chevron_left  अग्निश्चापिarrow_drop_down
वन पर्व
अध्याय २११
मार्कण्डेय़ उवाच
अग्निश्चापि मनुर्नाम प्राजापत्यमकारय़त् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८०
पराशर उवाच
अग्निश्चेय़ो वहुभिश्चापि यज्ञै; रन्ते मध्ये वा वनमाश्रित्य स्थेय़म् ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय २१३
मार्कण्डेय़ उवाच
अग्निश्चैतैर्गुणैर्युक्तः सर्वैरग्निश्च देवता |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२
भीष्म उवाच
अग्निष्टुं नाम इष्टं मे पुत्राणां शतमौरसम् ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२
भीष्म उवाच
अग्निष्टुं नाम राजर्षिरिन्द्रद्विष्टं महावलः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय १२१
वैशम्पाय़न उवाच
अग्निष्टुज्जातः स मुनिस्ततो भरतसत्तम |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
अग्निष्टुतेन च तथा ये यजन्ति तपोधनाः |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
अग्निष्टोमप्रभृतिभिरिष्ट्वा च स्वाप्तदक्षिणैः |
७० क
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
अग्निष्टोममवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ||
७० ग
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
अग्निष्टोममवाप्नोति न च स्वर्गान्निवर्तते ||
१२७ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
अग्निष्टोममवाप्नोति नागलोकं च विन्दति ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २६
अङ्गिरा उवाच
अग्निष्टोममवाप्नोति प्रभातां शर्वरीं शुचिः ||
५४ ख
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
अग्निष्टोममवाप्नोति मुनिलोकं च गच्छति ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
अग्निष्टोममवाप्नोति विमानं चाधिरोहति ||
७२ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
अग्निष्टोममवाप्नोति सूर्यलोकं च गच्छति ||
३९ ग
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
अग्निष्टोममवाप्नोति स्मृतिं मेधां च विन्दति ||
५२ ख
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
अग्निष्टोममवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ||
१०० ख
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
अग्निष्टोमशतं विन्देद्गमनादेव भारत ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
अग्निष्टोमस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ||
६६ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
अग्निष्टोमस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ||
१५२ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
अङ्गिरा उवाच
अग्निष्टोमस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ||
३५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९९
भीष्म उवाच
अग्निष्टोमस्य यज्ञस्य फलमाहुर्मनीषिणः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
अग्निष्टोमातिरात्राभ्यां फलं प्राप्नोति पुण्यकृत् ||
४६ ख
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
अग्निष्टोमातिरात्राभ्यां फलं प्राप्नोति मानवः ||
७८ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
अग्निष्टोमातिरात्राभ्यां फलं प्राप्नोति मानवः ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
अग्निष्टोमातिरात्राभ्यां फलं विन्दति भारत ||
७३ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
अग्निष्टोमातिरात्राभ्यां फलं विन्दति मानवः ||
१३२ ख
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
अग्निष्टोमादिभिर्यज्ञैरिष्ट्वा विपुलदक्षिणैः |
४० क
वन पर्व
अध्याय २१२
मार्कण्डेय़ उवाच
अग्निष्टोमे च निय़तः क्रतुश्रेष्ठो भरस्य तु ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
अग्निष्टोमेन वा सम्यगिह प्रेत्य च पूय़ते ||
४८ ग
सभा पर्व
अध्याय ८
नारद उवाच
अग्निष्वात्ताश्च पितरः फेनपाश्चोष्मपाश्च ये |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४२
भीष्म उवाच
अग्निसाक्षिकमप्येतद्भर्ता हि शरणं स्त्रिय़ः ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय १३२
वैशम्पाय़न उवाच
अग्निस्ततस्त्वय़ा देय़ो द्वारतस्तस्य वेश्मनः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय २११
मार्कण्डेय़ उवाच
अग्निस्तपो ह्यजनय़त्पञ्च यज्ञसुतानिह ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय २०९
मार्कण्डेय़ उवाच
अग्निस्तस्य भरद्वाजः प्रथमः पुत्र उच्यते ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय २०९
मार्कण्डेय़ उवाच
अग्निस्तस्य सुतो दीप्तस्तिस्रः कन्याश्च सुव्रताः ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३७
विदुर उवाच
अग्निस्तेजो महल्लोके गूढस्तिष्ठति दारुषु |
५६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२०
भीष्म उवाच
अग्निस्तोको वर्धते ह्याज्यसिक्तो; वीजं चैकं वहुसाहस्रमेति |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
अग्निस्पर्शसमास्तीक्ष्णा भगदत्तेन चोदिताः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
अग्निस्फुलिङ्गसंस्पर्शैरञ्जोगतिभिराहवे |
३७ ख
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
अग्निहोत्रं त्रय़ो वेदा यज्ञाश्च सहदक्षिणाः |
६० क
वन पर्व
अध्याय २९५
वैशम्पाय़न उवाच
अग्निहोत्रं न लुप्येत तदानय़त पाण्डवाः ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय १३७
लोमश उवाच
अग्निहोत्रं पितुर्भीतः सहसा समुपाद्रवत् ||
१७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
अग्निहोत्रं पुरस्कृत्य वल्कलाजिनसंवृतः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १११
भीष्म उवाच
अग्निहोत्रपराः सन्तो दुर्गाण्यतितरन्ति ते ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३०
महेश्वर उवाच
अग्निहोत्रपरिस्पन्द इष्टिहोमविधिस्तथा ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
महेश्वर उवाच
अग्निहोत्रपरिस्पन्दो दानाध्ययनमेव च ||
४९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
महेश्वर उवाच
अग्निहोत्रपरिस्पन्दो दानाध्ययनमेव च ||
५३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२९
महेश्वर उवाच
अग्निहोत्रपरिस्पन्दो धर्मरात्रिसमासनम् |
४९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९९
भीष्म उवाच
अग्निहोत्रफलं तस्य फलमाहुर्मनीषिणः ||
१० ख