यो विहितः पुराण; स्तं पूजय़न्तो नरवर्य सन्तः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय १९९
मार्कण्डेय़ उवाच
धात्रा विधिरय़ं दृष्टो वहुधा कर्मनिर्णय़े ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७७
भीष्म उवाच
धात्रा विहितभक्ष्याणि सर्वभूतानि मेदिनीम् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२७
व्यास उवाच
धात्रा सृष्टानि भूतानि कृष्यन्ते यमसादनम् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय २१५
मार्कण्डेय़ उवाच
धात्री सा पुत्रवत्स्कन्दं शूलहस्ताभ्यरक्षत ||
२१ ख
सभा पर्व
अध्याय १६
कृष्ण उवाच
धात्रीजनपरित्यक्तो मय़ाय़ं परिरक्षितः ||
४८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९०
भीष्म उवाच
धात्रीणां च सखीनां च व्रीडमाना न्यवेदय़त् |
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१
नारद उवाच
धात्रीद्वितीय़ो वालः स क्रीडार्थं पर्यधावत ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४२
वैशम्पाय़न उवाच
धात्र्या विश्रव्धय़ा गुप्ता सखीजनवृता तदा |
२२ क
वन पर्व
अध्याय २९२
वैशम्पाय़न उवाच
धात्र्या सह पृथा राजन्पुत्रदर्शनलालसा ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
भीष्म उवाच
धात्र्या हस्तगतश्चापि तेनाक्रीडत पक्षिणा |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१
नारद उवाच
धात्र्यास्तु निनदं श्रुत्वा रुदत्याः परमार्तवत् |
३५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
धानागौडासवे पीत्वा गोमांसं लशुनैः सह |
१५ क
वन पर्व
अध्याय १८४
सरस्वत्यु उवाच
धानापूपा मांसशाकाः सदा पाय़सकर्दमाः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
धानामुष्टिमुपासीनं निरीहं गतमत्सरम् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
धानामुष्टिरिहार्थश्चेत्प्रतिज्ञा ते विनश्यति ||
२० ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ९१
युधिष्ठिर उवाच
धान्यजातिश्च का वर्ज्या तन्मे व्रूहि पितामह ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय १९९
मार्कण्डेय़ उवाच
धान्यवीजानि यान्याहुर्व्रीह्यादीनि द्विजोत्तम |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय ६७
भीष्म उवाच
धान्यस्य दशमं भागं दास्यामः कोशवर्धनम् ||
२३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ८८
भीष्म उवाच
धान्यहैरण्यभोगेन भोक्तुं राष्ट्रिय़ उद्यतः ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९९
सञ्जय़ उवाच
धान्यानामिव लूनानां प्रकरं गोगणा इव ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०५
गुरुरु उवाच
धान्यानि फलमूलानि मृद्विकाराः सहाम्भसा ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
धान्यान्यवांस्तिलान्माषान्कुलत्थान्सर्षपांश्चणान् |
६२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२४
ऋषय़ ऊचुः
धान्यैर्यष्टव्यमित्येष पक्षोऽस्माकं नराधिप |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९३
वसिष्ठ उवाच
धाम तस्योपय़ुञ्जन्ति भूय़ एव तु जाय़ते ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
श्रीभगवानु उवाच
धाम सारो हि लोकानामृतं चैव विचारितम् |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०९
सुपर्ण उवाच
धामा नाम महात्मानो मुनय़ः सत्यवादिनः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९३
वसिष्ठ उवाच
धाम्ना धामसहस्राणि मरणान्तानि गच्छति |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७४
भीष्म उवाच
धारणं सर्ववेदानां सर्वतीर्थावगाहनम् |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७२
भीमसेन उवाच
धारणश्चेन्द्रवत्सानां मुकुटानां विगाहनः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०४
याज्ञवल्क्य उवाच
धारणा चैव मनसः प्राणाय़ामश्च पार्थिव |
९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
धारणाच्छ्रेय़सो ध्यानाद्यं धर्मं कवय़ो विदुः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२२
भीष्म उवाच
धारणात्सर्वलोकानां सर्वधर्मप्रवर्तकाः ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
धारणाद्धर्म इत्याहुर्धर्मेण विधृताः प्रजाः |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
कृष्ण उवाच
धारणाद्धर्ममित्याहुर्धर्मो धारय़ति प्रजाः |
५० क
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
धारणासु तु योगस्य दुःस्थेय़मकृतात्मभिः ||
५४ ख