आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७४
वैशम्पाय़न उवाच
तदाङ्कुशेन विवभावुत्पतिष्यन्निवाम्वरम् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
१३१
राजो उवाच
तदाचक्ष्व करिष्यामि न हि दास्ये कपोतकम् ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९१
भीष्म उवाच
तदाचक्ष्व महाभागे विधास्ये तत्र यद्धितम् ||
१९ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
तदाचचक्षे पुरुषः सभाय़ां राजसंसदि |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
१८५
वैशम्पाय़न उवाच
तदाचड्ढ्वं ज्ञातिकुलानुपूर्वीं; पदं शिरःसु द्विषतां कुरुध्वम् |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
तदाचार्यवचः श्रुत्वा कर्णो वैकर्तनस्त्वरन् |
३१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
तदाचार्यवचः श्रुत्वा सोमदत्तपुरोगमाः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
तदाज्ञापय़ कर्ताहं सन्धिरेवास्तु नौ सखे ||
७७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
तदाज्ञापय़ विप्रर्षे व्रूहि किं करवाणि ते ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
तदाज्ञापय़तु भवती |
९९ घ
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
तदाज्ञाय़ हृषीकेशो विसृष्टं पापकर्मणा |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७६
सञ्जय़ उवाच
तदाज्ञय़ा तानि विनिर्ययुर्द्रुतं; रथाश्वपादातगजाय़ुतानि ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
२७४
मातलिरु उवाच
तदातिष्ठ रथं शीघ्रमिममैन्द्रं महाद्युते ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
तदात्मकं हि पुरुषं जाय़मानं विशां पते |
७१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२५
व्यास उवाच
तदात्मगुणमाविश्य मनो ग्रसति चन्द्रमाः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६८
व्राह्मण उवाच
तदात्मज्योतिरात्मा च आत्मन्येव प्रसीदति ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१
देवस्थान उवाच
तदात्मज्योतिरात्मैव स्वात्मनैव प्रसीदति ||
३ ख
सभा पर्व
अध्याय
५५
विदुर उवाच
तदात्वकामः पाण्डूंस्त्वं मा द्रुहो भरतर्षभ |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
तदात्वेनाय़तीभिश्च विवदन्भूम्यनन्तरम् |
३८ क
वन पर्व
अध्याय
२९५
वैशम्पाय़न उवाच
तदादाय़ गतो राजंस्त्वरमाणो महामृगः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
१९६
कर्ण उवाच
तदादाय़ च लुव्धस्य लाभाल्लोभो व्यवर्धत |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
तदादाय़ धनुः श्रेष्ठं वरिष्ठः सर्वधन्विनाम् |
७४ क
शल्य पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
तदादाय़ धनुःश्रेष्ठं वरिष्ठः सर्वधन्विनाम् |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
१०५
वैशम्पाय़न उवाच
तदादाय़ यय़ौ पाण्डुः पुनर्मुदितवाहनः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
६७
वृहदश्व उवाच
तदादाय़ वचः क्षिप्रं ममावेद्यं द्विजोत्तमाः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२८
श्रीभगवानु उवाच
तदादेशितपन्थानौ सृष्टिसंहारकारकौ |
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२४
सूत उवाच
तदाननं विवृतमतिप्रमाणव; त्समभ्ययुर्गगनमिवार्दिताः खगाः |
१३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२३
कुन्त्यु उवाच
तदानीं विदुरावाक्यैरिति तद्वित्त पुत्रकाः ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
तदानुतेपे सुरराजपुत्रो; विनिःश्वसंश्चाप्यसिमुद्ववर्ह ||
८८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
तदान्वमोदन्त जनार्दनं च; प्रभाकरावभ्युदितौ यथैव ||
६० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
तदानय़स्व कौन्तेय़ पर्याप्तं तद्भविष्यति ||
२० ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
तदानय़ाम भद्रं ते समभ्यर्च्य कपर्दिनम् ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
तदानय़ामहे सर्वे कथं वा भीम मन्यसे ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५५
गौतम उवाच
तदानय़ेय़ं तपसा न हि मेऽत्रास्ति संशय़ः ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
तदापतद्वै सहसा शल्यस्य सुमहद्वलम् |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
१७
वासुदेव उवाच
तदापतन्तं सन्दृश्य वलं शाल्वपतेस्तदा |
८ क
वन पर्व
अध्याय
२१३
मार्कण्डेय़ उवाच
तदापतन्तं सम्प्रेक्ष्य शैलशृङ्गं शतक्रतुः |
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
वासुदेव उवाच
तदापि हि रथस्थस्त्वं श्रुतवानेतदेव हि ||
५० ख
वन पर्व
अध्याय
१९५
मार्कण्डेय़ उवाच
तदापीय़त तत्तेजो राजा वारिमय़ं नृप |
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८६
दूत उवाच
तदाप्नुवध्वं कृतसर्वकार्याः; कृष्णा च तत्रैव चिरं न कार्यम् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
तदाप्नुवन्ति मानवास्तथा विशुद्धय़ोनय़ः ||
५९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
तदाप्रभृति चैवाय़मीश्वरस्य महात्मनः |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३
युधिष्ठिर उवाच
तदाप्रभृति पुण्या हि विपाशाभून्महानदी |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२२
भीष्म उवाच
तदाप्रभृति राजेन्द्र ऋषिभिः संशितव्रतैः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७
युधिष्ठिर उवाच
तदाप्रभृति वीभत्सुं न शक्नोमि निरीक्षितुम् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२९
श्रीभगवानु उवाच
तदाप्रभृत्यापो यादोभिः सङ्कीर्णाः संवृत्ताः ||
१६ क
वन पर्व
अध्याय
९५
लोमश उवाच
तदाभिगम्य प्रोवाच वैदर्भं पृथिवीपतिम् ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
७१
वैशम्पाय़न उवाच
तदाभिपूजितो देवैः समीपं वृषपर्वणः ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
तदाभ्यधावन्मामेव प्रजाः क्षुद्भय़पीडिताः ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय
४२
सूत उवाच
तदारण्यं स गत्वोच्चैश्चुक्रोश भृशदुःखितः ||
१० ख