उद्योग पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
नास्मि प्रीतिमती नीता भीष्मेणामित्रकर्शन |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
नास्मि भीतो महावाहो सहाय़ार्थश्च नास्ति मे |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
नास्मि लक्ष्मण दुर्मेधा न कृतघ्नो न निर्घृणः |
१६ क
विराट पर्व
अध्याय
८
द्रौपद्यु उवाच
नास्मि लभ्या विराटेन न चान्येन कथञ्चन |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
नास्मि वर्णोत्तमा जात्या न वैश्या नावरा तथा |
१८१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
नास्मि सत्रप्रतिच्छन्ना न परस्वाभिमानिनी |
१८५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
नास्मिञ्जनेऽभिरमसे रहः क्षिय़सि पाण्डव |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३२
विदुरो उवाच
नास्मिञ्जातु कुले जातो गच्छेद्योऽन्यस्य पृष्ठतः |
३५ क
वन पर्व
अध्याय
२९५
वैशम्पाय़न उवाच
नास्मिन्कुले जातु ममज्ज धर्मो; न चालस्यादर्थलोपो वभूव |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
४५
जनमेजय़ उवाच
नास्मिन्कुले जातु वभूव राजा; यो न प्रजानां हितकृत्प्रिय़श्च |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
नास्मिन्पश्यामि वृजिनं सर्वतो मे परीक्षितः ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
गौतम्यु उवाच
नास्मिन्हते पन्नगे पुत्रको मे; सम्प्राप्स्यते लुव्धक जीवितं वै |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
नास्मै ह्यस्त्राणि दिव्यानि प्रादास्यद्भृगुनन्दनः ||
१५८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६४
भीष्म उवाच
नास्य कश्चिन्मनोदाहः कदाचिदपि जाय़ते |
१८ ख
सभा पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
नास्य किञ्चिदविज्ञातं नास्य किञ्चिदकर्मजम् |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय
१३०
वैशम्पाय़न उवाच
नास्य किञ्चिन्न जानामि भोजनादि चिकीर्षितम् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
नास्य कृत्यतमं किञ्चिदन्यद्दस्युनिवर्हणात् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८४
भीष्म उवाच
नास्य छिद्रं परः पश्येच्छिद्रेषु परमन्विय़ात् |
४६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
नास्य छिद्रं परः पश्येच्छिद्रेषु परमन्विय़ात् ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
नास्य छिद्रं परो विद्याद्विद्याच्छिद्रं परस्य तु |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९७
नारद उवाच
नास्य जातिं निसर्गं वा कथ्यमानं शृणोमि वै |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
नास्य तन्ममृषे वाली तं तारा प्रत्यषेधय़त् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
२८२
गौतम उवाच
नास्य त्वं कारणं वेत्थ सावित्री वक्तुमर्हति ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२२
भीष्म उवाच
नास्य देवा न गन्धर्वा न पिशाचा न राक्षसाः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
वलिरु उवाच
नास्य द्वीपः कुतः पारं नावारः सम्प्रदृश्यते |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७२
व्रह्मो उवाच
नास्य प्रष्टास्ति लोकेऽस्मिंस्त्वत्तोऽन्यो हि शतक्रतो ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३२
नरनाराय़णावू ऊचतुः
नास्य भक्तैः प्रिय़तरो लोके कश्चन विद्यते |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
९१
गङ्गो उवाच
नास्य मोघः सङ्गमः स्यात्पुत्रहेतोर्मय़ा सह ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
नास्य यज्ञहनो देवा ईहन्ते नेतरे जनाः |
४३ ख
विराट पर्व
अध्याय
४
धौम्य उवाच
नास्य यानं न पर्यङ्कं न पीठं न गजं रथम् |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
३८
सञ्जय़ उवाच
नास्य युद्धे समं मन्ये कञ्चिदन्यं धनुर्धरम् |
१३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
२
कृप उवाच
नास्य वाच्यं भवेत्किञ्चित्तत्त्वं चाप्यधिगच्छति ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
नास्य विक्षिपतश्चापं सन्दधानस्य चासकृत् |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
नास्य शक्रोऽपि मुच्येत सम्प्राप्तो वाणगोचरम् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
३९
महेश्वर उवाच
नास्य स्वर्गस्पृहा काचिन्नैश्वर्यस्य न चाय़ुषः |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४५
सनत्सुजात उवाच
नास्यातिवादा हृदय़ं तापय़न्ति; नानधीतं नाहुतमग्निहोत्रम् |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
नास्याधिकारो धर्मेऽस्ति यथा शूद्रस्तथैव सः ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३५
व्यास उवाच
नास्यानश्नन्वसेद्विप्रो गृहे कश्चिदपूजितः |
७ क
विराट पर्व
अध्याय
४
धौम्य उवाच
नास्यानिष्टानि सेवेत नाहितैः सह संवसेत् |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
नास्यान्तरं ददृशुः स्वे परे वा; यथा पुरा वज्रधरस्य दैत्याः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
२५४
द्रौपद्यु उवाच
नास्यापराद्धाः शेषमिहाप्नुवन्ति; नाप्यस्य वैरं विस्मरते कदाचित् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
नास्यापवादे स्थातव्यं दक्षेणाक्लिष्टकर्मणा |
४८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
नास्यावध्योऽस्ति लोकेषु सेन्द्ररुद्रेषु मारिष ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२८
व्यास उवाच
नास्येन्द्रिय़मनेकाग्रं नातिक्षिप्तमनोरथः |
३६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
नास्वादय़ीत भुञ्जानो रसांश्च मधुरांस्तथा |
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
नाहं कर्ता न कर्ता त्वं कर्ता यस्तु सदा प्रभुः |
८४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
वलिरु उवाच
नाहं कर्ता न चैव त्वं नान्यः कर्ता शचीपते |
४५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
नाहं कामान्न संरम्भान्न द्वेषान्नार्थकारणात् |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६७
यम उवाच
नाहं कालस्य विहितं प्राप्नोमीह कथञ्चन |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२४
भीष्म उवाच
नाहं काषाय़वसना नापि वल्कलधारिणी |
८ क