अनुशासन पर्व
अध्याय
१४८
भीष्म उवाच
नासीनः स्यात्स्थितेष्वेवमाय़ुरस्य न रिष्यते ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४३
भीष्म उवाच
नासु स्नेहो नृभिः कार्यस्तथैवेर्ष्या जनेश्वर |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
नासुरामरगन्धर्वा न पिशाचा न राक्षसाः |
४७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५
इन्द्राण्यु उवाच
नासुरेषु न देवेषु तुल्यो भवितुमर्हसि |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३३
भीष्म उवाच
नासुरैर्न पिशाचैश्च शक्या जेतुं द्विजातय़ः ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
नासुरोरगरक्षांसि क्षपय़ेय़ुः सहाय़ुधम् ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८२
वासुदेव उवाच
नासुहृत्परमं मन्त्रं नारदार्हति वेदितुम् |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३८
विदुर उवाच
नासुहृत्परमं मन्त्रं भारतार्हति वेदितुम् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३८
व्यास उवाच
नासूय़काय़ानृजवे न चानिर्दिष्टकारिणे |
१७ क
विराट पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
नासूय़को न चापीर्षुर्नातिवादी न मत्सरी |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२३
वासुदेव उवाच
नासूय़त्यागमं कञ्चित्स्वं तपो नोपजीवति |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
१४८
हनूमानु उवाच
नासूय़ा नापि रुदितं न दर्पो नापि पैशुनम् ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५३
भीष्म उवाच
नासूय़ां चक्रतुस्तौ च दम्पती भरतर्षभ ||
१२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
प्रह्राद उवाच
नासूय़ामि द्विजश्रेष्ठ राजास्मीति कदाचन |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३६
शम्वर उवाच
नासूय़ामि सदा विप्रान्व्रह्माणं च पितामहम् |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९
मरुत्त उवाच
नासौ देवं याजय़ित्वा महेन्द्रं; मर्त्यं सन्तं याजय़न्नद्य शोभेत् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६४
इन्द्र उवाच
नासौ देवो विश्वरूपो मय़ापि; शक्यो द्रष्टुं व्रह्मणा वापि साक्षात् |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
विदुर उवाच
नासौ धर्मो यत्र न सत्यमस्ति; न तत्सत्यं यच्छलेनानुविद्धम् ||
४९ ख
वन पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
नासौ धिय़ा सम्प्रतिपश्यति स्म; किं नाम कृत्वाहमचक्षुरेवम् |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
नासौ रथः सात्वत कौरवाणां; क्रुद्धस्य मुच्येत रणेऽद्य कश्चित् |
८३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४७
नारद उवाच
नासौ वृथाग्निना दग्धो यथा तत्र श्रुतं मय़ा |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
नासौ व्यमुह्यद्द्रुपदस्य पुत्रो; राजन्महेन्द्रप्रतिमप्रभावः ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०९
सुपर्ण उवाच
नासौम्यो नाविधेय़ात्मा नाधर्म्यो वसते जनः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
नास्तमेति यथा सूर्यो यथा सत्यं भवेद्वचः |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
नास्ति किञ्चित्परं भूतं महादेवाद्विशां पते |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
नास्ति क्षुद्रतरस्तस्मान्न नृशंसतरो नरः ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
नास्ति चाप्यमरत्वं वै मनुष्यस्य कथञ्चन |
४७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२८
अध्वर्युरु उवाच
नास्ति चेष्टा विना हिंसां किं वा त्वं मन्यसे द्विज ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
नास्ति जात्या रिपुर्नाम मित्रं नाम न विद्यते |
१३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
नास्ति जात्या रिपुर्नाम मित्रं नाम न विद्यते |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
नास्ति तस्मात्परतरं पुरुषाद्वै सनातनात् ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२१
श्रीभगवानु उवाच
नास्ति तस्मात्परोऽन्यो हि पिता देवोऽथ वा द्विजः |
३१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२७
व्राह्मण उवाच
नास्ति तस्माद्दुःखतरं नास्त्यन्यत्तत्समं सुखम् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१३
जनक उवाच
नास्ति ते सुखदुःखेषु विशेषो नास्ति लोलुपा |
४८ क
वन पर्व
अध्याय
८४
वैशम्पाय़न उवाच
नास्ति त्वतिक्रिय़ा तस्य रणेऽरीणां प्रतिक्रिय़ा ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
नास्ति नासीन्नाभविष्यद्भूतं कामात्मकात्परम् |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४४
भीष्म उवाच
नास्ति भर्तृसमो नाथो न च भर्तृसमं सुखम् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४२
भीष्म उवाच
नास्ति भार्यासमं किञ्चिन्नरस्यार्तस्य भेषजम् ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
५८
नल उवाच
नास्ति भार्यासमं मित्रं नरस्यार्तस्य भेषजम् ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४२
भीष्म उवाच
नास्ति भार्यासमो लोके सहाय़ो धर्मसाधनः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४२
भीष्म उवाच
नास्ति भार्यासमो वन्धुर्नास्ति भार्यासमा गतिः |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१४२
युधिष्ठिर उवाच
नास्ति भूतस्य नाशो वै पश्यतास्मान्वनेचरान् ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
नास्ति भूमिसमं दानं नास्ति मातृसमो गुरुः |
८९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३३
नरनाराय़णावू ऊचतुः
नास्ति मत्तोऽधिकः कश्चित्को वाभ्यर्च्यो मय़ा स्वय़म् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
नास्ति मातृसमं त्राणं नास्ति मातृसमा प्रपा ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
नास्ति मातृसमा छाय़ा नास्ति मातृसमा गतिः |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
नास्ति मैत्री स्थिरा नाम न च ध्रुवमसौहृदम् |
१३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४६
भीष्म उवाच
नास्ति यज्ञः स्त्रिय़ः कश्चिन्न श्राद्धं नोपवासकम् |
१२ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२३
गान्धार्यु उवाच
नास्ति युद्धे कृती कश्चिन्न विद्वान्न पराक्रमी |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६९
पुत्र उवाच
नास्ति रागसमं दुःखं नास्ति त्यागसमं सुखम् ||
३३ ख