अनुशासन पर्व
अध्याय
११
भीष्म उवाच
नाराय़णे त्वेकमना वसामि; सर्वेण भावेन शरीरभूता |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
१९५
मार्कण्डेय़ उवाच
नाराय़णेन कौरव्य तेजसाप्याय़ितस्तदा |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
१६
सूत उवाच
नाराय़णेन चाप्युक्तस्तस्मिन्कर्मणि वीर्यवान् ||
६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
नाराय़णेन दृष्टश्च प्रतिवुद्धो भवेत्पुमान् |
७० क
उद्योग पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
नाराय़णो नरश्चैव सत्त्वमेकं द्विधाकृतम् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
नाराय़णो महद्भूतं विश्वसृग्घव्यकव्यभुक् ||
५३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
वैशम्पाय़न उवाच
नाराय़णो महाय़ोगी शुभाशुभविवर्जितः ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
नाराय़णो रणे नाथो दिव्यो दिव्यात्मवान्प्रभुः ||
७२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२१
भीष्म उवाच
नाराय़णो हि विश्वात्मा चतुर्मूर्तिः सनातनः |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८
भीष्म उवाच
नारी तु पत्यभावे वै देवरं कुरुते पतिम् |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
११२
वैशम्पाय़न उवाच
नारी परमधर्मज्ञ सर्वा पुत्रविनाकृता |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६२
भीष्म उवाच
नारीं चापि वय़ोपेतां भर्त्रा विरहितां तदा ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
नारीं विदितविज्ञानः परेषां धर्ममादिशन् |
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
नारीणां चरितज्ञश्च देवशर्मा महामुनिः |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
नारीणां चिरवासो हि वान्धवेषु न रोचते |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७९
वैशम्पाय़न उवाच
नारीणां तु भवत्येतन्मा ते भूद्वुद्धिरीदृशी ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३८
पञ्चचूडो उवाच
नारीणां स्वैरवृत्तानां स्पृहय़न्ति कुलस्त्रिय़ः ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०९
व्राह्मण उवाच
नारीतीर्थानि नाम्नेह ख्यातिं यास्यन्ति सर्वशः |
११ ख
सभा पर्व
अध्याय
५९
विदुर उवाच
नारुन्तुदः स्यान्न नृशंसवादी; न हीनतः परमभ्याददीत |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
८२
यय़ातिरु उवाच
नारुन्तुदः स्यान्न नृशंसवादी; न हीनतः परमभ्याददीत |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८८
हंस उवाच
नारुन्तुदः स्यान्न नृशंसवादी; न हीनतः परमभ्याददीत |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
नारुन्तुदः स्यान्न नृशंसवादी; न हीनतः परमभ्याददीत |
५६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
नारुन्तुदानां क्षमिणां या गतिस्तामवाप्नुहि ||
२९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
नार्जुनं जहतुर्युद्धे पाल्यमानौ किरीटिना ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
दुर्योधन उवाच
नार्जुनः समरे शक्यो जेतुं परपुरञ्जय़ः ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
नार्जुनस्य वशं प्राप्तो मुच्येताजौ जय़द्रथः ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
नार्जुनोऽहं घृणी द्रोण भीमसेनोऽस्मि ते रिपुः ||
८४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
युधिष्ठिर उवाच
नार्थन्यूनैरवगुणैरेकात्मभिरसंहतैः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
नार्थन्यूनोपकरणैरेकात्मभिरसंहतैः ||
३६ ख
विराट पर्व
अध्याय
४४
कृप उवाच
नार्थानां प्रकृतिं वेत्थ नानुवन्धमवेक्षसे ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२३
वासुदेव उवाच
नार्थे न धर्मे कामे वा भूतपूर्वोऽस्य विग्रहः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१७
नारद उवाच
नार्थो न धर्मो न यशो योऽतीतमनुशोचति |
७ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२
विदुर उवाच
नार्थो न धर्मो न सुखं यदेतदनुशोचसि |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
२
युधिष्ठिर उवाच
नार्थोपभोगलिप्सार्थमिय़मर्थेप्सुता मम |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
नार्द्रपाणिः समुत्तिष्ठेन्नार्द्रपादः स्वपेन्निशि |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
नार्द्रेण त्वा न शुष्केण न रात्रौ नापि वाहनि |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
नीलकण्ठ उवाच
नार्द्रेण न च शुष्केण त्रसेन स्थावरेण वा ||
७७ ख
वन पर्व
अध्याय
१९६
वैशम्पाय़न उवाच
नार्यः कालेन सम्भूय़ किमद्भुततरं ततः ||
९ ग
सभा पर्व
अध्याय
५३
युधिष्ठिर उवाच
नार्या म्लेच्छन्ति भाषाभिर्माय़या न चरन्त्युत |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
नार्यो वृहत्यो निर्ह्रीका मद्रकाः कम्वलावृताः |
८९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९७
भीष्म उवाच
नार्वाक्संवत्सरात्कन्या स्प्रष्टव्या विक्रमाहृता |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४३
सनत्सुजात उवाच
नार्वाचीनं कुतस्तिर्यङ्नादिशं तु कथञ्चन ||
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
नार्हतस्तावपि श्राद्धं व्रह्मविक्रय़िणौ हि तौ ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
२
व्राह्मणा ऊचुः
नार्हथास्मान्परित्यक्तुं भक्तान्सद्धर्मदर्शिनः ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२९
समुद्र उवाच
नार्हन्तीह भवन्तो मां निवारय़ितुमित्युत ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५
भीष्म उवाच
नार्हसि त्वं सहस्राक्ष त्याजय़ित्वेह भक्तितः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२९
श्रीभगवानु उवाच
नार्हसि परपत्नीधर्षणं कर्तुमिति ||
३१ क
वन पर्व
अध्याय
१९०
वैशम्पाय़न उवाच
नार्हसि मण्डूकानामनपराधिनां वधं कर्तुमिति ||
३३ क
वन पर्व
अध्याय
१९०
वैशम्पाय़न उवाच
नार्हसि विद्वन्मामुपरोद्धुमिति ||
३६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२९
पितर ऊचुः
नार्हसे क्षत्रवन्धूंस्त्वं निहन्तुं जय़तां वर |
२२ क