chevron_left  धनलिप्सुरहंarrow_drop_down
आदि पर्व
अध्याय ४६
मन्त्रिण ऊचुः
धनलिप्सुरहं तत्र यामीत्युक्तश्च तेन सः |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३३
मातो उवाच
धनवन्तं हि मित्राणि भजन्ते चाश्रय़न्ति च ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७०
भीष्म उवाच
धनवान्क्रोधलोभाभ्यामाविष्टो नष्टचेतनः |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२५
भीष्म उवाच
धनवुद्धिश्रुतैर्हीनः केवलं तेजसान्वितः |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
धनवृद्धान्गुणैर्हीनान्धृतराष्ट्र विवर्जय़ेत् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
धनस्य यस्य राजतो भय़ं न चास्ति चौरतः |
४५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
अङ्गिरा उवाच
धनाढ्यं स्फीतमचलमैश्वर्यं प्रतिपद्यते ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
धनात्कुलं प्रभवति धनाद्धर्मः प्रवर्तते |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९१
उतथ्य उवाच
धनात्स्रवति धर्मो हि धारणाद्वेति निश्चय़ः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
धनादानाद्दुःखतरं जीविताद्विप्रय़ोजनम् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
धनाद्धि धर्मः स्रवति शैलाद्गिरिनदी यथा ||
२३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
धनाधिपत्यं सख्यं च रुद्रेणामिततेजसा ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
धनाधिपत्यं सम्प्राप्तो राजन्नैलविलः प्रभुः ||
२२ ग
सौप्तिक पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
धनाध्यक्षोपमं युद्धे शिष्यं सङ्कर्षणस्य ह ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५५
कुशिक उवाच
धनानां च विसर्गस्य वनस्यापि च दर्शनम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२२
वसुहोम उवाच
धनानां रक्षसां चापि कुवेरमपि चेश्वरम् |
२८ क
वन पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
धनानामीश्वरः श्रीमानर्जुनं द्रष्टुमागतः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६२
कपिल उवाच
धनानामेष वै पन्थास्तीर्थेषु प्रतिपादनम् ||
४ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४८
ऋषय़ ऊचुः
धनानि केचिदिच्छन्ति निर्धनत्वं तथापरे |
२० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
धनानि चेति विद्धि त्वं क्षत्तर्नास्त्यत्र संशय़ः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७२
भीष्म उवाच
धनानि तेभ्यो दद्यास्त्वं यथाशक्ति यथार्हतः |
२३ क
वन पर्व
अध्याय १८१
मार्कण्डेय़ उवाच
धनानि येषां विपुलानि सन्ति; नित्यं रमन्ते सुविभूषिताङ्गाः |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
धनान्यपत्यं मित्राणि रत्नानि विविधानि च |
४ क
सभा पर्व
अध्याय २५
वैशम्पाय़न उवाच
धनान्यादाय़ सर्वेभ्यो रत्नानि विविधानि च ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३८
विदुर उवाच
धनाभिजनवृद्धांश्च नित्यं मूढोऽवमन्यते ||
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय ३९
काश्यप उवाच
धनार्थी याम्यहं तत्र तन्मे दित्स भुजङ्गम |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८२
भीष्म उवाच
धनार्थी लभते वित्तं धर्मार्थी धर्ममाप्नुय़ात् ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८९
भीष्म उवाच
धनिनः पूजय़ेन्नित्यं यानाच्छादनभोजनैः |
२५ क
कर्ण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
धनिनामिव वेश्मानि हतान्यग्न्यनिलाम्वुभिः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
धनिनो वलमुख्यांश्च सान्त्वय़ित्वा पुनः पुनः ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७०
युधिष्ठिर उवाच
धनिनो वाधना ये च वर्तय़न्ति स्वतन्त्रिणः |
१ क
वन पर्व
अध्याय २१९
मार्कण्डेय़ उवाच
धनिष्ठादिस्तदा कालो व्रह्मणा परिनिर्मितः |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४२
व्राह्मणा ऊचुः
धनी गत्वा कपानाह न वो विप्राः प्रिय़ङ्कराः |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
धनुः क्षेमकरं सङ्ख्ये द्विषतामश्रुवर्धनम् ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
धनुः पश्य च मे चित्रं शरांश्चाशीविषोपमान् |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
धनुः प्रपीड्य वामेन करेणामित्रकर्शनः ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
धनुः प्रपीड्य वामेन करेणामित्रकर्शनः |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८४
सञ्जय़ उवाच
धनुः प्रपीड्य वामेन करेणामित्रकर्शनः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
धनुः प्रहरणं श्रेष्ठमिति वादः पितामह |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
धनुः शरांश्च चिच्छेद सूतं चाभ्यहनच्छरैः ||
४५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १८
वासुदेव उवाच
धनुः सृष्टमभूत्तस्य पञ्चकिष्कुप्रमाणतः ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
धनुःशव्दं महत्कृत्वा सहाय़ुध्यन्त पाण्डवैः ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
धनुःशव्देन चाकाशे शव्दः समभवन्महान् ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
धनुःशव्दैश्च विविधैः कुरवः समपूजय़न् ||
१५ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १८१
भीष्म उवाच
धनुःश्रेष्ठं समुत्सृज्य सहसावतरं रथात् ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
धनुःसंस्थे महाराज द्वे वर्षे दक्षिणोत्तरे |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
धनुरन्यत्समादाय़ तिष्ठ तिष्ठेत्युवाच ह ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९०
सञ्जय़ उवाच
धनुरन्यत्समादाय़ शिखण्डी तु महाय़शाः |
३५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
धनुरन्यत्समादाय़ सज्यं कृत्वा च संय़ुगे |
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
धनुरन्यत्समादाय़ समार्गणगणं प्रभो |
६८ ख