chevron_left  कर्णोऽपिarrow_drop_down
द्रोण पर्व
अध्याय १२२
सञ्जय़ उवाच
कर्णोऽपि विह्वलो राजन्सात्वतेनार्दितः शरैः |
६६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
कर्णोऽपि समरे राजन्धर्मपुत्रमरिन्दमम् |
३९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
कर्णोऽपि समरे राजन्विधूमोऽग्निरिव ज्वलन् |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०८
सञ्जय़ उवाच
कर्णोऽप्यन्यद्धनुर्गृह्य हेमपृष्ठं दुरासदम् |
२६ क
वन पर्व
अध्याय २४०
वैशम्पाय़न उवाच
कर्णोऽप्याविष्टचित्तात्मा नरकस्यान्तरात्मना |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय १२७
वैशम्पाय़न उवाच
कर्णोऽभिषेकार्द्रशिराः शिरसा समवन्दत ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २३
युधिष्ठिर उवाच
कर्णोऽमात्यः कुशली तात कच्चि; त्सुय़ोधनो यस्य मन्दो विधेय़ः ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
कर्णोऽर्जुनं रणे हन्ता हते तस्मिन्किमव्रवीत् ||
९२ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
कर्णोऽहं भीमसेनोऽहमर्जुनोऽहमिति प्रभो ||
४० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
कर्णोऽहमस्मि भद्रं ते अद्य मा वद भारत |
९ क
वन पर्व
अध्याय ११२
ऋश्यशृङ्ग उवाच
कर्णौ च चित्रैरिव चक्रवालैः; समावृतौ तस्य सुरूपवद्भिः ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
कर्णौ तु नागद्वीपं च कश्यपद्वीपमेव च ||
५२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २३१
व्यास उवाच
कर्णौ त्वक्चक्षुषी जिह्वा नासिका चैव पञ्चमी |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१२
भीष्म उवाच
कर्णौ शव्दश्च चित्तं च त्रय़ः श्रवणसङ्ग्रहे |
२३ क
विराट पर्व
अध्याय २
अर्जुन उवाच
कर्णय़ोः प्रतिमुच्याहं कुण्डले ज्वलनोपमे |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३१
व्यास उवाच
कर्णय़ोः प्रदिशः श्रोत्रे जिह्वाय़ां वाक्सरस्वती ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय २५५
वैशम्पाय़न उवाच
कर्तव्यं चेत्प्रिय़ं मह्यं वध्यः स पुरुषाधमः |
४५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
कर्तव्यं तन्मनुष्येण क्षत्रधर्मेण वर्तता ||
४८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
कर्तव्यं ते दुष्करं कर्म पार्थ; योद्धव्यं ते शत्रुभिः सव्यसाचिन् ||
६१ ख
वन पर्व
अध्याय ३३
द्रौपद्यु उवाच
कर्तव्यं त्वेव कर्मेति मनोरेष विनिश्चय़ः |
३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२९
महेश्वर उवाच
कर्तव्यं धर्मपरमं मानवेन प्रय़त्नतः ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
कर्तव्यं न प्रजानाति मोहितः परमाहवे ||
५१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
कर्तव्यं नाभिजानाति रणे भीष्मस्य गौरवात् ||
७० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
कर्तव्यं नाभिजानीमो निर्जिताः सव्यसाचिना ||
१०६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १६
व्राह्मण उवाच
कर्तव्यं निधनं लोके शस्त्रेण क्षत्रवन्धुना ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
कर्तव्यं सात्वतश्रेष्ठ पाण्डवानां हितैषिणा ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय २३८
वैशम्पाय़न उवाच
कर्तव्यं हि कृतं राजन्पाण्डवैस्तव मोक्षणम् |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०१
याज्ञवल्क्य उवाच
कर्तव्यमधिभूतं तु इन्द्रस्तत्राधिदैवतम् ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय ३२
युधिष्ठिर उवाच
कर्तव्यममरप्रख्याः प्रत्यक्षागमवुद्धय़ः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५५
तुलाधार उवाच
कर्तव्यमिति कर्तव्यं वेत्ति यो व्राह्मणोभय़म् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय २
शौनक उवाच
कर्तव्यमिति यत्कार्यं नाभिमानात्समाचरेत् ||
७२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८४
भीष्म उवाच
कर्तव्या भूतिकामेन पुरुषेण वुभूषता ||
१८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
कर्तव्यानीति पुरुषान्दत्तदेय़ान्महीपतिः ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
कर्तव्यानीह विप्रेण राजन्नादौ विपश्चिता ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय ३६
भीमसेन उवाच
कर्तव्ये पुरुषव्याघ्र किमास्से पीठसर्पवत् |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३४६
व्राह्मण उवाच
कर्तव्यो न च सन्तापो गम्यतां च यथागतम् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५६
भीष्म उवाच
कर्तव्यो राजशार्दूल दोषमत्र हि मे शृणु ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८७
पराशर उवाच
कर्ता खलु यथाकालं तत्सर्वमभिपद्यते |
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६९
सञ्जय़ उवाच
कर्ता त्वं कर्मणोग्रस्य नाहं वृष्णिकुलाधम |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४६
भीष्म उवाच
कर्ता पापस्य महतो भ्रूणहा किमिहागतः ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६४
भीष्म उवाच
कर्ता विमर्दे सुमहत्त्वदर्थे पुरुषोत्तमः ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
कर्ता शिल्पसहस्राणां त्रिदशानां च वर्धकिः ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१५
युधिष्ठिर उवाच
कर्ता स्वित्तस्य पुरुष उताहो नेति संशय़ः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६८
भीष्म उवाच
कर्ता स्वेच्छेन्द्रिय़ो गच्छेद्यदि राजा न पालय़ेत् ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४८
भीष्म उवाच
कर्ता ह्यस्मि प्रिय़ं शम्भो तव यद्धृदि वर्तते ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३८
वाय़ुरु उवाच
कर्तारं जीवलोकस्य कस्माज्जानन्विमुह्यसे ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
कर्तारः स्म वय़ं सर्वं यच्चिकीर्षाम हृद्गतम् ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
कर्तारमकृतं देवं भूतानां प्रभवाप्ययम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २००
युधिष्ठिर उवाच
कर्तारमकृतं विष्णुं भूतानां प्रभवाप्ययम् ||
१ ख