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अनुशासन पर्व
अध्याय ३
युधिष्ठिर उवाच
नाभिवादय़ते ज्येष्ठं देवरातं नराधिप |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
नाभिषज्जति कस्मिंश्चिन्नानर्थे न परिग्रहे |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३२
व्यास उवाच
नाभिष्वजेत्परं वाचा कर्मणा मनसापि वा |
२७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११३
सञ्जय़ उवाच
नाभिसन्धत्त पाञ्चाल्यं स्मय़मानो मुहुर्मुहुः |
४६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
व्राह्मण उवाच
नाभिसन्धिर्मय़ा जप्ये कृतपूर्वः कथञ्चन |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९६
मनुरु उवाच
नाभिसर्पद्विमुञ्चद्वा शशिनं दृश्यते तमः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
नाभीतः पुरुषः कश्चित्समय़े स्थातुमिच्छति ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
नाभीतो यजते राजन्नाभीतो दातुमिच्छति |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३४
भीष्म उवाच
नाभुक्तवति चाश्नीय़ादपीतवति नो पिवेत् |
२१ क
वन पर्व
अध्याय २२२
वैशम्पाय़न उवाच
नाभुक्तवति नास्नाते नासंविष्टे च भर्तरि |
२३ क
सभा पर्व
अध्याय ४८
दुर्योधन उवाच
नाभुक्तवन्तं नाहृष्टं नासुभिक्षं कथञ्चन |
३८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
नाभुङ्क्त पतिशोकार्ता तदभूत्करुणं महत् |
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २९
वासुदेव उवाच
नाभुञ्जानो भक्ष्यभोज्यस्य तृप्ये; द्विद्वानपीह विदितं व्राह्मणानाम् ||
५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २६
वैशम्पाय़न उवाच
नाभूतिकाले च फलं ददाति; शिल्पं न मन्त्राश्च तथौषधानि |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
नाभूत्समागमो राजन्मम चैवार्जुनस्य च ||
३१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३१
युधिष्ठिर उवाच
नाभूदिय़ं तव प्रज्ञा कथमेवं सुय़ोधन |
५१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
नाभूमिपतिना भूमिरधिष्ठेय़ा कथञ्चन |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय ३१
वैशम्पाय़न उवाच
नाभ्यजानंस्तदान्योन्यं प्रदोषे रजसावृते ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७१
सञ्जय़ उवाच
नाभ्यजानत कर्तव्यं युधि किञ्चित्पराक्रमम् ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५९
सञ्जय़ उवाच
नाभ्यजानन्त समरे निद्रय़ा मोहिता भृशम् ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय ७८
वैशम्पाय़न उवाच
नाभ्यनन्दत तान्राजा देवय़ान्यास्तदान्तिके |
१६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७८
वैशम्पाय़न उवाच
नाभ्यनन्दत मेधावी क्षत्रधर्ममनुस्मरन् ||
२ ख
सभा पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
नाभ्यनन्दद्वचो भ्रातुर्वचनं चेदमव्रवीत् ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११८
सञ्जय़ उवाच
नाभ्यनन्दन्त तत्सैन्याः सात्यकिं तेन कर्मणा |
३७ क
आदि पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
नाभ्यनन्दन्त तान्राजा नानुरूपा ममेत्युत ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
नाभ्यपद्यत कर्तव्यं किञ्चिदेव विशां पते ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५९
सञ्जय़ उवाच
नाभ्यपद्यन्त समरे काञ्चिच्चेष्टां महारथाः ||
१२ ख
सभा पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
नाभ्यभाषत्सुवलजं भाषमाणं पुनः पुनः ||
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
नाभ्यमन्यत कर्तव्यं पुत्रेणाभ्याहतस्तव ||
४८ ख
वन पर्व
अध्याय १३०
लोमश उवाच
नाभ्यवर्तत यद्द्वारं विदेहानुत्तरं च यः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८२
सञ्जय़ उवाच
नाभ्यवर्तत युद्धाय़ त्रासितं दीर्घवाहुना ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
नाभ्यवर्तत सङ्क्रुद्धो वेलामिव जलाशय़ः ||
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
नाभ्यवर्तन्त ते पुत्रं वेलेव मकरालय़म् ||
५३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
नाभ्यवर्तन्त नास्तिक्याद्वर्तन्तः सम्भवेष्वपि ||
६८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
नाभ्यवर्तन्त संरव्धाः कार्ष्णेर्वाहुवलाश्रय़ात् ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३
सात्यकिरु उवाच
नाभ्यसूय़ामि ते वाक्यं व्रुवतो लाङ्गलध्वज |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
नाभ्यसूय़ामि ते वाक्यमुक्तं स्निग्धं हितं त्वय़ा |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६९
द्रोण उवाच
नाभ्यसूय़ामि ते वाचमश्वत्थाम्नासि मे समः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
नाभ्यां कण्ठे च शीर्षे च हृदि वक्षसि पार्श्वय़ोः |
३९ क
वन पर्व
अध्याय १९४
मार्कण्डेय़ उवाच
नाभ्यां विनिःसृतं तत्र यत्रोत्पन्नः पितामहः |
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
नाभ्यां वैश्याः पादतश्चापि शूद्राः; सर्वे वर्णा नान्यथा वेदितव्याः ||
८७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८३
सञ्जय़ उवाच
नाभ्यामभून्नरश्रेष्ठः श्वेताश्वो वानरध्वजः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
नाभ्युत्थानाभिवादाभ्यां यथापूर्वमपूजय़न् ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
नारद उवाच
नाभ्युत्थाने मनुष्याणां योगाः स्युर्नात्र संशय़ः |
२९ क
शल्य पर्व
अध्याय ३०
दुर्योधन उवाच
नाभ्युत्सहाम्यहं भोक्तुं विधवामिव योषितम् ||
४२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २४
गान्धार्यु उवाच
नाभ्यूरुजघनस्पर्शी नीवीविस्रंसनः करः ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय १००
वैशम्पाय़न उवाच
नाम चास्य तदेवेह भविष्यति शुभानने |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
नाम चास्याः स कृतवान्भारद्वाजो महामुनिः ||
५९ ख
आदि पर्व
अध्याय ४४
सूत उवाच
नाम चास्याभवत्ख्यातं लोकेष्वास्तीक इत्युत ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय ६
सूत उवाच
नाम तस्यास्तदा नद्याश्चक्रे लोकपितामहः |
७ ख