वन पर्व
अध्याय
२३
वासुदेव उवाच
ततो विषण्णमनसो मम राजन्सुहृज्जनाः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
७०
वृहदश्व उवाच
ततो विषविमुक्तात्मा स्वरूपमकरोत्कलिः |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
ततो विष्टभ्य विपुलो गुरुपत्न्याः कलेवरम् |
५८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०२
भीष्म उवाच
ततो विष्णुर्महातेजा वाराहं रूपमाश्रितः |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
ततो विष्णुर्वनं दृष्ट्वा निर्दग्धमरिकर्शनः |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३५
वैशम्पाय़न उवाच
ततो विसर्जय़ामास भीष्मादीन्कुरुपुङ्गवान् |
२४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
ततो विसर्जय़ामास लोकांस्तान्मुनिपुङ्गवः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
ततो विसर्जय़ामास सर्वाः प्रकृतय़ो नृपः |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
ततो विसस्रुः पुनरर्दिताः शरै; र्नरोत्तमाभ्यां कुरुपाण्डवाश्रय़ाः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२२
भीष्म उवाच
ततो विसृष्टः परमेष्ठिपुत्रः; सोऽभ्यर्चय़ित्वा तमृषिं पुराणम् |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
भीष्म उवाच
ततो विसृष्टो राज्ञा तु विप्रो दानान्यनेकशः |
५६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४२
सञ्जय़ उवाच
ततो विस्फार्य नय़ने क्रोधाद्द्विगुणविक्रमः |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
ततो विस्फार्य नय़ने धनुर्ज्यामवमृज्य च |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
ततो विस्फार्य वलवद्गाण्डीवं जघ्निवान्रिपून् |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
ततो विस्फार्य सुमहद्धेमपृष्ठं दुरासदम् |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
२
शौनक उवाच
ततो विहारैराहारैर्मोहितश्च विशां पते |
६६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
ततो विह्वलमानं तं निःश्वसन्तं पुनः पुनः |
३० क
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
ततो वीक्ष्य दिशः सर्वा दृष्ट्वा शून्यां च मेदिनीम् |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
ततो वीक्ष्य नरश्रेष्ठमभ्यभाषत पाण्डवम् |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
ततो वीरौ महेष्वासौ विमुक्तौ केशवार्जुनौ |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७२
भीष्म उवाच
ततो वुद्धिमुपागम्य भगवान्पाकशासनः |
२८ क
शल्य पर्व
अध्याय
४९
सिद्धा ऊचुः
ततो वुद्ध्या व्यगणय़द्देवलो धर्मय़ुक्तय़ा |
५१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
ततो वृकं साश्वरथं महाजवं; त्वरंश्चतुर्भिश्चरणे व्यपोथय़त् ||
४८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
ततो वृकोदरः क्रुद्धः शल्यं विव्याध सप्तभिः |
२९ क
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
ततो वृकोदरो राजन्दत्त्वा तेषां धनं वहु |
४२ क
आदि पर्व
अध्याय
३९
तक्षक उवाच
ततो वृक्षं मय़ा दष्टमिमं जीवय़ काश्यप ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
ततो वृक्षैः शिलाभिश्च योधय़ामास फल्गुनः |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
भीष्म उवाच
ततो वृक्षौषधितृणं तथैवोक्तं यथातथम् |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
भीष्म उवाच
ततो वृक्षौषधितृणं समाहूय़ पितामहः |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
भीष्म उवाच
ततो वृक्षौषधितृणमेवमुक्तं महात्मना |
४० क
आदि पर्व
अध्याय
१४२
हिडिम्वो उवाच
ततो वृतो मय़ा भर्ता तव पुत्रो महावलः |
९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
११
वासुदेव उवाच
ततो वृत्रं शरीरस्थं जघान भरतर्षभ |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
९८
लोमश उवाच
ततो वृत्रवधे यत्नमकुर्वंस्त्रिदशाः पुरा |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
ततो वृद्धा महाराज योषितां रक्षणो नराः |
६३ क
आदि पर्व
अध्याय
१७२
गन्धर्व उवाच
ततो वृद्धांश्च वालांश्च राक्षसान्स महामुनिः |
३ क
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
ततो वृद्धांश्च वालांश्च स्त्रिय़श्चादाय़ पाण्डवः |
६८ क
वन पर्व
अध्याय
२७९
मार्कण्डेय़ उवाच
ततो वृद्धान्द्विजान्सर्वानृत्विजः सपुरोहितान् |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
ततो वृन्दारकं वीरं कुरूणां कीर्तिवर्धनम् |
९५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
ततो वृन्दारकं वीरं कुरूणां कीर्तिवर्धनम् |
१२ क
विराट पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
ततो वृन्देन महता रथानां रथय़ूथपः |
६५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३२
सञ्जय़ उवाच
ततो वृषरथो नाम भ्राता कर्णस्य विश्रुतः |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
कृष्ण उवाच
ततो वृषो वाणनिपातकोपितो; महोरगो दण्डविघट्टितो यथा |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
२३
वासुदेव उवाच
ततो वृष्णिप्रवीरा ये ममासन्सैनिकास्तदा |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
ततो वृष्णिप्रवीरांस्तान्वालान्हत्वा वहूंस्तदा |
७ क
सभा पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
ततो वृहन्तस्तरुणो वलेन चतुरङ्गिणा |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
धृतराष्ट्र उवाच
ततो वृहस्पतिं शक्रः प्राञ्जलिः समुपस्थितः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७२
भीष्म उवाच
ततो वृहस्पतिर्धीमानुपागम्य शतक्रतुम् |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
धृतराष्ट्र उवाच
ततो वृहस्पतिस्तस्मै ज्ञानं नैःश्रेय़सं परम् |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
१६६
अर्जुन उवाच
ततो वेगेन महता दानवा मामुपाद्रवन् |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७०
सञ्जय़ उवाच
ततो वेगेन महता विनद्य स नरर्षभः |
४ क