chevron_left  धनुर्वाणधरंarrow_drop_down
आदि पर्व
अध्याय १२०
वैशम्पाय़न उवाच
धनुर्वाणधरं वाला लोभय़ामास गौतमम् ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
धनुर्वाणश्च शत्रुघ्नं तद्द्वन्द्वं समपद्यत ||
७२ ख
वन पर्व
अध्याय १६३
अर्जुन उवाच
धनुर्वाणासिमत्प्राप्तं स्त्रीगणानुगतं तदा ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
धनुर्वाणोचितेनैकपाणिना शुभलक्षणम् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय २१४
मार्कण्डेय़ उवाच
धनुर्विकृष्य व्यसृजद्वाणाञ्श्वेते महागिरौ ||
३० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
धनुर्विस्फार्य सङ्क्रुद्धश्चोदय़ित्वा वरूथिनीम् |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
धनुर्विस्फारय़न्कर्णस्तस्थौ शत्रुजिघांसय़ा |
४२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
धनुर्विस्फारय़न्घोरं परिवेषीव भास्करः ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
धनुर्विस्फारय़न्द्रोणस्तस्थौ क्रुद्ध इवान्तकः ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
धनुर्विस्फारय़ात्यर्थमहं ध्मास्यामि चाम्वुजम् ||
३५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
धनुर्वेदं चिकीर्षन्तो द्रोणपुत्रस्य धीमतः ||
९५ ख
आदि पर्व
अध्याय १२०
वैशम्पाय़न उवाच
धनुर्वेदपरत्वाच्च तपसा विपुलेन च |
५ क
वन पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
धनुर्वेदपरा वीराः शृण्वाना वेदमुत्तमम् ||
४० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
धनुर्वेदविदो मुख्या अजेय़ाः शत्रुभिर्युधि |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय ५३
अर्जुन उवाच
धनुर्वेदश्च कार्त्स्न्येन यस्मिन्नित्यं प्रतिष्ठितः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
धनुर्वेदश्चतुष्पाद एतेष्वद्य प्रतिष्ठितः ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
धनुर्वेदश्चतुष्पादः शस्त्रग्रामः ससङ्ग्रहः |
२२ क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
धनुर्वेदस्य सूत्रं च यन्त्रसूत्रं च नागरम् ||
११० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
धनुर्वेदे गताः पारं मुष्टिय़ुद्धे च कोविदाः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५०
वैशम्पाय़न उवाच
धनुर्वेदे च वेदे च नित्यं चैवान्ववेक्षणे ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
धनुर्वेदे च वेदे च निरतो योऽभवत्सदा ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
धनुर्वेदे च वेदे च यं तं वेदविदो विदुः |
६५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
धनुर्वेदे च वेदे च यत्नः कार्यो नराधिप |
१३८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३१
भीष्म उवाच
धनुर्वेदे च वेदे च सर्वत्रैव कृतश्रमाः ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय ४५
सूत उवाच
धनुर्वेदे च शिष्योऽभून्नृपः शारद्वतस्य सः ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय २४१
वैशम्पाय़न उवाच
धनुर्वेदे च शौर्ये च धर्मे वा धर्मवत्सल ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
धनुर्वेदे मत्समो नास्ति लोके; पराक्रमे वा मम कोऽस्ति तुल्यः |
३० क
आदि पर्व
अध्याय १०२
वैशम्पाय़न उवाच
धनुर्वेदेऽश्वपृष्ठे च गदाय़ुद्धेऽसिचर्मणि |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय १५
धृतराष्ट्र उवाच
धनुर्ह्वादमहाशव्दो महामेघ इवोन्नतः ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय १२०
वैशम्पाय़न उवाच
धनुश्च सशरं दृष्ट्वा तथा कृष्णाजिनानि च |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय १२०
वैशम्पाय़न उवाच
धनुश्च हि शराश्चास्य कराभ्यां प्रापतन्भुवि |
९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८३
वैशम्पाय़न उवाच
धनुश्चास्य महच्चित्रं क्षुरेण प्रचकर्त ह |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९९
सञ्जय़ उवाच
धनुश्चास्य रणे छित्त्वा विस्मय़न्नर्जुनं यय़ौ ||
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
धनुश्चास्य शिताग्रेण वाणेन निरकृन्तत ||
६१ ग
द्रोण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
धनुश्चास्यापरैश्छित्त्वा शरैः पार्थो विचक्रमे ||
५७ ग
शल्य पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
धनुश्चिच्छेद च शरैः सौवलस्य हसन्निव ||
२४ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
धनुश्चिच्छेद भल्लेन कार्तस्वरविभूषितम् |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
धनुश्चिच्छेद भल्लेन जघानाश्वांश्च सप्तभिः |
६३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
धनुश्चिच्छेद भल्लेन जातरूपपरिष्कृतम् ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४०
सञ्जय़ उवाच
धनुश्चिच्छेद भल्लेन तं च विव्याध सप्तभिः ||
२५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
धनुश्चिच्छेद भल्लेन तं च विव्याध सप्तभिः ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८२
सञ्जय़ उवाच
धनुश्चिच्छेद भल्लेन पीतेन निशितेन च ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
धनुश्चिच्छेद भल्लेन पीतेन निशितेन च ||
११ ख
शल्य पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
धनुश्चिच्छेद भल्लेन सहदेवस्य मारिष ||
१० ग
द्रोण पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
धनुश्चिच्छेद भल्लेन सुतीक्ष्णेन हसन्निव ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १११
सञ्जय़ उवाच
धनुश्चिच्छेद भल्लेन सूतपुत्रस्य मारिष ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
धनुश्चिच्छेद भल्लेन सौवलस्य हसन्निव ||
५२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३७
सञ्जय़ उवाच
धनुश्चिच्छेद भल्लेन हस्तावापं च पञ्चभिः ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५२
सञ्जय़ उवाच
धनुश्चिच्छेद भीमस्य राक्षसेन्द्रः प्रतापवान् ||
३८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
धनुश्चिच्छेद राजेन्द्र सत्यसेनस्य पाण्डवः ||
२७ ख