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विराट पर्व
अध्याय ६६
वैशम्पाय़न उवाच
तदार्जुनस्य वैराटिः कथय़ामास विक्रमम् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय १०४
लोमश उवाच
तदालावुं समुत्स्रष्टुं मनश्चक्रे स पार्थिवः |
१९ क
शल्य पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
तदावपत्पर्णपुटे तत्र सा सम्भवच्छुभा ||
५८ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
तदावसन्ति ये राजन्न ते शोच्याः कथञ्चन ||
१७७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
तदावसेत्सदा प्राज्ञो भवार्थी मनुजेश्वर ||
१११ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
तदावां सहितौ भूत्वा गाः प्रकाल्य व्रजावहे |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
तदाविशति यो व्रह्मन्नदृश्यो लघुविक्रमः |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय २२१
जरितो उवाच
तदाविशध्वं त्वरिता वह्नेरत्र न वो भय़म् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२४
भीष्म उवाच
तदाविशन्ति भूतानि महान्ति सह कर्मणा ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३
नारद उवाच
तदावुध्यत तेजस्वी सन्तप्तश्चेदमव्रवीत् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५०
नारद उवाच
तदाव्रवीद्देवदेवो निगृह्येदं वचस्ततः ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७६
अर्जुन उवाच
तदाशु कुरु वार्ष्णेय़ यन्नः कार्यमनन्तरम् ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
तदाशुप्रतिकाराच्च सततं चाविचिन्तनात् |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
तदाश्चर्यमपश्याम श्रद्धेय़मपि चाद्भुतम् |
६ क
वन पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
तदाश्रमपदं पुण्यं वदरी नाम विश्रुतम् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय १७८
सर्प उवाच
तदाश्रिता हि सञ्ज्ञैषा विधिस्तस्यैषणे भवेत् ||
२५ ख
सभा पर्व
अध्याय ५७
दुर्योधन उवाच
तदाश्रितापत्रपा किं न वाधते; यदिच्छसि त्वं तदिहाद्य भाषसे ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७५
वैशम्पाय़न उवाच
तदाश्वमेधो भविता धर्मराजस्य धीमतः ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५०
भीष्म उवाच
तदाश्वसीत धर्मात्मादृढवुद्धिर्न विश्वसेत् ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
तदासीत्तुमुलं युद्धं निघ्नतामितरेतरम् |
१६ क
शल्य पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
तदासीत्तुमुलं युद्धं पुनरेव जय़ैषिणाम् |
३७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
तदासीत्तुमुलं युद्धं भगदत्तस्य मारिष |
८० क
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
तदासीत्तुमुलं युद्धं सर्वदोषविवर्जितम् |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय १११
सञ्जय़ उवाच
तदासीत्सुमहद्युद्धं कुरूणां पाण्डवैः सह |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०९
भीष्म उवाच
तदासीन्मे शतगुणं सहस्रगुणमेव च |
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय १७०
गन्धर्व उवाच
तदास्माभिर्वधस्तात क्षत्रिय़ैरीप्सितः स्वय़म् ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय १७०
गन्धर्व उवाच
तदास्माभिरय़ं दृष्ट उपाय़स्तात संमतः ||
१८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
व्राह्मण उवाच
तदास्य नेशते कश्चित्त्रैलोक्यस्यापि यः प्रभुः ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय २२२
जरितो उवाच
तदाहं तमनुज्ञाप्य प्रत्युपाय़ां गृहान्प्रति ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५३
वासुदेव उवाच
तदाहं देववत्सर्वमाचरामि न संशय़ः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय १५०
वैशम्पाय़न उवाच
तदाहं वृंहय़िष्यामि स्वरवेण रवं तव ||
१४ ग
वन पर्व
अध्याय १८७
देव उवाच
तदाहं सम्प्रसूय़ामि गृहेषु शुभकर्मणाम् |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३४६
व्राह्मण उवाच
तदाहारं करिष्यामि तन्निमित्तमिदं व्रतम् ||
११ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
तदाहारा नृवीरास्ते न्यवसंस्तां निशां तदा ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८२
पराशर उवाच
तदाहुरधमं दानं मुनय़ः सत्यवादिनः ||
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
तदाहृत्य तु तां चक्रे सोऽसुरोऽप्रतिमां सभाम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६७
भीष्म उवाच
तदाय़ं तस्य वचनान्निहतो गौतमेन वै |
१० क
आदि पर्व
अध्याय १७०
व्राह्मण्यु उवाच
तदाय़मूरुणा गर्भो मय़ा वर्षशतं धृतः ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
तदाय़स्तममुक्तास्त्रमुदीर्णवरवारणम् |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
तदाय़ुधमहावर्षं क्षिप्तं योधमहाम्वुदैः |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय १३३
सञ्जय़ उवाच
तदाय़ुध्यन्त सैन्यानि त्वमेकस्तु पलाय़थाः ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १११
नारद उवाच
तदाय़ुष्मन्खगपते यथेष्टं गम्यतामितः |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११७
युधिष्ठिर उवाच
तदिच्छामि गुणाञ्श्रोतुं मांसस्याभक्षणेऽपि वा |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
युधिष्ठिर उवाच
तदिच्छामि परां वुद्धिं श्रोतुं भरतसत्तम |
२ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
तदिच्छामि भवतोपदिष्टं किं तदिति ||
१७१ 7
भीष्म पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
तदिच्छामि महाभाग त्वत्प्रसादात्परन्तप ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
तदिच्छामीष्टं ते गुर्वर्थमुपहृत्यानृणो गन्तुम् |
९९ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ३९
श्रीभगवानु उवाच
तदित्यनभिसन्धाय़ फलं यज्ञतपःक्रिय़ाः |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय ११२
वैशम्पाय़न उवाच
तदिदं कर्मभिः पापैः पूर्वदेहेषु सञ्चितम् |
२६ क
वन पर्व
अध्याय २३१
वैशम्पाय़न उवाच
तदिदं कृतं नः प्रत्यक्षं गन्धर्वैरतिमानुषम् |
१७ क