chevron_left  नापःarrow_drop_down
उद्योग पर्व
अध्याय १५
अग्निरु उवाच
नापः प्रवेष्टुं शक्ष्यामि क्षय़ो मेऽत्र भविष्यति |
३१ क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
नापकर्षसि कर्मभ्यः पूर्वमप्राप्य किल्विषम् ||
६३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
नापक्रमसि वा मूढ सत्यमेतद्व्रवीमि ते ||
२५ ख
मौसल पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
नापत्रपन्त पापानि कुर्वन्तो वृष्णय़स्तदा |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९४
वामदेव उवाच
नापत्रपेत प्रश्नेषु नाभिभव्यां गिरं सृजेत् |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय १८
शल्य उवाच
नापदं प्राप्नुय़ात्काञ्चिद्दीर्घमाय़ुश्च विन्दति |
२० ख
वन पर्व
अध्याय २९६
युधिष्ठिर उवाच
नापदामस्ति मर्यादा न निमित्तं न कारणम् |
१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
नापध्याय़ति वा कच्चिदस्मान्पापकृतः सदा ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०८
गुरुरु उवाच
नापध्याय़ेन्न स्पृहय़ेन्नावद्धं चिन्तय़ेदसत् ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७९
वैशम्पाय़न उवाच
नापराधोऽस्ति सुभगे नराणां वहुभार्यता |
१४ क
स्त्री पर्व
अध्याय १३
गान्धार्यु उवाच
नापराध्यति वीभत्सुर्न च पार्थो वृकोदरः |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
नापराध्यामि किञ्चित् |
६ ख
आदि पर्व
अध्याय ९
सूत उवाच
नापराध्यामि ते किञ्चिदहमद्य तपोधन |
२२ क
वन पर्व
अध्याय २०५
व्याध उवाच
नापराध्याम्यहं किञ्चित्केन पापमिदं कृतम् ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१४
भीष्म उवाच
नापरीक्षितचारित्रे विद्या देय़ा कथञ्चन ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७१
भीष्म उवाच
नापरीक्ष्य नय़ेद्दण्डं न च मन्त्रं प्रकाशय़ेत् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११८
भीष्म उवाच
नापरीक्ष्य महीपालः प्रकर्तुं भृत्यमर्हति |
४ क
वन पर्व
अध्याय १६८
अर्जुन उवाच
नापश्यं सहसा सर्वान्दानवान्माय़यावृतान् ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
भीष्म उवाच
नापश्यंश्चापि ते तानि विसानि पुरुषर्षभ ||
५२ ख
वन पर्व
अध्याय १८२
वैशम्पाय़न उवाच
नापश्यंस्तमृषिं तत्र गतासुं ते समागताः |
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
नापश्यच्छरणं किञ्चिद्धर्मराजो युधिष्ठिरः |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
नापश्यत ततोऽस्याङ्गं यन्न स्याद्वर्मरक्षितम् ||
२६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
नापश्यत तदा किञ्चिदप्रिय़ं पाण्डुनन्दने ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय ८
सूत उवाच
नापश्यत प्रसुप्तं वै भुजगं तिर्यगाय़तम् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय २९६
वैशम्पाय़न उवाच
नापश्यत्तत्र किञ्चित्स भूतं तस्मिन्महावने |
२४ क
शल्य पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
नापश्यत्समरे कञ्चित्सहाय़ं रथिनां वरः ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय २२१
वैशम्पाय़न उवाच
नापश्यत्स्वधिय़ा मोक्षं स्वसुतानां तदानलात् |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
नापश्यदन्तरं द्रोणस्तदद्भुतमिवाभवत् ||
१४० ख
आदि पर्व
अध्याय ६५
वैशम्पाय़न उवाच
नापश्यदाश्रमे तस्मिंस्तमृषिं संशितव्रतम् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय २८९
वैशम्पाय़न उवाच
नापश्यद्दुष्कृतं किञ्चित्पृथाय़ाः सौहृदे रतः ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
नापश्यन्गच्छमानं हि तं सार्धमृषिपुङ्गवैः |
४५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३८
सञ्जय़ उवाच
नापश्यन्त रणे योधाः परस्परमवस्थिताः ||
१ ग
विराट पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
नापश्यन्नावृतां भूमिमन्तरिक्षं च पत्रिभिः ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
नापश्याम ततस्त्वेतत्सैन्यं वै तमसावृतम् |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२९
सञ्जय़ उवाच
नापश्याम रजो भौमं कश्मलेनाभिसंवृताः ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४७
भीष्म उवाच
नापहारं स्त्रिय़ः कुर्युः पतिवित्तात्कथञ्चन ||
२४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
नापि तान्सुहृदः सर्वान्किमिदं भरतर्षभ ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय २२२
वैशम्पाय़न उवाच
नापि परिवदे चाहं तां पृथां पृथिवीसमाम् ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय २२२
वैशम्पाय़न उवाच
नापि परिवदे श्वश्रूं सर्वदा परिय़न्त्रिता ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
नापि यज्ञहनैः क्षुद्रैर्द्रष्टुं शक्यः कथञ्चन |
६ क
आदि पर्व
अध्याय १६६
गन्धर्व उवाच
नापि राजा मुनेर्मानात्क्रोधाच्चापि जगाम ह ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
नापि वैरं न सौहार्दं मद्रकेषु समाचरेत् ||
७९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
नापि शक्यो रणे जेतुं भीष्मः पार्थेन धीमता |
६५ क
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
नापि सूतकुले जातं कर्णं मन्ये कथञ्चन |
१५९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
नापि स्वे न परे योधाः प्राज्ञाय़न्त परस्परम् |
४१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
नापितश्च ततो भूत्वा पुनर्भवति व्राह्मणः |
५४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
नापिधाय़ाश्रमं शक्यो रक्षितुं पाकशासनः |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
नापुराणविदा चापि शक्यो व्याहर्तुमञ्जसा ||
१४ ग
आदि पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
नापुष्पः पादपः कश्चिन्नाफलो नापि कण्टकी |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११७
युधिष्ठिर उवाच
नापूपान्विविधाकाराञ्शाकानि विविधानि च |
२ क