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द्रोण पर्व
अध्याय ८२
सञ्जय़ उवाच
नाशय़ित्वा रणे सैन्यं त्वदीय़ं माधवोत्तमः |
३७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
नाशय़िष्यति सुव्यक्तं दुर्योधनहिते रतः ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४५
भीष्म उवाच
नाशय़िष्यसि मा सर्वमात्मानं पृथिवीं तथा ||
४० ख
आदि पर्व
अध्याय ४९
आस्तीक उवाच
नाशय़िष्यामि मात्र त्वं भय़ं कार्षीः कथञ्चन ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
नाशय़ेतां शरैस्तीक्ष्णैः कङ्कपत्रपरिच्छदैः ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०
धृतराष्ट्र उवाच
नाशय़ेतामिहेच्छन्तौ मानुषत्वात्तु नेच्छतः ||
४२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
नाषडङ्गविदत्रासीत्सदस्यस्तस्य धीमतः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९६
भीष्म उवाच
नासंनद्धो नाकवचो योद्धव्यः क्षत्रिय़ो रणे |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७८
राजो उवाच
नासंविभज्य भोक्तास्मि न विशामि परस्त्रिय़म् |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
नासज्जन्त तनुत्रेषु भीष्मचापच्युताः शराः ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
नासज्जन्त शरीरेषु भीष्मचापच्युताः शराः ||
७१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २४
श्रीभगवानु उवाच
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
नासत्यं चैव दस्रं च भिषजौ पश्य पृष्ठतः ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०१
भीष्म उवाच
नासत्यश्चैव दस्रश्च स्मृतौ द्वावश्विनावपि |
१७ क
वन पर्व
अध्याय १२१
युधिष्ठिर उवाच
नासत्यौ च कथं व्रह्मन्कृतवान्सोमपीथिनौ |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५९
सञ्जय़ उवाच
नासनेष्ववतिष्ठन्त वाहूंश्चैव विचिक्षिपुः |
३ क
वन पर्व
अध्याय १४८
हनूमानु उवाच
नासन्कृतय़ुगे तात तदा न क्रय़विक्रय़ाः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
नासमीक्ष्यागता चाहं त्वत्सकाशं जनाधिप ||
१८६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
नासम्पृष्टो व्युपय़ुङ्क्ते परार्थे; तत्प्रज्ञानं प्रथमं पण्डितस्य ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७५
सञ्जय़ उवाच
नासम्भ्रमत्तदा पार्थस्तदस्य पुरुषानति ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
नासम्भ्रमद्यत्समरे वध्यमानः शितैः शरैः ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३८
भीष्म उवाच
नासम्यक्कृतकारी स्यादप्रमत्तः सदा भवेत् |
६० क
सभा पर्व
अध्याय १६
कृष्ण उवाच
नाससाद नृपश्रेष्ठः पुत्रं कुलविवर्धनम् ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३८
पञ्चचूडो उवाच
नासां कश्चिदगम्योऽस्ति नासां वय़सि संस्थितिः |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६५
भीष्म उवाच
नासां शीतातपौ स्यातां सदैताः कर्म कुर्वते |
३९ क
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
नासाक्षिकर्णास्यविनिःसृतेन; प्रस्यन्दता च व्रणसम्भवेन |
५० क
उद्योग पर्व
अध्याय १०३
कण्व उवाच
नासादय़सि तान्वीरांस्तावज्जीवसि पुत्रक ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय ११३
लोमश उवाच
नासादय़ामास यदा त्र्यहेण; तदा स पर्याववृतेऽऽश्रमाय़ ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय २४५
वैशम्पाय़न उवाच
नासाध्यं तपसः किञ्चिदिति वुध्यस्व भारत ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३८
भीष्म उवाच
नासाध्यं मृदुना किञ्चित्तस्मात्तीक्ष्णतरं मृदु ||
६५ ख
वन पर्व
अध्याय २९
प्रह्लाद उवाच
नासाध्यं मृदुना किञ्चित्तस्मात्तीक्ष्णतरो मृदुः ||
३० ख
कर्ण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
नासाध्यं विद्यते मेऽद्य त्वत्प्रिय़ार्थं विशेषतः |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
नासाध्यं विद्यते लोके सात्यकेरिति माधव |
९३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९९
मनुरु उवाच
नासामर्थ्याद्गच्छति कर्मणेह; हीनस्तेन परमेणाव्ययेन ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४३
भीष्म उवाच
नासामस्ति प्रिय़ो नाम मैथुने सङ्गमे नृभिः ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
नासि केवलसर्पेण तिर्यग्योनिषु वर्तता |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४३
कुन्त्यु उवाच
नासि सूतकुले जातः कर्ण तद्विद्धि मे वचः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
व्यास उवाच
नासिक्यं चापि मे जन्म त्वत्तः पञ्चममुच्यते ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
वैशम्पाय़न उवाच
नासिक्यजन्मनि पुरा व्रह्मणः पार्थिवोत्तम |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७५
भगवानु उवाच
नासिद्धौ व्यथते तस्य न सिद्धौ हर्षमश्नुते ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
नासीच्चक्रपथश्चैव पाण्डवस्य महात्मनः |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
नासीच्चोरभय़ं तात न क्षुधाभय़मण्वपि |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५४
दुर्योधन उवाच
नासीत्कश्चिदतिक्रान्तो भविता न च कश्चन ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७०
सञ्जय़ उवाच
नासीत्कश्चिन्महाराज योऽत्याक्षीत्संय़ुगं भय़ात् ||
३४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
नासीत्तत्र पुमान्कश्चित्तव सैन्यस्य भारत |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
नासीत्तत्र रणे कृष्ण सव्यसाची महारथः ||
३९ ख
मौसल पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
नासीत्पलाय़ने वुद्धिर्वध्यमानस्य कस्यचित् ||
४१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
नासीद्रथपथस्तत्र योधैर्युधि निपातितैः |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६२
सञ्जय़ उवाच
नासीद्रथपथस्तत्र सर्वमाय़ोधनं प्रति ||
१८ ग
आदि पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
नासीद्व्याधिभय़ं चापि तस्मिञ्जनपदेश्वरे ||
८ ख