आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
११
धृतराष्ट्र उवाच
तथामात्या जनपदा दुर्गाणि विषमाणि च |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३११
भीष्म उवाच
तथारूपः शुको जज्ञे प्रज्वलन्निव तेजसा ||
१० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
व्राह्मण उवाच
तथारूपमिवात्मानं साधु युक्तः प्रपश्यति ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
तथारूपस्तथाचारस्तथावृत्तस्तथाश्रुतः |
१९ क
विराट पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
तथारूपा हि सैरन्ध्री गन्धर्वाश्च महावलाः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
तथारूपांश्च तान्दृष्ट्वा पप्रच्छ सरितां वरा |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
तथार्जवं क्षमा सत्यं कुरुष्वेतद्विशिष्यते ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३९
सञ्जय़ उवाच
तथार्जुनं रणे कर्णो विजेष्यति महारथः |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
२२५
वैशम्पाय़न उवाच
तथार्जुनः सुकुमारो मनस्वी; वशे स्थितो धर्मसुतस्य राज्ञः |
१२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
तथार्जुनस्तीव्रदुःखाभितप्तो; मुहुर्मुहुर्निःश्वसन्भारताग्र्यः |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२
कर्ण उवाच
तथार्जुनस्त्रिदशवरात्मजो यतो; न तद्वलं सुजय़मथामरैरपि ||
१६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
तथार्जुनेन निहतो द्वैरथे युद्धदुर्मदः |
५४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
तथार्जुनेन सम्भग्ने तस्मिंस्तव वले तदा |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
तथार्जुनो गजानीकमवधीत्कङ्कपत्रिभिः ||
५३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२
सञ्जय़ उवाच
तथार्तं स्तिमितं दृष्ट्वा गतसत्त्वमिव स्थितम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
तथार्थकामभोगेषु ममापि विगता स्पृहा ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
तथार्दितान्भीमवलान्भीमसेनेन भारत |
२९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
तथार्धचन्द्रेण शिरस्तस्य चिच्छेद पाण्डवः |
१७ क
विराट पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
तथावकीर्णस्य हि तैर्दिव्यैरस्त्रैः समन्ततः |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
८४
यय़ातिरु उवाच
तथावसं नन्दने कामरूपी; संवत्सराणामय़ुतं शतानाम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
वसिष्ठ उवाच
तथावाप्तं व्रह्मणो मे नरेन्द्र; महज्ज्ञानं मोक्षविदां पुराणम् ||
४० ख
विराट पर्व
अध्याय
४५
अश्वत्थामो उवाच
तथावाप्तेषु वित्तेषु को विकत्थेद्विचक्षणः |
८ क
विराट पर्व
अध्याय
८
सुदेष्णो उवाच
तथाविधमहं मन्ये वासं तव शुचिस्मिते ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
भीष्म उवाच
तथाविधस्य सुहृदः क्षन्तव्यं संविजानता |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
धृतराष्ट्र उवाच
तथाविधानामेष लोको महर्षे; परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
धृतराष्ट्र उवाच
तथाविधानामेष लोको महर्षे; परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
धृतराष्ट्र उवाच
तथाविधानामेष लोको महर्षे; परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
धृतराष्ट्र उवाच
तथाविधानामेष लोको महर्षे; परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
धृतराष्ट्र उवाच
तथाविधानामेष लोको महर्षे; परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र ||
३१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
धृतराष्ट्र उवाच
तथाविधानामेष लोको महर्षे; विशुद्धानां भावितवाङ्मतीनाम् |
३४ क
वन पर्व
अध्याय
९५
लोमश उवाच
तथाविधे त्वं शय़ने मामुपैतुमिहार्हसि ||
१७ ख
विराट पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
तथाविधेनैव शरेण पार्थो; दुर्योधनं वक्षसि निर्विभेद ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८५
वैशम्पाय़न उवाच
तथाविधैरेव नरप्रवीरै; रुपोपविष्टैस्त्रिभिरग्निकल्पैः ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
११
डुण्डुभ उवाच
तथावीर्यो भुजङ्गस्त्वं मम कोपाद्भविष्यसि ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
तथावृत्तश्चरेद्धर्मं सतां वर्त्माविदूषय़न् |
५१ क
वन पर्व
अध्याय
२२३
द्रौपद्यु उवाच
तथाशनैश्चारुभिरग्र्यमाल्यै; र्दाक्षिण्ययोगैर्विविधैश्च गन्धैः |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
तथाशन्यश्च सम्पेतुर्ववुर्वाताश्च दारुणाः ||
३४ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
७१
भगवानु उवाच
तथाशीलसमाचारे राजन्मा प्रणय़ं कृथाः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७६
नारद उवाच
तथाशीला हि राजानः सर्वान्विषय़वासिनः |
५६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
तथाशीलाः समातस्थुर्धृतराष्ट्रस्य शासने ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
कृष्ण उवाच
तथाशुकारी व्यसृजच्छरोत्तमा; न्महाविषः सर्प इवोत्तमं विषम् ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
तथाशृण्वन्पाण्डवाः सृञ्जय़ाश्च; किरीटिना वाचमुक्तां समर्थाम् ||
५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
तथाश्मकुट्टैर्वानेय़ैर्मुनिभिर्वहुभिर्वृतम् ||
६१ ख
आदि पर्व
अध्याय
८४
यय़ातिरु उवाच
तथाश्मानस्तृणकाष्ठं च सर्वं; दिष्टक्षय़े स्वां प्रकृतिं भजन्ते ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७०
भीष्म उवाच
तथाश्रौषं महावाहो तिस्रः कन्याः स्वय़ंवरे |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
तथाश्वनरनागानां कृतं च कदनं महत् |
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
तथाश्वांश्चतुरश्चास्य चतुर्भिर्निशितैः शरैः |
८५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
तथाष्टगुणमैश्वर्यमेकस्थं पश्य मूर्तिमत् ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
तथासि भगवन्देव निश्चलो दृढनिश्चय़ः ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
तथासीत्पृथिवी सर्वा शोणितेन परिप्लुता ||
४९ ख