भीष्म पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
निघ्नन्भीमः शरैस्तीक्ष्णैरनुवव्राज पृष्ठतः ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
निघ्नन्रथवराश्वौघांश्छादय़ामास वाहिनीम् ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
निघ्नन्संशप्तकान्पार्थः प्रेक्षणीय़तरोऽभवत् ||
९५ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
निचकर्त महावेगैर्भल्लैः संनतपर्वभिः ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
निचकर्त शरैरुग्रै रौद्रं विभ्रद्वपुस्तदा ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४६
सञ्जय़ उवाच
निचकर्त शिरांस्युग्रैः शरैः संनतपर्वभिः ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
निचकर्त शिरांस्युग्रौ वाहूनपि सुभूषणान् ||
३३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
निचकर्त शिरांस्येषां वाहूनूरूंश्च सर्वशः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
निचकर्त स सञ्छिन्नः पपाताद्रिचय़ो यथा ||
२९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
निचखान नदन्वीरो वर्म भित्त्वा च सोऽभ्यगात् ||
५२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३२
सञ्जय़ उवाच
निचखान महावाहुः पुरन्दर इवाशनिम् ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
निचखान महावीर्यः साय़कानेकविंशतिम् ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
निचखानोरसि तदा सूतपुत्रस्य वेगितः ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
निचन्द्रश्च निकुम्भश्च कुपथः कापथस्तथा ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
निचन्द्रश्चन्द्रवक्त्रश्च य आसीदसुरोत्तमः |
२६ क
सभा पर्व
अध्याय
४८
दुर्योधन उवाच
निचितं पर्वतेभ्यश्च हिरण्यं भूरिवर्चसम् |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
निचीरां महितां चापि सुप्रय़ोगां नराधिप |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
५८
भीष्म उवाच
निचय़श्च निचेय़ानां सेवा वुद्धिमतामपि ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८७
भीष्म उवाच
निचय़ान्वर्धय़ेत्सर्वांस्तथा यन्त्रगदागदान् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९७
भीष्म उवाच
निजगाद ततस्तस्मै श्रेय़स्करमिदं वचः ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०८
वैशम्पाय़न उवाच
निजग्राह जले ग्राहः कुन्तीपुत्रं धनञ्जय़म् ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४१
भीष्म उवाच
निजग्राह महातेजा योगेन वलवत्प्रभो |
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
निजग्राह महावाहुर्वाहुभ्यां परिगृह्य वै ||
६२ ख
सभा पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
निजग्राह महावाहुस्तरसा पोतनेश्वरम् ||
३८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
निजघान गदाग्रेण ततो युद्धमवर्तत ||
६८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
निजघान च सङ्क्रुद्धो दण्डपाणिरिवान्तकः ||
५७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
निजघान च सङ्क्रुद्धो राक्षसान्भीमदर्शनान् |
३७ क
शल्य पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
निजघान ततो राजंश्चेदीन्वै पञ्चविंशतिम् ||
५३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
निजघान पदा कांश्चिदाक्षिप्यान्यानपोथय़त् |
५८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
निजघान महेष्वासः सङ्क्रुद्धः शरवृष्टिभिः ||
३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
निजघान शरैः क्षिप्रं सूतं च सुमहावलः ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
निजघान शरैर्द्रोणः क्रुद्धः सत्यपराक्रमः ||
१३४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
निजघान सुसङ्क्रुद्धश्चेदीनां च महारथान् ||
५१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
निजघ्नुः समरे शूराः क्षीणशस्त्रास्ततोऽपतन् ||
८५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
निजघ्नुषे देवरिपून्सुरेश्वरः; स्वय़ं ददौ यत्सुमनाः किरीटिने ||
१४ ख
सभा पर्व
अध्याय
३८
शिशुपाल उवाच
निजघ्नुस्तं तदा हंसं मिथ्यावृत्तं कुरूद्वह ||
३७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६९
वसिष्ठ उवाच
निजघ्नुस्ते महेष्वासाः सर्वांस्तान्निशितैः शरैः |
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
निजघ्ने कौरवेन्द्रस्य हय़ान्काञ्चनभूषणान् ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
निजघ्ने तत्र शैनेय़ः शतशोऽथ सहस्रशः ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
निजघ्ने तावकं सैन्यं मोहय़ित्वा पितामहम् ||
१३८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
निजघ्ने समरे क्रुद्धो हस्त्यश्वममितं वहु |
३१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
निजघ्राह हृषीकेशं कथञ्चिद्दशमे पदे ||
६४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
निजानुत्पततः शत्रून्पञ्च पञ्चप्रय़ोजनान् |
६८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
निडीनमथ सण्डीनं तिर्यक्चातिगतानि च ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
नितम्भूर्भुवनो धौम्यः शतानन्दोऽकृतव्रणः |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
नित्य आत्मसहाय़श्च देवासुरपतिः पतिः ||
११६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
नित्यं कालपरीतस्य मम वा मद्विधस्य वा |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
युधिष्ठिर उवाच
नित्यं कैश्च गुणैर्युक्तः सङ्गपाशाद्विमुच्यते ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
नित्यं क्रोधात्तपो रक्षेच्छ्रिय़ं रक्षेत मत्सरात् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८२
भृगुरु उवाच
नित्यं क्रोधात्तपो रक्षेच्छ्रिय़ं रक्षेत मत्सरात् |
१० क