वन पर्व
अध्याय
२१७
मार्कण्डेय़ उवाच
कुमाराश्च विशाखं तं पितृत्वे समकल्पय़न् ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
कुमारास्त्वथ निष्क्रम्य समेता गजसाह्वय़ात् |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
कुमाराय़ महात्मानौ तपोविद्याधरौ प्रभुः ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
कुमारिकाणां शक्रस्य तीर्थं सिद्धनिषेवितम् |
९७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११४
नारद उवाच
कुमारी कामतो भूत्वा गालवं पृष्ठतोऽन्वगात् ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५५
व्राह्मण उवाच
कुमारी चापि पाञ्चाली वेदिमध्यात्समुत्थिता |
४१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११६
नारद उवाच
कुमारीं देवगर्भाभामेकपुत्रभवाय़ मे ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
कुमारीमृषिकुल्यां च व्रह्मकुल्यां च भारत ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
कुमारे निहते तस्मिन्मगधस्य सुते प्रभो |
३३ क
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
कुमारेण महाराज त्रिविष्टपमिवापरम् ||
८९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१०
वैशम्पाय़न उवाच
कुमारैः सर्वशो वीरः सत्कारेणाभिवादितः |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
कुमारो देवगर्भाभः स तत्राशु व्यवर्धत ||
४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
कुमारो नास्ति येषां च कन्यास्तत्राभिषेचय़ |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
१८२
वैशम्पाय़न उवाच
कुमारो रूपसम्पन्नो मृगय़ामचरद्वली ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
८६
धौम्य उवाच
कुमार्यः कथिताः पुण्याः पाण्ड्येष्वेव नरर्षभ |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
कुमार्यः काञ्चनाभासा रूपवत्यो नय़न्ति तम् |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९१
उतथ्य उवाच
कुमार्यः सम्प्रलुप्यन्ते तदाहुर्नृपदूषणम् ||
३७ ख
विराट पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
कुमार्यस्तत्र तं दृष्ट्वा प्राहसन्पृथुलोचनाः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
कुमित्रे नास्ति विश्वासः कुभार्याय़ां कुतो रतिः |
९० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
कुमित्रे सङ्गतं नास्ति नित्यमस्थिरसौहृदे |
९१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
कुमुदः कुन्दरः कुन्दः पर्जन्यः पवनोऽनिलः |
१०० क
आदि पर्व
अध्याय
३१
सूत उवाच
कुमुदः कुमुदाक्षश्च तित्तिरिर्हलिकस्तथा |
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
कुमुदैः पुण्डरीकैश्च तथा कोकनदोत्पलैः |
४९ ख
वन पर्व
अध्याय
१७९
वैशम्पाय़न उवाच
कुमुदैः पुण्डरीकैश्च शीतवारिधराः शिवाः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
कुमुदोत्पलपद्मानां गन्धमादाय़ वाय़ुना |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२७०
मार्कण्डेय़ उवाच
कुम्भकर्णं पुरस्कृत्य तूर्णं निर्ययतुः पुरात् ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
२५९
मार्कण्डेय़ उवाच
कुम्भकर्णदशग्रीवौ वलेनाप्रतिमौ भुवि ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
२५९
मार्कण्डेय़ उवाच
कुम्भकर्णमथोवाच तथैव प्रपितामहः |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
कुम्भकर्णादय़श्चेमे नग्नाः पतितमूर्धजाः |
६५ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
कुम्भकर्णाश्रमे स्नात्वा पूज्यते भुवि मानवः ||
१३६ ख
वन पर्व
अध्याय
२७१
मार्कण्डेय़ उवाच
कुम्भकर्णो महेष्वासः प्रगृहीतशिलाय़ुधः |
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
२५९
मार्कण्डेय़ उवाच
कुम्भकर्णो वलेनासीत्सर्वेभ्योऽभ्यधिकस्तदा |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
कुम्भकारस्य शालाय़ां निवेशं चक्रिरे तदा ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
कुम्भान्तरे भीमसेनो नाराचेनार्दय़द्भृशम् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
कुम्भाश्च नगरद्वारि वारिपूर्णा दृढा नवाः |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३५
व्यास उवाच
कुम्भीधान्यैरुञ्छशिलैः कापोतीं चास्थितैस्तथा |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
कुम्भीपाके च पच्यन्ते तां तां योनिमुपागताः |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
कुम्भेषु लीनाः सुषुपुर्गजानां; कुचेषु लग्ना इव कामिनीनाम् ||
४१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
कुम्भय़ोरन्तरे नागं नाराचेन समार्पय़त् ||
३७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
कुरङ्गगतिनिर्घोषमुद्भ्रान्तसृमराचितम् ||
७५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
कुरङ्गवर्हिणाकीर्णं मार्जारभुजगावृतम् |
३३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
कुररीणामिवार्तानां क्रोशन्तीनां ददर्श ह ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
१२८
लोमश उवाच
कुररीणामिवार्तानामपाकृष्य तु तं सुतम् |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
कुरर्य इव शव्देन नादय़न्त्यो महीतलम् ||
६५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
कुरवः कर्ण कर्णेति हा हेति च विचुक्रुशुः ||
४९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
कुरवः पर्यवर्तन्त निर्दग्धाः सव्यसाचिना ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
कुरवः पर्यवर्तन्त पाण्डवाश्च विशां पते ||
१० ग
भीष्म पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
कुरवः पाण्डवाश्चैव पुनर्युद्धाय़ निर्ययुः ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५२
द्रोण उवाच
कुरवः पाण्डवाश्चैव वृष्णय़ोऽन्ये च मानवाः |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
कुरवः पाण्डवेय़ाश्च निजघ्नुरितरेतरम् ||
१२ ख