chevron_left  धार्तराष्ट्राarrow_drop_down
सभा पर्व
अध्याय ४३
दुर्योधन उवाच
धार्तराष्ट्रा हि हीय़न्ते पार्था वर्धन्ति नित्यशः ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय १८१
वैशम्पाय़न उवाच
धार्तराष्ट्रांश्च दुर्वृत्तानृध्यतः प्रेक्ष्य सर्वशः ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
धार्तराष्ट्राः कालपक्वा न चेच्छृण्वन्ति मे वचः |
४७ क
उद्योग पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
धार्तराष्ट्राः पाण्डवाः सृञ्जय़ाश्च; ये चाप्यन्ये पार्थिवाः संनिविष्टाः ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३६
विदुर उवाच
धार्तराष्ट्राः पाण्डवान्पालय़न्तु; पाण्डोः सुतास्तव पुत्रांश्च पान्तु |
७० क
उद्योग पर्व
अध्याय १२५
वैशम्पाय़न उवाच
धार्तराष्ट्राञ्जिघांसन्ति पाण्डवाः सृञ्जय़ैः सह ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
धार्तराष्ट्राण्यनीकानि दृष्ट्वा व्यूढानि पाण्डवः |
३ क
वन पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
धार्तराष्ट्रानमुं लोकं गमय़ामि विशां पते ||
१५ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १६७
अर्जुन उवाच
धार्तराष्ट्रानवस्थाप्य क एष नदतीति ह ||
२६ ख
सभा पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
धार्तराष्ट्रानिमान्पापान्निष्पिषेय़ं तलासिभिः ||
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४३
कुन्त्यु उवाच
धार्तराष्ट्रान्न तद्युक्तं त्वय़ि पुत्र विशेषतः ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
धार्तराष्ट्रान्प्रतिय़युरर्दय़न्तः शितैः शरैः |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
धार्तराष्ट्रान्प्रधक्ष्यन्ति तथा वाणाः किरीटिनः ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय ११९
वैशम्पाय़न उवाच
धार्तराष्ट्रान्भीमसेनः सर्वान्स परिमर्दति ||
१५ ख
सभा पर्व
अध्याय ६८
भीमसेन उवाच
धार्तराष्ट्रान्रणे हत्वा मिषतां सर्वधन्विनाम् |
२२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
धार्तराष्ट्रान्विनिघ्नन्ति क्रुद्धाः सिंहा इव द्विपान् ||
६३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
धार्तराष्ट्रान्सुसङ्क्रुद्धान्दृष्ट्वा भीमो महावलः |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
धार्तराष्ट्रान्हतान्मेने सकर्णान्वै जनाधिप ||
३४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५२
वासुदेव उवाच
धार्तराष्ट्राश्च निहताः सर्वे ससुतवान्धवाः ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
धार्तराष्ट्राश्च सहिता दुर्योधनपुरोगमाः ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
धार्तराष्ट्रास्ततः कर्णं सवला भरतर्षभ |
२३ क
शल्य पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
धार्तराष्ट्रास्ततः सर्वे प्राय़शो विमुखाभवन् ||
४१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८७
वैशम्पाय़न उवाच
धार्तराष्ट्रास्तमाय़ान्तं प्रत्युज्जग्मुः स्वलङ्कृताः |
३ क
वन पर्व
अध्याय ९२
लोमश उवाच
धार्तराष्ट्रास्तु दर्पेण मोहेन च वशीकृताः |
२२ क
शल्य पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
धार्तराष्ट्रास्तु राजेन्द्र यात्वा तु स्वल्पमन्तरम् |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७०
सञ्जय़ उवाच
धार्तराष्ट्रास्त्रिधाभूता वध्यन्ते पाण्डुसृञ्जय़ैः |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५६
वासुदेव उवाच
धार्तराष्ट्रीं चमूं कृत्स्नां रक्षेय़ुरमरा इव ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
धार्तराष्ट्रीं श्रिय़ं प्राप्य प्रशाधि पृथिवीमिमाम् ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय ३१
द्रौपद्यु उवाच
धार्तराष्ट्रे श्रिय़ं दत्त्वा धाता किं फलमश्नुते ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२५
युधिष्ठिर उवाच
धार्तराष्ट्रेण राजेन्द्र पश्य मन्दात्मतां मम ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
सञ्जय़ उवाच
धार्तराष्ट्रेषु या प्रीतिः प्रद्वेषोऽस्मासु यश्च ते |
५ ख
वन पर्व
अध्याय २९
द्रौपद्यु उवाच
धार्तराष्ट्रेषु लुव्धेषु सततं चापकारिषु ||
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
धार्तराष्ट्रेषु वै कोपः सर्वः कृष्ण विधीय़ताम् ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
धार्तराष्ट्रेष्वनीकेषु यतमानौ नरर्षभौ ||
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
धार्तराष्ट्रैः परिक्लिष्टा यथा नकुशलं तथा ||
५६ ख
वन पर्व
अध्याय १
जनमेजय़ उवाच
धार्तराष्ट्रैः सहामात्यैर्निकृत्या द्विजसत्तम ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
धार्तराष्ट्रैः सहामात्यैर्निर्ययुर्गजसाह्वय़ात् ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
धार्तराष्ट्रैर्महावाहो येषां योद्धा पितामहः ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय १८१
वैशम्पाय़न उवाच
धार्तराष्ट्रैर्हता न स्युर्विज्ञाय़ कुरुपुङ्गवाः |
३८ क
आदि पर्व
अध्याय ११९
वैशम्पाय़न उवाच
धार्तराष्ट्रैश्च सहिताः क्रीडन्तः पितृवेश्मनि |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
धार्तराष्ट्रो महाराज विवभौ स महेन्द्रवत् ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
धार्तराष्ट्रो वलस्थं च मन्यतेऽऽत्मानमातुरः ||
४२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
धार्तराष्ट्रो हतो राजा सवलः सपदानुगः ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय २४३
वैशम्पाय़न उवाच
धार्तराष्ट्रोऽपि नृपतिः प्रशशास वसुन्धराम् |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय ११४
वैशम्पाय़न उवाच
धार्मिकं तं सुतं लव्ध्वा पाण्डुस्तां पुनरव्रवीत् |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११५
गालव उवाच
धार्मिकः संय़मे युक्तः सत्यश्चैव जनेश्वरः ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४७
वासुदेव उवाच
धार्मिकः सत्यवादी च पितुः शुश्रूषणे रतः ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय ११३
पाण्डुरु उवाच
धार्मिकश्च कुरूणां स भविष्यति न संशय़ः |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८७
भीष्म उवाच
धार्मिकश्च जनो यत्र दाक्ष्यमुत्तममास्थितः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय २००
व्याध उवाच
धार्मिकश्चापि भवति मोक्षं च लभते परम् ||
५० ख