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वन पर्व
अध्याय ५५
वृहदश्व उवाच
कृच्छ्रे स नरके मज्जेदगाधे विपुलेऽप्लवे |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
कृच्छ्रेण क्षणदां राजन्निन्युरव्दशतोपमाम् ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय १८१
वैशम्पाय़न उवाच
कृच्छ्रेण जग्मतुस्तत्र भीमसेनधनञ्जय़ौ ||
३५ ख
शल्य पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
कृच्छ्रेण तु ततो राजा धृतराष्ट्रो महीपतिः |
४१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
कृच्छ्रेण महता राजन्रजनी व्यत्यवर्तत ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय १३८
वैशम्पाय़न उवाच
कृच्छ्रेण मातरं त्वेकां सुकुमारीं यशस्विनीम् |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
कृच्छ्रेण रथमूहुस्तं क्षुत्पिपासाश्रमान्विताः ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
कृच्छ्रेणैव च तां पार्थो गोविन्दे विनिवेशिताम् |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७०
भीष्म उवाच
कृच्छ्रोत्सृष्टाः पोषणाभ्यागताश्च; द्वारैरेतैर्गोविशेषाः प्रशस्ताः ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७२
व्रह्मो उवाच
कृच्छ्रोत्सृष्टाः पोषणाभ्यागताश्च; द्वारैरेतैर्गोविशेषाः प्रशस्ताः ||
३९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४३
भीष्म उवाच
कृतं करिष्यत्क्रिय़ते च देवो; मुहुः सोमं विद्धि च शक्रमेतम् ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २३
भीष्म उवाच
कृतं कर्माकृतं चापि रागमोहेन जल्पताम् ||
२२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
कृतं कार्यं च मन्यन्तां मित्रकार्येप्सवो युधि ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
कृतं कार्यं दुष्करं पाण्डवेय़ैः; प्राप्तं राज्यमसपत्नं पुनस्तैः ||
१५७ ख
वन पर्व
अध्याय २९४
वैशम्पाय़न उवाच
कृतं कार्यं पाण्डवानां हि मेने; ततः पश्चाद्दिवमेवोत्पपात ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय १७८
सर्प उवाच
कृतं कार्यं महाराज त्वय़ा मम परन्तप |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२७
कर्ण उवाच
कृतं कृतं स्म तत्तस्य दैवेन विनिहन्यते ||
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
कृतं च भवता सर्वं प्राणान्सन्त्यज्य युध्यता ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६
भीष्म उवाच
कृतं च विकृतं किञ्चित्कृते कर्मणि सिध्यति |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
कृतं च समय़ं भित्त्वा त्वय़ाहमवमानितः ||
७७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
कृतं तत्सकलं तेन भूय़श्चैव करिष्यति ||
३७ ख
विराट पर्व
अध्याय ६४
उत्तर उवाच
कृतं तु कर्म तत्सर्वं देवपुत्रेण केनचित् ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय १७३
अर्जुन उवाच
कृतं तेन पुरा सर्वं वक्तुमर्हसि पृच्छतः ||
२ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
कृतं त्रेता द्वापरं च पुष्यं च कुरुवर्धन ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
कृतं त्रेता द्वापरश्च कलिः सर्वामराश्रय़ः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
भीष्म उवाच
कृतं त्रेता द्वापरश्च कलिश्च भरतर्षभ |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ९२
उतथ्य उवाच
कृतं त्रेता द्वापरश्च कलिश्च भरतर्षभ |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
कृतं त्वय़ा पारलोक्यं च कार्यं; पुण्यं महत्सद्भिरनुप्रशस्तम् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय २७५
व्रह्मो उवाच
कृतं त्वय़ा महत्कार्यं देवानाममरप्रभ ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
कृतं त्वय़ा यद्धि न तस्य कर्ता; लोके त्वदन्यः क्षत्रिय़ो व्राह्मणो वा ||
२० ग
वन पर्व
अध्याय १४८
हनूमानु उवाच
कृतं नाम युगं तात यत्र धर्मः सनातनः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय १९०
द्रुपद उवाच
कृतं निमित्तं हि वरैकहेतो; स्तदेवेदमुपपन्नं वहूनाम् ||
२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
कृतं पापमिदं व्रह्मन्रोषाविष्टेन चेतसा |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
कृतं प्रिय़ं मय़ा तेऽद्य निहत्य समरेऽर्जुनम् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय २८१
यम उवाच
कृतं भर्तुस्त्वय़ानृण्यं यावद्गम्यं गतं त्वय़ा ||
१९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
कृतं भवद्भिः सदृशमनुरूपमिवात्मनः |
२९ ख
मौसल पर्व
अध्याय ९
व्यास उवाच
कृतं भीमसहाय़ेन यमाभ्यां च महाभुज ||
३० ख
सभा पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
कृतं मणिमय़ं भाण्डं रम्यं विन्दुसरः प्रति ||
२ ग
वन पर्व
अध्याय २२५
वैशम्पाय़न उवाच
कृतं मताक्षेण यथा न साधु; साधुप्रवृत्तेन च पाण्डवेन |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
कृतं ममाप्रिय़ं तेन येनाय़ं निहतो मृधे |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७५
भगवानु उवाच
कृतं मानुष्यकं कर्म दैवेनापि विरुध्यते ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
कृतं मय़ा पार्थ यथा न साधु; येन प्राप्तं व्यसनं वः सुघोरम् |
१०२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६३
कुण्डधार उवाच
कृतं मय़ा भवेत्किं ते कश्च तेऽनुग्रहो भवेत् ||
४४ ख
आदि पर्व
अध्याय २२५
वैशम्पाय़न उवाच
कृतं युवाभ्यां कर्मेदममरैरपि दुष्करम् |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
कृतं राज्ञा महावाहो याचता स्म सुय़ोधनम् |
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
व्राह्मण उवाच
कृतं लोकैर्हि मे धर्म गच्छ च त्वं यथासुखम् |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय २०६
उलूप्यु उवाच
कृतं वस्तत्र धर्मार्थमत्र धर्मो न दुष्यति ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८७
युधिष्ठिर उवाच
कृतं वा कारय़ित्वा वा तन्मे व्रूहि पितामह ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
कृतं वीभत्समय़शस्यं च कर्म; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१५३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२२
भीष्म उवाच
कृतं शतसहस्रं हि श्लोकानामिदमुत्तमम् |
३६ क