द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
दुर्योधन उवाच
धिगस्तु मम लुव्धस्य यत्कृते सर्ववान्धवाः |
७३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
धिगस्तु मम वार्ष्णेय़ यो ह्यस्मै प्रहराम्यहम् ||
२६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
६
युधिष्ठिर उवाच
धिगस्तु मामधर्मज्ञं धिग्वुद्धिं धिक्च मे श्रुतम् |
२५ क
विराट पर्व
अध्याय
२०
भीमसेन उवाच
धिगस्तु मे वाहुवलं गाण्डीवं फल्गुनस्य च |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
धिगस्त्वमर्षं येनेमामापदं गमिता वय़म् ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४२
वैशम्पाय़न उवाच
धिगस्त्वर्थं यत्कृतेऽय़ं महाञ्ज्ञातिवधे क्षय़ः |
११ क
वन पर्व
अध्याय
१२७
सोमक उवाच
धिगस्त्विहैकपुत्रत्वमपुत्रत्वं वरं भवेत् |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
१९२
वैशम्पाय़न उवाच
धिगस्मत्पौरुषं तात यद्धरन्तीह पाण्डवाः ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
धिगहो धिग्गतः पार्थः कृष्णश्चेत्यव्रुवन्पृथक् ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४५
व्राह्मण उवाच
धिगिदं जीवितं लोकेऽनलसारमनर्थकम् |
२० क
वन पर्व
अध्याय
१९
वासुदेव उवाच
धिगेनमिति वक्ष्यन्ति न तु वक्ष्यन्ति साध्विति ||
२२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
धिग्जीवितमिदं मेऽद्य सुहृद्धीनस्य सञ्जय़ |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
धिग्धार्तराष्ट्रं सुनृशंसवुद्धिं; ससौवलं पापमतिं च कर्णम् |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
धिग्धिक्सर्वमिदं मिथ्येत्युक्त्वा सम्प्राद्रवद्रणात् ||
४२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८०
भीष्म उवाच
धिग्धिगित्यव्रुवं युद्धं क्षत्रं च भरतर्षभ ||
३६ ख
सभा पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
धिग्धिगित्येव वृद्धानां सभ्यानां निःसृता गिरः ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
धिग्भवन्तं कुनृपतिं ज्ञातिघातिनमस्तु वै ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
धिग्भीमसेनस्य वलं धिक्पार्थस्य च गाण्डिवम् |
७० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
धिग्भीष्मं धिक्च मे मन्दं पितरं मूढचेतसम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
राजो उवाच
धिग्राजधर्मं यस्याय़ं कार्यस्येह विनिश्चय़ः |
११० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
धिग्राज्यमिदमस्माकं धिग्वलं धिक्पराक्रमम् |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
१६५
गन्धर्व उवाच
धिग्वलं क्षत्रिय़वलं व्रह्मतेजोवलं वलम् |
४२ क
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
धिग्वलं भीमसेनस्य धिक्पार्थस्य धनुष्मताम् |
५९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
धिग्वलं भीमसेनस्य धिक्पार्थस्य धनुष्मताम् |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
धिग्वलं भीमसेनस्य धिक्पार्थस्य धनुष्मताम् |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
१९
वासुदेव उवाच
धिग्वाचा परिहासोऽपि मम वा मद्विधस्य वा |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
धिग्वीर्यं वृष्णिवीराणां पाञ्चालानां च धिग्वलम् ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६६
सञ्जय़ उवाच
धिङ्ममास्त्राणि दिव्यानि धिग्वाहू धिक्पराक्रमम् |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
धिङ्मां धिक्षाल्वराजानं धिग्धातारमथापि च |
६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
६
युधिष्ठिर उवाच
धिङ्मामस्तु सुदुर्वुद्धिं राज्यसक्तं प्रमादिनम् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४३
भीष्म उवाच
धिङ्मामस्तु सुदुर्वुद्धिं सदा निकृतिनिश्चय़म् |
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
लुव्धक उवाच
धिङ्मृत्युं च दुरात्मानं क्रूरं दुःखकरं सताम् |
५७ क
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
धिय़ा धीरो विजानीय़ादुपाय़ं चास्य सिद्धय़े ||
२५ ख
सभा पर्व
अध्याय
६५
धृतराष्ट्र उवाच
धिय़ा निगदितं कृत्स्नं पथ्यं निःश्रेय़सं परम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९६
मनुरु उवाच
धिय़ा समनुपश्यन्ति तद्गताः सवितुर्गतिम् ||
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
धीमतां सत्यसन्धानां सर्वेषां क्रतुय़ाजिनाम् ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
धीमन्तो धृतिमन्तश्च भूतानामनुकम्पकाः |
८८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११८
भीष्म उवाच
धीरं श्लक्ष्णं महर्द्धिं च देशकालोपपादकम् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६९
भीष्म उवाच
धीरः किं स्वित्तात कुर्यात्प्रजान; न्क्षिप्रं ह्याय़ुर्भ्रश्यते मानवानाम् |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
२२३
सारिसृक्व उवाच
धीरस्त्वमसि मेधावी प्राणकृच्छ्रमिदं च नः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२६
सञ्जय़ उवाच
धीरस्य वाचो नाश्रौषीः क्षेमाय़ वदतः शिवाः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
भीष्म उवाच
धीरस्य स्पष्टदण्डस्य न ह्याज्ञा प्रतिहन्यते ||
४७ ख
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
धीरा नराः कर्मरता न तु निःसंशय़ं क्वचित् ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११८
भीष्म उवाच
धीरो मर्षी शुचिः शीघ्रः काले पुरुषकारवित् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३२
व्यास उवाच
धुतपाप्मा तु तेजस्वी लघ्वाहारो जितेन्द्रिय़ः |
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
धुनन्ति पापं तीर्थेषु पूता यान्ति दिवं सुखम् ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
१९५
मार्कण्डेय़ उवाच
धुन्धुमार इति ख्यातो नाम्ना समभवत्ततः ||
२९ ग
वन पर्व
अध्याय
१९२
मार्कण्डेय़ उवाच
धुन्धुमारत्वमगमत्तच्छृणुष्व महीपते ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६
भीष्म उवाच
धुन्धुमारश्च राजर्षिः सत्रेष्वेव जरां गतः |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
धुन्धुमाराच्च काम्वोजो मुचुकुन्दस्ततोऽलभत् ||
७५ ख