शल्य पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
सोमस्याभिषवं कृत्वा चकार तुमुलं ध्वनिम् ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
सोमस्येन्द्रस्य विष्णोर्वा यमस्य वरुणस्य वा |
१२ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२२
गान्धार्यु उवाच
सोमस्येवाभिपूर्णस्य पौर्णमास्यां समुद्यतः ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४७
वासुदेव उवाच
सोमाद्वभूव षष्ठो वै यय़ातिर्नहुषात्मजः ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६९
वसिष्ठ उवाच
सोमान्ते तर्पय़ामास विपुलेन विशां पतिः ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११६
नारद उवाच
सोमार्कप्रतिसङ्काशौ जनय़ित्वा सुतौ नृप ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
१२५
लोमश उवाच
सोमार्हावश्विनावेतावद्य प्रभृति भार्गव |
३ क
वन पर्व
अध्याय
१२५
लोमश उवाच
सोमार्हावश्विनावेतौ यथैवाद्य कृतौ त्वय़ा |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१००
पृथिव्यु उवाच
सोमाय़ चाप्युदीच्यां वै वास्तुमध्ये द्विजातय़े ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९२
अग्निरु उवाच
सोमाय़ेति च वक्तव्यं तथा पितृमतेति च ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
सोमे प्रय़त्नं कुर्वन्ति त्रय़ो वर्णा यथाविधि |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३९
वाय़ुरु उवाच
सोमेन दत्ता भार्या मे त्वय़ा चापहृताद्य वै ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१६
वैशम्पाय़न उवाच
सोमेन राज्ञा यद्दत्तं धनुश्चैवेषुधी च ते |
३ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
सोमेन सहितं पश्य सौभद्रमपराजितम् |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
सोमेन सहितः सूर्यो यथा मेघस्थितस्तथा ||
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
सोमेन सहिता भूत्वा दक्षस्य प्रमुखेऽभवन् ||
७१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
सोमेन सार्धं च तव हानिवृद्धी भविष्यतः |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
सोमो यष्टा यच्च हव्यं हविश्च; रक्षा दीक्षा निय़मा ये च केचित् ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८०
भीष्म उवाच
सोमो राजा व्राह्मणानामित्येषा वैदिकी श्रुतिः |
१३ क
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
सोमो वसति नास्मासु तस्मान्नः शरणं भव ||
५३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
सोमो वसति नास्मासु नाकरोद्वचनं तव ||
५० ग
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
सोमो वसति नास्मासु रोहिणीं भजते सदा ||
४५ ख
वन पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
सोमो वृहस्पतिः शुक्रो वुधोऽङ्गारक एव च ||
१९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
सोमोऽप्यनुचरौ प्रादान्मणिं सुमणिमेव च ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
सोमय़ज्ञाभ्यनुज्ञानं पञ्चमी यज्ञदक्षिणा ||
४९ ख
वन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
सोष्ट्रिका भरतश्रेष्ठ सभेरीपणवानका |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३८
सञ्जय़ उवाच
सोष्णीषं सशिरस्त्राणं क्षुरप्रेणान्वपातय़त् ||
२८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
सोऽकल्प्यमाने भागे तु कृत्तिवासा मखेऽमरैः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
१६३
गन्धर्व उवाच
सोऽकामय़त राजर्षिर्विहर्तुं सह भार्यया ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽगच्छत्पर्वतं पुण्यमेकाह्नैव महामनाः |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय
१६७
गन्धर्व उवाच
सोऽगच्छत्पर्वतांश्चैव सरितश्च सरांसि च ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
भीष्म उवाच
सोऽगच्छदाश्रममृषिः शूद्रं द्रष्टुं नरर्षभ ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११३
नारद उवाच
सोऽगच्छन्मनसेक्ष्वाकुं हर्यश्वं राजसत्तमम् |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
१७३
गन्धर्व उवाच
सोऽग्निः समभवद्दीप्तस्तं च देशं व्यदीपय़त् ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽग्निर्ददाह तं शैलं सद्रुमं सलताक्षुपम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७६
भृगुरु उवाच
सोऽग्निर्मारुतसंय़ोगाद्घनत्वमुपपद्यते ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२११
मार्कण्डेय़ उवाच
सोऽग्निर्विश्वपतिर्नाम द्वितीय़ो वै मनोः सुतः |
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
२०९
मार्कण्डेय़ उवाच
सोऽग्निर्वृहस्पतेः पुत्रः शंय़ुर्नाम महाप्रभः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१६
भीष्म उवाच
सोऽग्निस्तपति भूतानि पृथिवी च भवत्युत |
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽग्निहोत्रप्रसक्तस्य कस्यचिद्व्रह्मवादिनः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२००
भीष्म उवाच
सोऽग्रजं सर्वभूतानां सङ्कर्षणमचिन्तय़त् ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
सोऽग्रानीकस्य महत इषुपाते धनञ्जय़ः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽङ्कमादाय़ विदुरं मूर्ध्न्युपाघ्राय़ चैव ह |
२० क
वन पर्व
अध्याय
२७२
मार्कण्डेय़ उवाच
सोऽङ्गदेन रुषोत्सृष्टो वधाय़ेन्द्रजितस्तरुः |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
सोऽचरत्सहसा खड्गी मण्डलानि सहस्रशः |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
सोऽचरद्विविधान्मार्गान्प्रकारानेकविंशतिम् |
१४७ क
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽचिन्तय़द्गते स्वर्गमर्जुने मय़ि चागते |
३५ क
शल्य पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽचिन्तय़न्महाभागो जैगीषव्यस्य देवलः |
४३ क
वन पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽचिरेण समासाद्य तद्वनं यत्र पाण्डवाः |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽचिरेणैव कालेन अत्यक्रामन्नराधिप |
४२ क