chevron_left  शरदग्धान्यदृश्यन्तarrow_drop_down
भीष्म पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
शरदग्धान्यदृश्यन्त सैन्यानि द्रुपदस्य ह |
५६ ख
वन पर्व
अध्याय २६७
मार्कण्डेय़ उवाच
शरदभ्रप्रतीकाशाः पिष्टहिङ्गुलकाननाः ||
११ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
शरदम्भोदजालानि व्यशीर्यन्त समन्ततः ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५
कृष्ण उवाच
शरदीव सुदुष्प्रेक्ष्यं परिविष्टं दिवाकरम् ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९६
सञ्जय़ उवाच
शरदीवोदितः सूर्यो नृसूर्यो विरराज ह ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
शरद्घनविनिर्मुक्तः परिविष्ट इवांशुमान् |
१४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६५
भीष्म उवाच
शरद्व्यपाय़े रत्नानि पौर्णमास्यामिति श्रुतिः ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७०
सञ्जय़ उवाच
शरधाराश्मवर्षाणि व्यसृजत्सर्वतोदिशम् |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२९
सञ्जय़ उवाच
शरधारास्त्रपवनां भृशं शीतोष्णसङ्कुलाम् ||
३१ ख
विराट पर्व
अध्याय ४३
कर्ण उवाच
शरधारो महामेघः शमय़िष्यामि पाण्डवम् ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
शरपरशुवरासिपट्टिशै; रिषुभिरनेकविधैश्च सादिताः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११३
सञ्जय़ उवाच
शरपातं समुत्सृज्य स्थिता युद्धदिदृक्षवः ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
शरपातमपक्रम्य ततः प्रेक्षकवत्स्थिते ||
७५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
शरपातमहावर्षं रथघोषवलाहकम् |
६ क
विराट पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
शरप्रतप्तः स तु नागराजः; प्रवेपिताङ्गो व्यथितान्तरात्मा |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
शरप्रतापैर्वीभत्सुः पतङ्गानिव पावकः ||
११२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
शरप्रसूनसङ्काशं महीविवरशाय़िनम् |
३० क
कर्ण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
शरप्रहाराभिहतैर्महावलै; रवेक्ष्यमाणैः पतितैः सहस्रशः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय ११९
भीष्म उवाच
शरभः शरभस्थाने सिंहः सिंह इवोर्जितः |
५ क
आदि पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
शरभः शलभश्चैव सूर्याचन्द्रमसौ तथा |
२६ क
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
शरभङ्गाश्रमं गत्वा शुकस्य च महात्मनः |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०७
सञ्जय़ उवाच
शरभाविव सङ्क्रुद्धौ युय़ुधाते परस्परम् ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८४
वैशम्पाय़न उवाच
शरभेणार्चितस्तत्र शिशुपालात्मजेन सः |
३ क
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
शरभो नाम यस्तेषां दैतेय़ानां महासुरः |
२८ क
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
शरभोन्नादसङ्घुष्टं नानारावनिनादितम् |
६४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
शरभोऽप्यतिसन्दुष्टो नित्यं प्राणिवधे रतः |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३६
सञ्जय़ उवाच
शरमादत्त कर्णाय़ परकाय़ावभेदनम् ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
शरमीनां महारौद्रां प्रासशक्त्युग्रडुण्डुभाम् |
१२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
शरवंशं शरस्थूणं शराच्छादनमद्भुतम् |
५७ क
विराट पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
शरवर्णां धनुर्वीणां शत्रुमध्ये प्रवादय़ ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
शरवर्षं ततस्तं तु संनिवार्य महाय़शाः |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३४
सञ्जय़ उवाच
शरवर्षं तु तत्कर्णः पार्थिवैः समुदीरितम् |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
शरवर्षप्लवां घोरां केशशैवलशाड्वलाम् |
४७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
शरवर्षाणि भीमानि मेघाविव परस्परम् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४
नारद उवाच
शरवर्षाणि मुञ्चन्तो मेघाः पर्वतय़ोरिव ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९७
सञ्जय़ उवाच
शरवर्षाणि मुञ्चन्तो विविधानि महारथाः |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
शरवर्षाभिवृष्टेषु योधेष्वजितलक्ष्मसु |
६३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
शरवर्षेण महता ततोऽहृष्यन्त तावकाः |
२५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
शरवर्षेण महता दुर्योधनमवाकिरत् |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
शरवर्षेण महता न प्राज्ञाय़त किञ्चन ||
४१ ख
शल्य पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
शरवर्षेण महता युधिष्ठिरमपीडय़त् ||
२६ ख
विराट पर्व
अध्याय ५५
वैशम्पाय़न उवाच
शरवर्षेण महता वर्षमाण इवाम्वुदः ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
शरवर्षेण महता सञ्छन्नो न प्रकाशते ||
५० ख
शल्य पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
शरवर्षेण महता समन्तात्पर्यवारय़त् ||
२६ ख
शल्य पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
शरवर्षेण महता समन्तात्पर्यवारय़न् ||
५२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३४
सञ्जय़ उवाच
शरवर्षेण महता समन्ताद्व्यकिरत्प्रभो ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
शरवर्षेण वीभत्सुमविध्येतां पुनः पुनः ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय २१८
वैशम्पाय़न उवाच
शरवर्षेण वीभत्सुरुत्तमास्त्राणि दर्शय़न् ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
शरवर्षैः पुनर्भीमं प्रत्यवारय़दच्युतम् ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
शरवर्षैरकरुणा वालमेकमवाकिरन् ||
३३ ख