chevron_left  शिरस्यभिहतंarrow_drop_down
शल्य पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
शिरस्यभिहतं दृष्ट्वा भीमसेनेन ते सुतम् |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७६
भीष्म उवाच
शिरस्यवाप तत्क्रुद्धः स तदोदैक्षत प्रभुः |
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७१
सञ्जय़ उवाच
शिरस्यासीन्नरश्रेष्ठः श्रेष्ठः सर्वधनुष्मताम् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय २०
वासुदेव उवाच
शिरस्युरसि वक्त्रे च स मुमोह पपात च ||
१८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १६
द्रौपद्यु उवाच
शिरस्येतं मणिं राजा प्रतिवध्नातु भारत ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
शिरांसि च तदा भीष्मो वाहूंश्चापि सहाय़ुधान् |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
शिरांसि च महाराज कर्णांश्चञ्चलकुण्डलान् |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२०
सञ्जय़ उवाच
शिरांसि च महावाहुश्चिच्छेद निशितैः शरैः |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
शिरांसि च शितैर्भल्लैस्तेषां चिच्छेद फाल्गुनिः ||
२६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७७
वैशम्पाय़न उवाच
शिरांसि पातय़ामास भल्लैः संनतपर्वभिः ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
शिरांसि पातय़ामास वाहूंश्चैव धनञ्जय़ः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय २५५
वैशम्पाय़न उवाच
शिरांसि पादरक्षाणां वीजवत्प्रवपन्मुहुः ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
शिरांसि भल्लैरहरद्वाहूनपि च साय़ुधान् |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
शिरांसि रथिनां पार्थः काय़ेभ्योऽपाहरच्छरैः ||
३४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८२
सञ्जय़ उवाच
शिरांसि रथिनां भीष्मः पातय़ामास संय़ुगे |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
शिरांसि वाहूनूरूंश्च छिन्नानन्यांस्तथा युधि |
११५ क
वन पर्व
अध्याय १७०
अर्जुन उवाच
शिरांसि विशिखैर्दीप्तैर्व्यहरं शतसङ्घशः ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९
शल्य उवाच
शिरांस्यथ त्रिशिरसः कुठारेणाच्छिनत्तदा ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
शिरांस्यपातय़च्चापि पाञ्चालानां महामृधे |
८० ख
वन पर्व
अध्याय १३४
वन्द्यु उवाच
शिरांस्यपाहरत्वाजौ रिपूणां भद्रमस्तु ते ||
३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
शिरांस्याददिरे वीरा रथिनामश्वसादिनः ||
२२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
शिरांस्युन्मथ्य वीराणां शितैर्भल्लैर्धनञ्जय़ः |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
शिरांस्युर्व्यामदृश्यन्त तारागण इवाम्वरे ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय २६७
मार्कण्डेय़ उवाच
शिरीषकुसुमाभानां सिंहानामिव नर्दताम् |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
शिरो गृहीत्वा केशेषु कवन्धः समदृश्यत |
७९ क
सभा पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
शिरो गृहीत्वा विदुरो गतसत्त्व इवाभवत् |
४० क
द्रोण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
शिरो दुर्योधनो राजा सोदर्यैः सानुगैः सह ||
५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २२
गान्धार्यु उवाच
शिरो भर्तुरनासाद्य धावमानामितस्ततः ||
१६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६१
सञ्जय़ उवाच
शिरो मृदित्वा च पदा दुरात्मनः; शान्तिं लप्स्ये कौरवाणां समक्षम् ||
१६ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ११५
सञ्जय़ उवाच
शिरो मे लम्वतेऽत्यर्थमुपधानं प्रदीय़ताम् ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय २६५
मार्कण्डेय़ उवाच
शिरोधरां च तन्वङ्गी मुखं प्रच्छाद्य वाससा ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३४
सञ्जय़ उवाच
शिरोभिः पतितै राजन्वाहुभिश्च समन्ततः |
२७ क
शल्य पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
शिरोभिः पतितैर्भाति रुधिरार्द्रैर्वसुन्धरा |
१९ क
स्त्री पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
शिरोभिः पतितैर्हस्तैः सर्वाङ्गैर्यूथशः कृतैः |
४९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
शिरोभिः पतितैस्तत्र भूमिरासीन्निरन्तरा |
६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५७
अश्व उवाच
शिरोभिः प्रणिपत्योचुः प्रसीद भगवन्निति ||
५१ ख
वन पर्व
अध्याय ९९
लोमश उवाच
शिरोभिः प्रपतद्भिश्च अन्तरिक्षान्महीतलम् |
५ क
वन पर्व
अध्याय २३४
वैशम्पाय़न उवाच
शिरोभिः प्रपतद्भिश्च चरणैर्वाहुभिस्तथा |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
शिरोभिः प्रपतद्भिश्च वाहुभिश्च विभूषितैः |
३९ क
वन पर्व
अध्याय १५६
वैशम्पाय़न उवाच
शिरोभिः प्राप्य राजर्षिं परिवार्योपतस्थिरे ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय २८१
मार्कण्डेय़ उवाच
शिरोभितापसन्तप्तः स्थातुं चिरमशक्नुवन् |
६८ क
कर्ण पर्व
अध्याय २४
व्रह्मो उवाच
शिरोभिरगमंस्तूर्णं ते हय़ा वातरंहसः ||
१०९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
शिरोभिर्युद्धशौण्डानां सर्वतः संस्तृता मही ||
५४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६६
भीष्म उवाच
शिरोभिश्च गता भूमिमूचू रक्षोगणाधिपम् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय ८६
भीष्म उवाच
शिरोरक्षश्च भवति गुणैरेतैः समन्वितः ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय २८१
सत्यवानु उवाच
शिरोरुजा निवृत्ता मे स्वस्थान्यङ्गानि लक्षय़े |
८० क
आदि पर्व
अध्याय १५८
वैशम्पाय़न उवाच
शिरोरुहेषु जग्राह माल्यवत्सु धनञ्जय़ः |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
शिरोरोगादिभी रोगैस्तथैव विनिपातिभिः ||
१५० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
शिरोहारी विमर्षश्च सर्वलक्षणभूषितः ||
११८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७१
सञ्जय़ उवाच
शिरोऽभूद्द्रुपदस्तस्य पाण्डवश्च धनञ्जय़ः |
६ क