अनुशासन पर्व
अध्याय
७२
व्रह्मो उवाच
स दिव्यमय़ुतं शक्र वर्षाणां फलमश्नुते ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
स दिव्ये सहजे प्रादात्कुण्डले परमार्चिते |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५
शल्य उवाच
स दिशः प्रदिशश्चैव पर्वतांश्च वनानि च |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
स दिशः सर्वतो रुद्ध्वा संवृत्य खमजिह्मगैः |
२८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
स दिशो विदिशश्चैव छादय़ित्वा विजिह्मगैः |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७७
वासुदेव उवाच
स दिष्ट्या समनुप्राप्तस्तव पार्थ रथान्तिकम् |
१० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
स दीक्षां तत्र सम्प्राप्य राजा कौरवनन्दनः |
१२ क
सभा पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
स दीक्षापय़ गोविन्द त्वमात्मानं महाभुज |
२१ क
सभा पर्व
अध्याय
४५
धृतराष्ट्र उवाच
स दीन इव दुर्धर्षः कस्माच्छोचसि पुत्रक ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
स दीप्तशरचापार्चिरस्त्रप्रसृतमारुतः |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
स दीप्यमानः सहसान्तरिक्षं; प्रकाशय़न्मातलिसङ्गृहीतः |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५१
सञ्जय़ उवाच
स दीर्घकालाध्युषितं पूर्ववैरमनुस्मरन् |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
स दीर्घमाय़ुः कीर्तिं च स्वर्गतिं चाप्नुय़ान्नरः ||
२०७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
स दीर्घमिव निःश्वस्य विप्रेक्ष्य च पुनः पुनः |
४७ क
वन पर्व
अध्याय
२९७
वैशम्पाय़न उवाच
स दीर्घमुष्णं निःश्वस्य शोकवाष्पपरिप्लुतः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
स दीर्घवाहुः पृथ्वंसो दीर्घराजीवलोचनः |
७१ क
शल्य पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
स दीर्घवाहुः सङ्क्रुद्धस्तोत्त्रार्दित इव द्विपः |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
स दीर्घवाहुर्दृढधन्वा महात्मा; भिन्द्याद्गिरीन्संहरेत्सर्वलोकान् |
४३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
स दीर्घसूत्रो हीनार्थः पश्चात्तापेन युज्यते ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२
वलदेव उवाच
स दीव्यमानः प्रतिदेवनेन; अक्षेषु नित्यं सुपराङ्मुखेषु |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०८
गुरुरु उवाच
स दुःखं प्राप्य लोकेऽस्मिन्नरकाय़ोपपद्यते |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
स दुःखप्रतिघातार्थं हन्ति जन्तूननेकधा ||
५४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६४
भीष्म उवाच
स दुर्गं विषमं कृच्छ्रं न कदाचिदवाप्नुते ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
नाचिकेत उवाच
स दुर्गात्तारितो धेन्वा क्षीरनद्यां प्रमोदते ||
३९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
स दुर्मतिः कच्चिदुपेत्य सङ्ख्ये; त्वय़ा हतः सूतपुत्रोऽत्यमर्षी ||
४५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
स दुर्मुखं भ्रुवोर्मध्ये नाराचेन व्यताडय़त् |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
स दुष्टः पापमाशंसन्पाण्डवानां महात्मनाम् |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
स दृश्यमानो रक्षोभिर्जलमध्येऽवदत्ततः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३
नारद उवाच
स दृष्टमात्रो रामेण कृमिः प्राणानवासृजत् |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
स दृष्टवान्महादेवमस्तौषीच्च स्तवैर्विभुम् |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
९
सूत उवाच
स दृष्ट्वा जिह्मगान्सर्वांस्तीव्रकोपसमन्वितः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
१०६
लोमश उवाच
स दृष्ट्वा तेजसो राशिं पुराणमृषिसत्तमम् |
२२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
स दृष्ट्वा निहतान्सङ्ख्ये पुत्रान्भ्रातॄन्सखींस्तथा |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
१५८
वैशम्पाय़न उवाच
स दृष्ट्वा पाण्डवांस्तत्र सह मात्रा परन्तपान् |
६ क
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
स दृष्ट्वा पाण्डवान्दूरात्कृष्णाजिनसमावृतान् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
११६
अकृतव्रण उवाच
स दृष्ट्वा पितरं वीरस्तथा मृत्युवशं गतम् |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
स दृष्ट्वा पुनराय़ान्तं रथेन रथिनां वरम् |
७४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
स दृष्ट्वा पुनराय़ान्तं रथेनाय़तकार्मुकम् |
७४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२००
भीष्म उवाच
स दृष्ट्वा पृथिवीं चैव सर्वभूतेश्वरः प्रभुः |
९ क
वन पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
स दृष्ट्वा फल्गुनं वीरं चिरस्य प्रिय़मागतम् |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
स दृष्ट्वा भिक्षुरूपेण प्राप्तं तत्र महामुनिम् |
१० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
स दृष्ट्वा भीमधन्वानं प्रगृहीतशरासनम् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११३
भीष्म उवाच
स दृष्ट्वा मांसजीवी तु सुभृशं क्षुच्छ्रमान्वितः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
स दृष्ट्वा वाणवर्षं तन्मोघीभूतं धनञ्जय़ः |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
२९६
वैशम्पाय़न उवाच
स दृष्ट्वा विमलं तोय़ं सारसैः परिवारितम् |
११ क
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
स दृष्ट्वा विमले व्योम्नि निर्मलं शशलक्षणम् |
२ क
वन पर्व
अध्याय
६३
वृहदश्व उवाच
स दृष्ट्वा विस्मितस्तस्थावात्मानं विकृतं नलः |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०४
नारद उवाच
स दृष्ट्वा शिरसा भक्तं ध्रिय़माणं महर्षिणा |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९४
राम उवाच
स दृष्ट्वा श्वेतमाकाशमिषीकाभिः समाचितम् |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
स दृष्ट्वा स्वानि कर्माणि कुले जन्म च भारत |
२२ क